लोग चिल्ला रहे थे कि धर्म खतरे में हैं…

“जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्छा ही हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा !” ~गीतासार

कभी कभी लगता है कि वे लोग कितने ज्ञानी थे कि जो कहा हर जमाने में हर काल में, हर युग में सार्थक हो जाते हैं | जैसे जब मैंने सनातन का अर्थ समझा पहली बार तब ही धर्म भी समझ में आ गया | उसी समय यह भी समझ में आ गया कि संप्रदाय, मत या पंथ धर्म नहीं, केवल धर्म को समझने के माध्यम मात्र हैं | लेकिन जब धर्म समझ में आ जाये तब व्यक्ति इनसे मुक्त हो जाता है और आगे बढ़ जाता है |

जब यह समझ में आया तब खुद को स्वतंत्र पाया मैंने लेकिन फिर मुझे लगा कि मेरा कर्तव्य है कि मैं लोगों को भी समझाऊँ | काफी समय तक तो मैं यही नहीं तय कर पाया कि किस प्रकार समझाऊँ, तो फिर मैंने कहानियों के माध्यम से अपनी बात कहनी शुरू की | फिर एक दिन मुझे पिताजी की बात ध्यान में आई कि तुम्हारे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता…… फिर ध्यान आया अपने उस मिडिया हाउस के मालिक की बात जिसमें में 18-20 घंटे काम करता और दो से तीन घंटे ही सोता था | लेकिन एक दिन किसी बात को लेकर झड़प हो गयी मेरी और मैंने नौकरी छोड़ने की बात कही, तब उन्होंने कहा कि जाओ जाना है तो, हमें दस मिल जायेंगे तुम्हारे जैसे….. बस मैंने नौकरी छोड़ दी | और कुछ समय बात मुझे पता चला कि मेरे तो खाने के लाले पड़ गये, वे लोग जैसे थे वैसे ही हैं | बल्कि अब मेरी जगह तीन तीन रख रखे हैं |

READ  समाधान क्या है धार्मिक उन्मादियों से निपटने का ?

तब मुझे बहुत ही बुरा लगा कि मैं तो यह मानकर चल रहा था कि मैं नहीं करूँगा तो न जाने कितनों का प्रोजेक्ट लटक जाएगा और न जाने कितने लोगों का नुकसान होगा… लेकिन आज समझ में आया कि मेरे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता | जिस दिन यह बात समझ में आई उस दिन फिर मैं एक पायदान ऊपर चढ़ गया और अब किसी कम्पनी से कोई लगाव नहीं रहा, बस अपनी कीमत देखता था कि जितना मैं चाहता हूँ उतना मिल रहा है या, मुझे सारे आराम मिल रहे हैं या नहीं…. बाकि किसी का काम बिगड़ रहा हो, लटक रहा हो… अपने को कोई मतलब नहीं | तब मैंने जाना कि स्वतंत्रता क्या होती है |

अपनी शर्तों में तो पहली नौकरी से ही काम करता था, लेकिन अब और भी स्ट्रिक्ट हो गया था | और इन सब घटनाओ से मुझे समझ में आया कि सनातन क्या है और धर्म क्या है | सनातन यानि जो हमेशा से है और हमेशा रहेगा | अर्थात सुख-दुःख, लाभ-हानि, दिन-रात, जीवन-मृत्यु, सृजन-विनाश…. सभी अनंतकाल से चल रहा है और चलता ही रहेगा | और इन घटनाओं में जो नियम लागू होते हैं, वही धर्म है | फिर मन से बहुत ही बड़ा बोझ उतर गया | अब मैंने खुद को किसी भी घटना के लिए जिम्मेदार मानना छोड़ दिया |

इसी प्रकार मैं तब भी विचलित हुआ था जब धर्म के नाम पर लोग चिल्ला रहे थे कि धर्म खतरे में हैं… फिर समझ में आया कि वे दड़बे को धर्म बता रहे हैं | वे शायद अपनी जगह सही हैं… क्योंकि दडबों में तो इतने खटमल और पिस्सू हो चुके हैं कि दुनिया भर की बीमारियों का घर बन गया, तो खतरे में स्वतः ही आ ही गया | फिर सोचता था कि भारत में कुछ दडबों के मालिक इतना जहर उगल रहे हैं, इतने नफरत फैला रहे हैं… तो देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी… लेकिन फिर समझ में आया कि महाभारत भी हुआ था, लेकिन भारत तो खत्म नहीं हुआ | हम तो आज भी जिन्दा ही हैं बेशक मुर्दों के रूप में लेकिन हैं तो सही |

READ  ब्लॉक करने की आवश्यकता किसी भी संत-महंत या ब्रम्हज्ञानी को नहीं पड़ती लेकिन मुझे पड़ती है

तो इन नफरत फ़ैलाने वाले और खुद को कट्टर धार्मिक कहने वालों ने और स्पष्ट कर दिया कि वे दडबों की ही बात कर रहे हैं, धर्म की नहीं | उन्हें धर्म से कुछ लेना देना है ही नहीं, बस अपने अपने दड़बे की दुकानदारी खतरे में पड़ते देख चिल्ला रहे हैं और समझा रहे हैं कि हमारे दड़बे में ही ईश्वर का वास है और यही से मोक्ष मिलेगा |

लेकिन देखता हूँ कि दलितों को वे मोक्ष देते हैं जिन्दा जलाकर | एक दड़बा ईशनिंदा के नाम पर हत्या कर देता है तो एक किताबें लिखने वाले बुद्धिजीवियों को गोलियों से भुनकर मोक्ष देता है | कितने ही लोग भुखमरी और बीमारी से मोक्ष पा जाते हैं | फिर सभी के अपने अपने दडबों के अपने अपने नियम हैं जिन्हें वे धर्म कहते हैं, न कि सनातन धर्म को वे धर्म कहते हैं | तो जितना ही कट्टर धार्मिक उपद्रव मचाते हैं, हत्याएं करते हैं, उतना ही लोगों को दड़बों और धर्म का अंतर समझ में आने लगता है | किसी और को न भी समझ में आये, लेकिन मुझे तो समझ में आ ही गया | अब मेरे मन में कोई भी संशय नहीं है कि किताबी धर्म जो कि दड़बों के मालिकों ने अपने अनुसार बनवाये हैं, और वास्तविक सनातन धर्म में बहुत अंतर है | वास्तविक सनातन धर्म किसी की स्वतंत्रता नहीं छीनता, जबकि मानव निर्मित किताबी धर्म स्वतंत्रता छीनता है | जिस प्रकार संविधान की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं पूरी कानूनी तरीके से, वैसे ही धार्मिक किताबों पर आधारित धर्म की भी धज्जियाँ उड़ाते हैं खुद को कट्टर धार्मिक कहने वाले | उनसे भी आगे होते हैं वे लोग जो धर्मरक्षा के लिए निकले हुए हैं, उनका तो  धर्म से दूर दूर तक कोई रिश्ता ही नहीं होता | बस रंगीन कपडा बाँध लिया सर पर और हो गये धर्मरक्षक | बस फिर जाकर तोड़फोड़ करना है, डराना धमकाना है,  न माने तो मोक्ष दिला देना है…. हो बस हो गयी रक्षा धर्म की | अब इनकी स्थित बिलकुल वैसी है कि ये न रहेंगे तो धर्म नष्ट हो जायेगा | और धार्मिक लोग भी इनका साथ देते हैं, इनकी जय जयकार करते हैं, क्योंकि वे भी मानते हैं कि ये लोग न रहे तो धर्म मिट जाएगा….. लेकिन ये लोग धर्म की ही धज्जियाँ उड़ा रहे हैं वह किसी को नहीं दीखता |

READ  अर्थी = जीवन का सार/अर्थ समझाने वाली

तो गीता सार सही है…. जितना ये लोग उपद्रव करेंगे धर्म के नाम पर उतना ही नुकसान करेंगे अपने ही दडबों का | ~विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of