होश में आइये…वरना एक दिन होश में आने लायक भी नहीं रह जाओगे

शतरंज मेरा प्रिय खेल था बचपन में | कई कई घंटों हम भाई-बहन शतरंज खेलते रहते | इसके अलावा कैरम, लूडो हमारा प्रिय खेल हुआ करता था |

शतरंज एक रणनीति बनाकर खेला जाने खेल है | हर एक चाल बहुत ही सोच विचार कर चलनी होती है | चाल चलने से पहले आपको यह अनुमान लगाना होता है कि आपकी चाल के बाद सामने वाला कौन सा चाल चलेगा | धीरे धीरे आप को सामने बैठे व्यक्ति के मनोभावों को पढ़ने का हुनर आ जाता है | और फिर एक दिन आपको इतना अनुभव हो जाता है कि सामने वाले की पहली दूसरी चाले में ही उसकी रणनीति समझ में आ जाती है |

बस यही है राजनीति | राजनीती में भी जनता को हिन्दू-मुस्लिम में उलझाए रखा जाता है और राजनीतिज्ञ आराम से देश और जनता को न केवल लूटते चले जाते हैं, बल्कि मानसिक रूप विकृत, विक्षिप्त और दिमाग से पैदल बना देते हैं | न जनता फिर शासक से प्रश्न करने लायक रह जाती है और न ही विरोध करने लायक जाती है |

लेकिन जिन्हें बचपन से ही शतरंज जैसे खेलों में रूचि रही है, उन्हें ये नेता लोग मूर्ख नहीं बना पाते | क्योंकि नेता कब कौन सी चाल सोच रहा है, उसका अनुमान शतरंज के खिलाड़ियों को पहले ही हो जाता है | जैसे टीवी चैनल में होने वाले डिबेट | इन्हें हम जैसे लोग नहीं देखते, क्योंकि हम जानते हैं कि इन डिबेट का उद्देश्य समाज को कोई दिशा दिखाना नहीं होता | बल्कि समाज को गुमराह करना होता है और वह ही राजनेताओं की इच्छाओं के अनुरूप | डिबेट पूरी रणनीति के साथ तैयार की जाती है और जनता को बिलकुल ऐसा लगता है कि कोई सचमुच का कोई उत्पात मच गया हो | वास्तव में सारी स्क्रिप पहले ही तैयार होती है | यह और बात है कि डिबेट में भाग लेने वाले इन सब से अनजान होते हों |

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लेकिन यदि आप ध्यान दें, तो इन डिबेट से न तो समाज का कोई भला होता है और न ही कोई दिशा मिलती है | ये सभी डिबेट राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ही खेले जाते हैं |

कहीं दंगा हो, या कहीं मोबलिंचिंग…सभी पूरी रणनीति के साथ किये जाते हैं अब यह भी सिद्ध कर दिया, हत्यारोपियों को फूल माला पहनाकर, बलात्कारियो के समर्थन में तिरंगा लेकर रैलियां निकालकर |

तो यदि जनता खुद न चाहे कि लुटेरों से अपनी और अपने राष्ट्र की रक्षा करनी है, तब गजनी आये, गौरी आये, तैमुर आये, फिरंगी आयें, कांग्रेस आये, भाजपा आये या कोई और आये | जिनको भी यह एहसास हो जाएगा कि जनता खुद लुटने को तैयार बैठी है तो भला कौन नहीं लूटना चाहेगा ? जिसको भी यह एहसास हो जाए कि देश की जनता का राष्ट्रीय खेल हिन्दू-मुस्लिम है, कांग्रेस-भाजपा है, दलित-ब्राहमण है, दक्षिणपंथ-वामपंथ है….तो हर नेता चाहेगा कि जनता को उसके पसंदीदा खेलों में व्यस्त रखा जाये | जनता ऐसे खेलों में व्यस्त हो जाती है, और महँगाई बढ़ती चली जाती है, बैंक लुटेरे बैंक लूटकर विदेशों में सेटल होते चले जाते हैं | बाद में सत्ता की अदला बदली हो जाती है और अपराधी कभी पकड में नहीं आते | लुटेरे जो लूट गये, उसकी भरपाई जनता को अधिक टैक्स देकर चुकाना पड़ता है, महँगाई की मार झेलकर चुकाना पड़ता है….लेकिन जनता खुश है क्योंकि उसे अपना पसंदीदा खेल, हिन्दू मुस्लिम खेलने मिल रहा है |

होश में आइये…वरना एक दिन होश में आने लायक भी नहीं रह जाओगे |

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~विशुद्ध चैतन्य

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