बाबागीरी का कारोबार

रोहिणी, देवघर में स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मानार्थ आयोजित सभा में मुख्य अतिथि के रुप में विशुद्ध चैतन्य

“आपका भविष्‍य बहुत उज्‍ज्‍वल जान पड़ता है। कम से कम हिन्‍दुओें को गोमॉंस खिलाने के लिए आपने जिस उत्‍साह और प्रतिबद्धता का परिचय अपनी पिछली तमाम पोस्‍टाें में दिया है, वह बेशक तारीफ़ के काबिल है। इन पोस्‍टों से आपने निसंदेह गोमांस भक्षकों के दिल में बहुत बड़ी जगह बना ली होगी। ऐसे ही लगे रहिए, आपका बाबागीरी का यह कारोबार दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जाने वाला है। धर्म के काम में लगे प्रगतिशील साधू-सन्‍यासियों को इतना ही क्रान्‍ितिकारी होना चाहिये, वरना विकास कैसे होगा। तर्क की कसौटी पर तथ्‍यों को और धर्म को खरा उतरना ही चाहिए। लेकिन एक बात अब तक मेरी समझ् में नहीं आई कि यह बाबा लोग शादी क्‍यों नहीं करते हैं। अपनी रोटी कमाकर क्‍यों नहीं खाते हैं। सनातन धर्म में सन्‍यास तो तीन आश्रमों के निर्वाह के बाद ही बताया गया है। चाणक्‍य जैसे लोग तो उस सन्‍यासी को कैद करने की राजा को सलाह देते हैं जो तीन आश्रमों के कर्तव्‍य पूरे किये बिना सन्‍यस्‍त हो जाए। और ब्रह्मचर्य किसलिए। क्‍या आप अपने भगवान या प्रकृति से बड़े हो गये हैं और ज्‍यादा समझदार हो गये हैं। जब भगवान ने आपकों सेक्‍स की क्षमता और सम्‍भावना के साथ उत्‍पन्‍न किया तो ब्रहमचर्य का क्‍या मतलब है। सनातन धर्म, जिसके आप अक्‍सर प्रामाणिक प्रवक्‍ता बनते दिखाई देते है, उसमें तो किन्‍नरों को छोड़करअन्‍य लोगों के लिए गृहस्‍थ आश्रम के कर्तव्‍यों का निर्वहन अनिवार्य ध्‍ार्म कहा गया है। ि‍फर आपलोग मॉंग कर क्‍यों खाते हैं। क्‍यों दान की महिमा बखानते रहते हैं। यदि आपका अपना उत्‍पादक रोल होता और आप कमाकर दान देते, तब आपके दान का महिमागान उचित होता ——- कुल मिलाकर कहना यह है कि तर्क बहुत अच्‍छी चीज है। तर्क ही चार्वाक के लोकायत का सारसूत्र है। तर्क लोक में प्रतिष्ठा प्राप्‍त करने का बहुत अच्‍छा साधन भी है, और आपकी इस विधा में किंचित निपुणता भी द्ष्टिगोचर होती है। लेकिन यह क्‍या कि जो आपको पसन्‍द है, उसके पक्ष की सारी दलीलें ही आपको तर्क लगती हैं। तर्क की यात्रा अन्‍तहीन है और यह अन्‍त में ऐसे भयानक निष्‍कर्षों तक ले जा सकती है, जहॉं तक मेरा विश्‍वास है कि आप जाना पसन्‍द नहीं करेंगे। पुनश्‍च, बौद्धिक प्रगतिशीलता साबित करने की आतुरता जब साम्‍प्रदायिक राजनीति की सीमा में अतिक्रमण करने लगे, तो सुधीजन का कर्तव्‍य है कि वे पाखण्‍ड करने के बजाय सीधे राजनीति ही करने लगें।

साथ ही यह भी कि मैं कोई लेखक नहीं हूँ और इस टिप्‍पणी का लक्ष्‍य आपकी नियत पर सवाल खड़ा करना भी नहीं है। यदि मेरी टिप्‍पणी से आप किसी भी तरह आहत हों यह मेरा दुर्भाग्‍य ही होगा। आपके पोस्‍ट अक्‍सर उन लोगों के हाथों में औजार की तरह पहुँचते हैं, जो स्‍वयं जड़ अौर दुराग्रही हैं। इसे इंगित करना ही मेंरा लक्ष्‍य है।” -अरुण कुमार दीक्षित

सबसे पहले तो आभार आपका कि आपने निष्पक्षता के साथ अपना विचार रखा और आपने जो भी प्रश्न उठाये वे सभी वर्तमान समय में लगभग सभी के मन में उठ रहे हैं और सभी अपने अपने तरीके से इन प्रश्नों को उठा भी रहे हैं | मुझसे भी आये दिन इस प्रकार के प्रश्न पूछे ही जाते हैं और मैं अपनी तरफ से प्रश्नों के उत्तर देकर उन्हें संतुष्ट करने का प्रयत्न भी करता ही रहता हूँ | लेकिन आपने सभी के मनोभावों, संशयों को एक साथ बहुत ही अच्छी तरह से रखा और उत्तर संक्षिप्त में देकर मैं समाज को समग्र रूप से दिया जा सकने वाले उत्तर से वंचित नहीं करना चाहता था | इसलिए आपके सभी प्रश्नों के उत्तर मैं अपने ब्लॉग के माध्यम से दे रहा हूँ |


निसंदेह गोमांस भक्षकों के दिल में बहुत बड़ी जगह बना ली होगी ?

सबसे पहले तो मैं आपको स्पष्ट कर दूँ कि मैं ईश्वर या राष्ट्राध्यक्ष, राजा या धर्म का ठेकेदार नहीं हूँ कि तय करूं कि दूसरों के खान-पान रहन सहन का निर्णय करूँ और नियम तोड़ने वाले को सजा सुनाऊँ | मैं एक सन्यासी हूँ और सभी को समग्रता से स्वीकारना मेरा धर्म है फिर वह किसी भी पंथ सम्प्रदाय, जाति या वर्ण का हो | फिर मैं ब्राहमण, पंडित-पुरोहित भी नहीं हूँ कि छुआ-छूत, भेदभाव करता फिरूँ | तो पिछले दिनों गौरक्षा के नाम पर किये जा रहे उपद्रवों के विरुद्ध मेरे पोस्ट देखकर, आपके मन में यह धारणा बन गई कि मैं गौमांस या गौहत्या का समर्थन कर रहा हूँ | जितने लोगों ने मेरे पोस्ट लाइक किये या शेयर किये वे अधिकांश मुस्लिम थे और आपने मान लिया कि वे सभी गौमांस के शौक़ीन रहे | जबकि मेरे सर्कल मैं बहुत ही कम ऐसे मुस्लिम हैं जो गौमांस खाते हैं ऐसा मैं मनाता हूँ क्योंकि मैंने कुछ मुस्लिमों से बात की तो उन्होंने कहा कि हमारे अधिकाँश मित्र हिन्दू हैं और बचपन से हमारे घर में कभी गौमांस नहीं आया तो कभी खाया भी नहीं | हो सकता है वे झूठ कह रहे हों, लेकिन मेरे लिए यह कोई मायने नहीं रखता ठीक वैसे ही, जैसे मोदी जी को कोई फर्क नहीं पड़ता जब वे ओबामा से गले मिलते हैं, जुकरबर्ग से गले मिलते हैं… कि वे गौमांस खाते हैं या नहीं | हमारे देश के किसी भी धर्म के ठेकेदारों को भी कोई फर्क नहीं पड़ता जब वे गौमांस खाने वाले देश में पैसों के लालच में भागते फिरते हैं | न ही हमारे देश के इन तथाकथित धार्मिकों और गौरक्षकों को फर्क पड़ता है जब वे सेमसंग और सोनी जैसे फोन का प्रयोग करते हैं जो गौमांस खाने वाले देशों से आती हैं | मुझे नहीं लगता कि आपने भी कभी जानने का प्रयास किया होगा कि आपके हाथ में जो फोन है वह किसी गौमांस खाने वाले कर्मचारी के हाथ से तो नहीं गुजरा | गौमांस का इतना विरोध हो रहा है, लेकिन आज तक निर्यातकों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई… उससे भी किसी को कोई आपात्ति नहीं रही |

फिर गाय हिन्दुओं की माता हो गयी क्या आज से ? वह तो प्राचीन काल से ही माता थी ऐसा मानते हैं गौरक्षक | वे तो यह भी कहते हैं कि पहले कभी गाय की हत्या नहीं हुई हिन्दुओं में माँस के लिए | तो जब गाय को हर हिन्दू माता मानता है, तो फिर उनकी माता जब सड़कों में घायल घुमती हैं, उसका इलाज क्यों नहीं करवाते ? जब उनकी माताएं कूड़ाघर में कूड़ा खाती हैं, तब क्यों नहीं चिंता करते कि हमारी माता कूड़ा खा रही है ? यह अचानक से गौ माता इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है और उसके लिए एक अफवाह पर किसी की हत्या भी कर दी जाती है ? यानि कानून को जानकारी देना भी आवश्यक नहीं समझा जाता ? तो धर्मों के ठेकेदार और गौरक्षक अब संविधान और कानून से इतने उपर हो गये कि वे फैसला और सजा खुद ही देंगे ? क्या हमारा कानून और संविधान इतना नकारा हो चुका है ?

100 किलो बीफ से भरी वैन में लोगों ने लगाई आग

अब ऐसी परिस्थित में मैं मौन कैसे रह सकता था मोदी जी की तरह ? मैं न तो मोदी जी जितना महान हूँ और न ही कभी हो सकता हूँ | वे आदरणीय हैं और रहेंगे क्योंकि कुछ तो विशेषता व योग्यता है उनमें जो वे सर्वोच्च पद पर आसीन हैं | तो मेरा सन्यास धर्म कहता है कि यदि गलत होता दिख रहा है तो खुलकर विरोध करो, चाहे अकेले ही विरोध करना पड़े | फिर मेरा सन्यास धर्म कहता है कि जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन या नौ दिवसीय अनिश्चित कालीन आमरण अनशन करने का काम सन्यासियों का नहीं है | संन्यासी अपनी ही तरह के प्रयोग करता है और उसी प्रयोग का परिणाम है कि आपको मेरे विरोध में आना पड़ा | और यह एक अच्छा संकेत है कि मेरा प्रयोग बहुत हद तक सफल रहा | यह मेरा प्रयोग ही था कि आज जब हर मुस्लिम गेरुआधारियों से नफरत करने लगा था, तब मुझसे आज अधिकांश मुस्लिम जुड़ना चाहते हैं | इसलिए नहीं कि मैं उनको गौमांस खिलाता हूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं गलत का विरोध करना जानता हूँ | फिर गलत कोई अपना ही क्यों न कर रहा हो |  आज मेरे साथ कितने ऐसे मुस्लिम जुड़ चुके हैं जो अपने ही समुदाय में कुछ गलत होता दिखता है तो खुलकर विरोध करते हैं | यदि सभी इसी प्रकार अपने अपने सम्प्रदायों की कुरीतियों, उपद्रवियों का विरोध कम से कम सोशल मिडिया में ही करने लगें तो समाज में स्वतः ही एक नई चेतना जागृत हो जायेगी |

फिर यह भी समझना चाहिए कि जिस देश में किसानों को आत्महत्या के लिय विवश होना पड़े, जिस देश में खेत बेचकर बच्चों के लिए नौकरी खरीदनी पड़े, जिस देश में गाय लावारिस सड़कों में घूमती मिलें… उस देश में अचानक से गौमांस के लिए इतना उपद्रव हो जाना क्या किसी सम्प्रदाय विशेष के प्रति सोची समझी साजिश नहीं है ? कहीं जानबूझ कर दो समुदायों को आपस में उलझाने या दंगा करवाने की साजिश तो नहीं है ? कहीं 1947 फिर से दोहराकर देश को फिर से विभाजित करवाने की  साजिश तो नहीं है ?

होना तो यह चाहिए था कि सभी गौरक्षक सड़कों में लावारिस घूमती गायों के लिए कोई उचित व्यवस्था करते और दिखाते कि वे कितने अच्छी तरह से देखभाल कर रहे हैं गायों की तो बाकी लोग भी स्वतः ही सम्मान करने लगते | मेरा पूरा विश्वास है कि मुस्लिम भी स्वतः ही सहयोग के लिए आगे आते | लेकिन इसके विपरीत उपद्रव मचाना शुरू कर दिया और राजनेताओं के विवादित बयान आने लगे | ऐसे समय में यदि मैंने सद्भाव बनाये रखने का प्रयत्न किया, अपने ही लोगों से दुश्मनी लेकर तो क्या गलत किया ? कितनी बार मुझे जान से मारने कि भी धमकी दी गयी… लेकिन मैं जानता हूँ कि मरना तो है ही एक दिन.. तो मरने से पहले देश में सौहार्द बनाये रखने का प्रयत्न तो कर ही सकता हूँ | तो मैंने क्या गलत किया ?

अब यदि मेरे तर्कों व तथ्यों से कट्टर हिन्दू मुझसे दूर हुए और मुस्लिम समुदाय मुझसे जुड़ा और उनके दिल में मेरे लिए थोड़ी भी जगह बनी तो हिन्दुओं को क्यों अखर रहा है ? जबकि मेरी सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाला हिन्दू है या मुस्लिम है, यदि सभ्य व संस्कारी है तो सभी स्वीकार्य हैं और असभ्य व असंस्कारी है तो बड़ा से बड़ा अधिकारी या नेता भी हो तो उसे मित्र सूचि से बाहर कर देता हूँ |

बाबा लोग शादी क्‍यों नहीं करते हैं, अपनी रोटी कमाकर क्‍यों नहीं खाते हैं ?
यह प्रश्न भी मुझसे कई बार पूछे जा चुके हैं | बाबा होना या संयासी होना वर्तमान समय में एक पाखण्ड बनकर रह गया है | भारतीय परंपरा के अनुसार जब कोई व्यक्ति सन्यास लेता है तो वह अपना नाम त्याग करता है – गृहस्थ की वेषभूषा त्याग करता है – पत्नी-बच्चों का तथा समस्त पारिवारिक सम्बन्धों का त्याग करता है – धन-संपत्ति का त्याग करता है – अपनी दैहिक विषय वासनाओं का त्याग करता है – अपने पद या पदवी का त्याग करता है – गृह का त्याग करता है – निरन्तर चलायमान रह कर देशाटन करता हुआ – ज्ञानार्जन करता हुआ – ज्ञान वितरित करता हुआ – भिक्षाटन से जीवन यापन करता है – इत्यादि इत्यादि लक्षणों को एक सन्यासी के गुण अथवा कर्तव्य माने गये हैं | लेकिन क्या वास्तव में कोई सन्यासी आपको मिला ऐसा जो सामाजिक चेतना व जागरण के लिए कार्य कर रहा हो ? क्या कोई संन्यासी या बाबा मिला आपको ऐसा जो सामजिक कुरीति, शोषण, भेदभाव को दूर करने के प्रयोजन में लगा हो ? उलटे आज साधू सन्यासी ही दो सम्प्रदायों, जातियों में फूट डालने के कामों में व्यस्त हैं | संन्यासी को केवल अपनी आवश्यकता की वस्तुएं ही रखनी होती हैं और कोई संग्रह नहीं करना होता है, जबकि आज सन्यासी तो सांसद भी बनते हैं, राजनीति भी करते हैं, महंगी सुखसुविधाएँ भी भोगते हैं ? यही सब देखकर मैंने एक दिन पोस्ट डाला था कि जब बाबा लोग व्यापार कर सकते हैं, जब बाबा लोग चुनाव लड़ सकते हैं, जब बाबा लोग ज़ेड सिक्यूरिटी ले सकते हैं… तो विवाह क्यों नहीं कर सकते ?

तो ये लोग जो घर परिवार छोड़कर भागे हैं अविवाहित होने का ढोंग करते हैं जबकि सारे भोग करते हैं परदे के पीछे, इनका मुख्य उद्देश्य भौतिक सुख सम्पदा ही होता है, अध्यात्म से कुछ लेना देना नही रहता | बहुत ही कम ऐसे मिलेंगे जो वास्तव में आध्यात्मिक चिंतन मनन में लगे हों | और आप तो स्वयं पुलिस विभाग से हैं तो आप से बेहतर कौन जान सकता है कि वास्तविक ध्यानी या योगी कौन हैं ?

ब्रह्मचर्य किसलिये ? क्‍या आप अपने भगवान या प्रकृति से बड़े हो गये हैं और ज्‍यादा समझदार हो गये हैं ?ब्रम्हचर्य का जो अर्थ साधू समाज और पंडित पुरोहित समझाते चले आये आज तक वह भी मेरी नजर में सही नहीं है | उन्होंने ब्रह्मचर्य का एक ही अर्थ लगाया कि स्त्री से दूर रहो अर्थात वीर्य संचयन | जबकि सन्यासी को तो किसी भी चीज को संचय नहीं करना चाहिए ऐसा मेरा मानना है | उसे तो मुक्त भाव से रहना चाहिए लेकिन ब्रम्हचर्य को सम्भोग से दूर रहने को ही माना जाता है | वास्तव में ब्रम्हांड या सृष्टि के साथ तारतम्यता रखना ही ब्रम्हचर्य है | और ब्रम्हचर्य के अंतर्गत विवाह भी होना चाहिए | यदि मेरी परिभाषा के अनुसार ब्रम्हचर्य को समझाऊँ तो पशु-पक्षी ब्रहचर्य का विधिवत पालन करते हैं | वे सूर्योदय से पहले उठते हैं और सूर्यास्त पर सोने चले जाते हैं | जो निशाचर हैं वे सूर्यास्त के बाद उठते है और सूर्योदय से पहले सोने चले जाते हैं | तो यह ब्रह्मचर्य है | न कि केवल वीर्य संचयन करने से कोई ब्रम्हचारी हो जाता है | बाकि ये लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ व उग्र हो जाते हैं | मैं स्वयं की स्थिति देखता हूँ कई बार तो पता चलता है कि मैं बहुत ही उग्र हो चुका हूँ अनावश्यक रूप से | चूँकि एकांतवास में हूँ तो पता नहीं चल पाता, हाँ जब कोई बाहरी व्यक्ति आ जाता है तो बेचैनी होने लगती है और तब पता चलता है कि क्रोध कितना भर गया है मुझमें | लेकिन ध्यान आदि से स्वयं को सामान्य भी कर लेता हूँ |

तो आपने जो प्रश्न किया वह मुझपर लागू नहीं होते क्योंकि मैं जिस परंपरा के अंतर्गत आता हूँ उसमें मुझे विवाह करने की छूट प्राप्त है | हमारे मिशन के संस्थापक ने विवाह को आध्यात्म में बाधा नहीं, बल्कि सहयोग माना है | उनका मानना था कि स्त्री और पुरुष दो शक्तियाँ हैं और दोनों का जब संगम होता है तभी एक चक्र पूरा होता है और तभी सम्पूर्णता आती है | तो मेरा विवाह न हो पाने का कारण था कि मेरे योग्य कोई लड़की मिली ही नहीं क्योंकि मेरे लिए विवाह एक महत्वपूर्ण घटना थी और जीवन साथी के साथ मानसिक धरातल पर भी सहयोगिता होनी चाहिए, केवल दैहिक नहीं | लेकिन अब मैं उस स्थिति में पहुँच गया हूँ जहाँ मुझे किसी दूसरे की आवश्यकता नहीं महसूस होती तो विवाह मेरे लिए अब आवश्यकता नहीं रह गयी | अब यह कहना कि मैं सन्यास धर्म का पालन नहीं कर रहा तो वह भी गलत होगा क्योंकि मैं जनचेतना जगाने, व आपसी सद्भाव बनाये रखने के लिए निरंतर सोलह् से बीस घंटे काम करता हूँ | और उसीका परिणाम है कि मेरे पोस्ट पर आपको मुस्लिम भी सद्भाव से भरे ही मिलेंगे यह जानते हुए भी कि मैं एक सन्यासी हूँ | आप यह भी कह सकते हैं कि मैं उनकी पसंद की बातें करता हूँ इसलिए वे लोग मुझसे जुड़े हुए हैं… लेकिन मैं उनके किसी गलत का भी उसी प्रकार विरोध करता हूँ जैसे हिन्दुओं के गलत का करता हूँ | और उस समय कई मुस्लिम भी मुझसे अलग हो जाते हैं | तो आज जो मित्र जुड़े हुए हैं उनमें अधिकाँश वे लोग हैं जो धर्म और जाति के आधार पर सही या गलत को नहीं आँकते बल्कि जो गलत है उसे गलत ही मानते हैं फिर चाहे वे उनके अपने ही सम्प्रदाय या जाति से क्यों न हों | तो मैं संन्यास का वह कर्तव्य निभा रहा हूँ जो एक संन्यासी को करना चाहिए | यानि राष्ट्र में सौहार्द बने रहे इसके लिए निरंतर प्रयत्न करते रहना | अब संन्यास की जो बातें आप बता रहे हैं चाणक्य के समय की उसमें भी आपने नहीं सुना होगा कहीं कि कोई साधारण गृहस्थ संन्यास लेता था | अधिकांशतः केवल उच्चकुल जैसे राजा, सेनापति जैसे लोग ही सन्यास लेते थे क्योंकि वे सारे भोगों को भोग चुके होते थे और किसी भी तरह की भोग की कामना से वे मुक्त हो चुके होते थे | लेकिन वह संन्यास और बौद्धकाल से शुरू हुए संन्यास में अंतर है | पहले जो संन्यास था वह वानप्रस्थ आश्रम के बाद आता था अर्थात सारे सुखों को छोडकर अंतिम समय वनों में गुजारना या स्वेच्छा से प्रचार प्रसार के कार्यो में देशाटन करना | लेकिन आज वानप्रस्थ आश्रम के स्थान पर वृद्ध आश्रम या ओल्ड एज होम ने लिया | वहीँ हम जिस सन्यास में चल रहे हैं वह विविध है | हर अखाड़ों और आश्रमों के अनुसार अपने अपने नियम हैं संन्यास के | हमारे यहाँ संन्यासी को स्वतंत्रता प्राप्त है कि वह स्वयं को खोजे और स्वयं कि पहचान करे या ध्यान भजन और कीर्तन करे और आश्रम के रख रखाव में योगदान दे |

ओशो संन्यास की परिभाषा इस तरह करते हैं: “अपना जीवन समग्रता से जीना और जिसकी परम और एकमात्र शर्त है: सजगता, ध्यान। संन्यास आंदोलन का अर्थ है: सत्यके खोजियों का आंदोलन। और आंदोलन एक बहाव है, वही उसका अर्थ है। वह बहता रहता है, विकसित होता है।”

ओशो ने यह भी कहा है: “जो भी बाह्य है उसे छोड़नेकी मैं भरसक कोशिश कर रहा हूं ताकि सिर्फ आंतरिक रह जाए जिसका तुम अन्वेषण कर सको।”

अब आते है दान और दान की महिमा पर
दान की आवश्यकता हम संन्यासियों को इसलिए पड़ती है क्योंकि हम कुछ कमाते नहीं हैं | चूँकि हम कुछ कमाते नहीं है इसलिए समाज को लगता है कि हम मुफ्तखोर हैं | लेकिन आज हम देखें तो सन्यासी तो बड़े बड़े व्यापार में लिप्त हैं | यदि सन्यासी भी गृहस्थों के सारे कार्य करने लगे, नौकरी करें, बच्चे पाले तो फिर उसमें और बाकी गृहस्थों में अंतर ही क्या रह जाएगा | फिर वह सन्यासी भी स्वयं का कहाँ खोज पायेगा यदि वह पैसे कमाने के चक्कर में पड़ जाएगा ? वह भी फिर भेड़चाल में ही  चल पड़ेगा कुछ नया कैसे खोज पायेगा ?

यदि मैं जो काम यहाँ नियमित करता हूँ जितने लेख लिखता हूँ या समाज को दिशा दिखाने का प्रयत्न करता हूँ वही सब मैं कीमत लगाकर बेचना शुरू कर दूँ तो लोग मुझे भी व्यापारी कहेंगे | मैं जो काम कर रहा हूँ वही काम यदि उपदेशक बनकर, या प्रचारक बनकर करूँ तो लोग अच्छी कीमत भी देने को तैयार हो जायेंगे | लेकिन इससे मैं फिर चक्रव्यूह में फंस जाऊँगा | मैं उतनी स्वतंत्रता से नहीं लिख पाऊंगा जितनी कि अभी लिख पा रहा हूँ | क्योंकि तब मुझे लाभ हानि, पसंद न पसंद का डर सताएगा | जैसे अभी मैं आपके लिए जो उत्तर लिख रहा हूँ उसमें मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि मेरे उत्तर से आप सहमत होंगे या नहीं | न ही इस बात की चिंता कर रहा हूँ कि दूसरे लोग क्या समझेंगे ? न ही इस बात की चिंता कर रहा हूँ कि किसी विद्वान् ने पढ़ लिया तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगा | यहाँ मैं स्वतंत्र हूँ अपने उत्तर अपने ही तरीके से देने के लिए |

तो दान से मुझे यह सुविधा हो जाती है कि किसी एक पर बोझ नहीं पड़ता और जो लोग समय समय पर मेरे लेखों से प्रभावित होकर सौ दो सौ रूपये भेजते रहते हैं, उससे कम से कम मेरा इन्टरनेट आदि चलता रहता है और मैं नियमित अपने विचारों से समाज को अवगत करवाता रहता हूँ | यही काम पहले साधू सन्यासी घूम घूम कर करते थे क्योंकि तब यह सब सुविघा नहीं थी | आज मैं घुमने निकलूँ तो कोई नहीं आएगा एक डेढ़ घंटे के मेरे भाषण या प्रवचन सुनने क्योंकि जनता वही सुनती है जो उसे सुनना होता है | और मैं वही कहता हूँ जो मुझे कहना होता है | इसलिए मैंने सोशल मीडिया को चुना अपनी बातें कहने के लिए | अब इसमें हर किसी को सुविधा कि वह मुझे पढ़े या न पढ़े | तो मैं समाज के लिए ही काम कर रहा हूँ तो समाज का भी दायित्व बनता है कि वह मुझे सहयोग करे यदि उसे लगता है कि मैं सही हूँ | तो यहाँ किसी को आपत्ति क्यों है दान लेने पर ? यहाँ एक बात और बता दूँ कि हमारा आश्रम दान पर निर्भर नहीं है | हाँ मैं कभी कभी सहयोग अवश्य मांग लेता हूँ सोशल मीडिया में जुड़े अपने मित्रों से… हालांकि वह भी आश्रम के नियमों के विरुद्ध है |

वहीँ जब कोई नेता या पार्टी दान मांगती है तो कोई आपत्ति नहीं करता क्यों ? जबकि वे तो देश को लूटकर खुद ही अमीर होते जाते हैं और जनता को महँगाई और भुखमरी के बोझ से दबाती चली जाती है | लेकिन मैं तो ऐसा कुछ नहीं करता | बाकि बाबा लोग क्या कर रहे हैं वह तो सारी दुनिया जानती ही है, यहाँ तो मैं अपने ही विषय में बता सकता हूँ |

अब दान का महत्व भी समझ लें
धन को द्रव्य या जल पदार्थ माना जाता है | जल यदि प्रवाह में रहे तो सार्थक शुभ माना जाता है और यदि ठहरा रहे तो बिमारी का घर बन जाता है | जो लोग धन संग्रह में अधिक बल देते हैं और कंजूस से महाकंजूस होते जाते हैं, उनका धन जानलेवा हो जाता है और उन्हें अकाल मृत्यु तक पहुँचा देता है | डकैती, चोरी, अपने ही सगे संबंधियों द्वारा हत्या… ये सब धन के अनावश्यक संचय से बनी बीमारियों के परिणाम हैं | फिर आप कितना भी धन संचय करें, डॉक्टर तो आपसे आये दिन झटक ही लेता है, वहीँ आप देखेंगे कि विदेशी लोग जो धन संचय होते ही दूर देशों के भ्रमण पर निकल जाते हैं और खुलकर खर्च करते हैं | वे समय समय पर दान भी करते रहते हैं जिसके कारण भारत के ही कई अनाथ आश्रम और वृद्धाआश्रम चल पा रहे हैं | भारतीय चूँकि अब दान करने में कंजूसी करने लगे हैं, इसलिए बाबाओं को विदेशों के चक्कर लगाने पड़ते हैं | तो दान का महत्व शास्त्रों में भी लिखा है | और यह सब व्यर्थ बातें नहीं हैं | यह आपकी इच्छा है कि आप दान मुझे करें, किसी राजनैतिक पार्टी को करें, या अनाथ आश्रम में करें | लेकिन यह मानकर चलना कि आप लोग नौकरी कर रहे हैं और मेहनत कि खा रहे हैं, जबकि हम हरामखोरी कर रहे हैं वह गलत है | आप अपना काम कर रहे हैं और मैं अपना काम कर रहा हूँ | आप वह काम कर रहे हैं जो आपको ठीक लगा, मैं वह काम कर रहा हूँ जो मुझे ठीक लगा | आपने जब अपना काम चुना तो आपको सहयोग मिला और आप वहाँ पहुँचे जहाँ अभी हैं | और मैंने जब अपना काम चुना तो मुझे सहयोग मिला और मैं वहाँ पहुँचा जहाँ अभी मैं हूँ | आपको अपने काम की कीमत सरकार से मिलती है और वह निश्चित है | मुझे मेरे काम की कीमत अनजान अपरिचितों से मिलती रहती है और अनियमित है | लेकिन यदि आप ध्यान दें तो हम दोनों को देने वाले व्यक्ति एक ही हैं | आपको टैक्स के रूप में प्राप्त धन से तनखा मिलता है और मुझे दान या सहयोग के रूप में | यही लोग व्यापारियों को भी देते हैं और यही लोग अनाथ आश्रम को भी देते हैं…. तो देने वाले तो वही लोग हैं | तो दान का अर्थ है सहयोग करना | और धर्म का मूल सिद्धांत है सहयोगी होना | जिस प्रकार सभी के अँगुलियों के निशाँ आपस में नहीं मिलते उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव व व्यव्हार भी सामान नहीं हो सकता | सभी भेड़चाल में नहीं चल सकते इसलिए कुछ मेरी तरह सनकी सन्यासी बन जाते हैं |  तो मुझे जो कुछ भी प्राप्त होगा वह समयानुकुल होगा क्योंकि मैं किसी पद प्रतिष्ठा की कामना लिए हुए नहीं बैठा हूँ |

फिर आपने कहा कि राजनीति में क्यों नहीं आ जाते पाखण्ड छोडकर | तो आपको स्पष्ट कर दूँ कि मैं कोई पाखण्ड नहीं कर रहा | जो हूँ जैसा हूँ वैसा ही लिखता हूँ और दिखता हूँ | रही राजनीती की बात तो जब समय आएगा तब मुझे उसमें भी परहेज नहीं है…. क्योंकि मैं परहेजी सन्यासी भी नहीं हूँ | धर्म को जानता हूँ और धर्मानुसार ही आचरण करता हूँ | यहाँ में शास्त्रोक्त धर्म की बात नहीं कर रहा, बल्कि सनातन धर्म की बात कर रहा हूँ | शास्त्रोक्त धर्मों के ज्ञाताओं ने तो धर्मों के नाम पर मार-काट ही मचाई है और वर्तमान में भी सभी देख ही रहे हैं धर्म के नाम पर हो रहे क़त्ल-ऐ-आम | तो शास्त्रोक्त धर्मों में मेरी रूचि बचपन से ही नहीं रही क्योंकि ये मानवता नहीं सिखा पाई आज तक तो सनातन धर्म क्या सिखा पाएगी किसी को ?

आपने कहा कि मैं सनातन धर्म का प्रमाणिक प्रवक्ता बनता दिखाई देता हूँ… तो स्पष्ट कर दूँ कि मैं दिखता ही नहीं बल्कि हूँ प्रमाणिक | सनातन का प्रवक्ता हूँ इसका प्रमाण है मेरी साँसें चलना, मेरा लिखना बोलना.. और यह सब कर पा रहा हूँ आज तक तो वह सारी सुविधाएँ ईश्वर से ही प्राप्त हुईं हैं | आज जब कोई किसी को दस रूपये मुफ्त में देने को तैयार नहीं है, ऐसे समय में मुझे इन्टरनेट से लेकर खाने पीने तक सुविधा ऐसे आश्रम में प्राप्त हो जाना जो कि कभी टाइपराइटर भी नहीं रखते थे, तो यह ईश्वरीय चमत्कार ही है | तो यह जीवंत व प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मैं सनातन धर्म का ही प्रचारक हूँ किसी किताबी धर्म का नहीं | और सनातन धर्म किताबों से नहीं समझा जा सकता, उसे समझने के लिए प्रकृति के साथ  समय गुजारना पड़ता है , वन्य जीवों की जीवन शैली को समझना पड़ता है, तब जाकर सनातन धर्म समझ में आता है | किताबी धर्मों से तो केवल सम्प्रदाय ही बनते हैं और आपस में मारकाट करते हैं |

अभी जो काम मेरे पास है वह किसी व्यक्ति, पार्टी या कंपनी से प्राप्त न होकर सीधे ईश्वर से प्राप्त है, वह कर रहा हूँ कल जो काम मिलेगा वह करूँगा लेकिन किसी और की शर्तों पर नहीं, अपनी ही शर्तों पर | मैंने आज तक जिंदगी अपनी ही शर्तो पर जी है और आगे भी जियूँगा | जिस दिन दूसरों की शर्तों पर जीना पड़े उससे पहले मरना पसंद करूँगा | और धंधे की जो बात कही आपने कि मेरा बाबागिरी का धंधा चमकने वाला है… .तो यह बात उचित इसलिए नहीं है क्योंकि जब पुलिसवाले धंधे में लगे हुए हैं अपने कर्तव्यों को छोड़कर, जब न्यायपालिका एक व्यावसायिक क्षेत्र बन गया है और न्याय खरीदे और बेचे जाते हैं जबकि गरीब बेचारा कीमत न चुका पाने के कारण न्याय से वंचित रह जाता है, जब सांसद खरीदे और बेचे जाते हैं, जब शिक्षा खुद एक व्यवसाय बन चुका है लेकिन बेरोजगारों की भीड़ बढ़ती जा रही है…. ऐसे में मेरा समाज के लिए निःशुल्क काम करना भी आपको यदि धन्धा लग रहा है तो दुःख की बात है |

इससे अधिक विस्तार से उत्तर नहीं दे सकता | सन्यास के विषय में मेरे विचार से आप ही नहीं, सभी शास्त्रों के जानकार व विद्वान् असहमत हो सकते हैं, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं सही हूँ और आज नहीं तो कल दुनिया भी मानेगी कि मैं सही था, चाहे मेरी मृत्यु के बाद ही सही | हाँ कुछ लिंक्स नीचे दे रहा हूँ मेर उत्तर से ही सम्बंधित हैं जो सहायता कर सकते हैं मेरे कथन को अधिक विस्तार से समझने में |


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