फूटपाथ में आने के बाद ही जान पाया

स्वतंत्रता का वास्तविक अनुभव मुझे मिला जब मैं फुटपाथ पर पहुँच गया | क्योंकि जब तक सब कुछ था,एक डर था खोने का | लेकिन जब सब कुछ खो गया और कुछ नहीं बचा खोने को तब जाना कि जो था वह तो मेरा था ही नहीं | जिस सम्मान के लिए मैं अठारह से बीस घंटे काम करता था और कई बार तो तीन तीन दिन तक बिना सोये काम करता था, वह सब व्यर्थ में किया | मेरे हुनर, मेरी मेहनत मालिक की कमाई बढ़ाती थी, प्रोड्यूसरों को समय पर अपने सीरियल सबमिट करने को मिल जाता था | कैसेट कंपनियों को अच्छी क्वालिटी मिल जाती थी बिना बोम्बे गये, सिंगर को मन पसंद आवाज मिल जाती थी मिक्सिंग के बाद…… इसलिए वह सम्मान था वह वाहवाही थी….लेकिन इसमें मैंने खोया क्या और पाया क्या यदि उसका लेखाजोखा करूँ तो समाज से मुझे कुछ नहीं मिला | जो मिला वह सब नकली था, ऐसी कोई भी चीज समाज मुझे नहीं दे पाया जो दिन रात के मेहनत के बदले जिसपर मुझे गर्व होता |

लेकिन मैं उस झूठे सम्मान के लिए अपनी जवानी बर्बाद कर ली, मैंने चंद रुपयों के लिए स्वयं के आस्तित्व को मिटाने पर तुला हुआ था, मैं उस झूठे सपने में खोया हुआ था कि एक दिन मुझे भी ऑस्कर मिलेगा | लेकिन मेरा भ्रम टूटा उस दिन जब एक फिल्म के कुछ गाने रिकॉर्ड करवाने मेरे पास आयीं शुभामुद्गल और मीरा नायर | मीरा नायर से इस बात को लेकर बहस हुई कि उसने कण्ट्रोल रूम में सिगरेट सुलगा ली, जो कि मुझे पसंद नहीं आया | स्वभाव बचपन से ही ऐसा था कि जो गलत है उसे तुरंत ही गलत कह दिया जाए, तो मैंने आपत्ति जताई और कहा कि सिगरेट बाहर जाकर पियें कण्ट्रोल रूप में नहीं | मीरा नायर ने कहा कि अरे मुझे तो बोम्बे और अमेरिका में भी मना करने की हिम्मत किसी की नहीं हुई और आप ?

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मैंने कहा कि दुर्भाग्य से यह बोम्बे और अमेरिका नहीं है और इस स्टूडियो मेरी ही मर्जी चलती है | वो तुरंत उठीं और जोर से दरवाजा बाहर निकलीं और जोर से दरवाजा बन कर दिया | रिकॉर्डिंग हो जाने के बाद भी अंदर नहीं आयीं और बाहर ही बाहर मेटेरियल लेकर और बिल चुका कर चलीं गयीं | शुभा जी को क्रेडिट में दिए जाने वालों के नाम देना था तो उन्होंने मेरा नाम भी भेज दिया | बाद में शुभा जी का फोन आया कि मीरा जी ने मेरा नाम हटा दिया और कहा कि उसका नाम इतना बड़ा था कि स्क्रीन में नहीं आ पा रहा था इसलिए हटाना पड़ा |

तो उस दिन भ्रम टूटा कि जब मेरा नाम इतना बड़ा है कि स्क्रीन पर नहीं आ सकता तो ऑस्कर भी नहीं जीत पाऊंगा | तो जब ऑस्कर ही नहीं जीत पाऊंगा तो मैं इतनी मेहनत कर ही क्यों रहा हूँ ? उस दिन से मन ऐसा टूटा कि हर एक चीज से विरक्ति होनी शुरू हो गयी | उसके बाद कभी कोई सीरियल में अपना नाम देख कर ख़ुशी नहीं हुई और न ही किसी कैसेट के कवर में | न लोगों की वाह-वाही अच्छी लगी और न ही मुँह माँगी तनखा…. सब व्यर्थ | फिर सहारा खोजा किसी लड़की का कि शायद कोई लड़की ही समझ पाए मुझे, लेकिन वह भी संभव नहीं हुआ क्योंकि लड़की पैसे को समझती है, बंगला कार कोठी को समझती है….. तो बिखरता हुआ बाद के दस सालों में ऐसी स्थिति में पहुँच गया कि फूटपाथ के सिवाय कोई और रास्ता ही नहीं बचा था | लेकिन फूटपाथ में आने के बाद ही जान पाया कि वास्तव में अब मैं स्वतंत्र हुआ हूँ |

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अपने जीवन के कुछ अंश आज इसलिए दिए कि आप लोगों का एक भ्रम तोडना चाहता था कि मैं कोई पहुँचा हुआ सन्यासी या संत हूँ | ऐसा कुछ नहीं है और न ही मैं बाकी संन्यासियों की तरह कर्मकांड या पूजा पाठ करवाता हूँ | न ही मैं कुंडली देखता हूँ और न ही भविष्य बताता हूँ | न रामायण या गीता बाँचता हूँ और न ही कथा भागवत करता हूँ | कई बड़े संत महंत मुझे आमंत्रित करते हैं अपने अपने आश्रमों में यह मानकर कि मैं कोई बहुत ही पहुँचा हुआ संत हूँ | कई बार कुछ संत यह भी कहते हैं कि आप जितना बढ़िया लिखते हैं हम नहीं लिख पाते | कई बार कुछ कहते हैं कि हम तो आपसे ही प्रेरणा लेते हैं…. तो आप सभी से कहना चाहता हूँ कि मुझसे प्रेरणा मत लीजिये | पढ़िए और भूल जाइये…. मैं भी स्वयं को अब भूल जाना चाहता हूँ | जो भी करना चाहा कर नहीं पाया, जहाँ भी गया विरोधी ही बनाया और आज यहाँ आश्रम में भी हर कोई घात लगाए बैठा है कि कैसे इसको विदा किया जाए और इसका कंप्यूटर और कमरा हथियाया जाए…. हा हा हा हा हा हा हा…….

अब विरोधियों के लिए मैंने एक नया मसाला दे दिया इस पोस्ट से कि वे कह सकें कि हम तो पहले से ही जानते थे कि यह पाखंडी है और बिना शास्त्रों को पढ़े ही हमारे धर्मों की बुराई कर रहा है | ~विशुद्ध चैतन्य

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