धर्मानुसार चलने का मतलब वह नहीं जो धर्मों के ठेकेदार समझाते हैं….

प्रश्न – धर्म का मूल क्या है?

उत्तर – स्वार्थ का त्याग तथा दूसरों का हित |

प्रश्न – धर्म का प्रचार कैसे करें?

उत्तर – धर्म के अनुसार खुद चलें – इसके समान धर्म का प्रचार कोई नहीं है |

प्रश्न – विजय धर्म की ही होती है, पर आजकल कहीं- कहीं अधर्म की विजय और धर्म की हार होती हुई क्यों दीखती है?

उत्तर – जब मनुष्य सुखासक्ति के कारण असत् को महत्व देता है, तब हार होती है | वास्तव में हार होती नहीं, पर दीखती ऐसा है कि हार हो गयी |

                                                                                     ~स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज


 स्वामी जी ने जो कहा उसे यदि धर्मों के ठेकेदार समझ गये होते या धार्मिक लोग ही समझ गये होते तो भारतीय धर्म एक दड़बाछाप धर्म में परिवर्तित न हो गया होता | न ही आजादी के बाद से लेकर आज तक राष्ट्र को उन्नत, समृद्ध व आत्मनिर्भर करने के स्थान पर मंदिर-मस्जिदों और आरक्षण के लिए लड़ रहे होते |

  • धर्मानुसार चलने का मतलब वह नहीं जो आप धर्मों के ठेकेदारों, उनके दुमछल्लों और बेरोजगारों, गुंडों-मवालियों के संगठनों और सेनाओं को धर्मों की रक्षा के नाम पर करते देखते हैं | 
  • धर्मानुसार चलने का अर्थ है वह कार्य करना, जिसमें सभी का कल्याण होता हो, पर अपनी हानि न होती हो | 
  • धर्मानुसार चलने का अर्थ स्वयं को समृद्ध करना लेकिन किसी का अहित न करना | 
  • धर्मानुसार चलने का अर्थ स्वयं को समर्थ करना और कमजोर व असहायों के लिए सहयोगी होना |
  • धर्मानुसार चलने का अर्थ किसी के दबाव में अपनी मान्यताओं को या उपासना/आराधना की विधि को न बदलना लेकिन उसके कारण किसी को असुविधा न हो, इस बात का ध्यान रखना |
  • धर्मानुसार चलने का अर्थ स्वयं की मान्यताओं को दूसरों पर न थोपना लेकिन स्वयं इतना सरल व सहज हो जाना कि हर मान्यताओं व मतों के लोग आपसे सहजता से जुड़ जाएँ |
  • धर्मानुसार चलने का अर्थ, अधर्मियों का किसी भी रूप में समर्थन या सहयोग न करना न ही उनसे डरना है, बल्कि आवश्यकता पड़े आमने सामने की लड़ाई के लिए भी तैयार रहना है | फिर चाहे इस लड़ाई में आपकी मृत्यु ही क्यों न हो जाए | 
  • जघन्य अपराधों में लिप्त अपराधियों, भ्रष्टाचारियों, आतंकियों, गुंडों-मवालियों, राष्ट्रद्रोहियों को यदि आप किसी भी भय या लोभवश समर्थन देते हैं, या उनका प्रतिकार या विरोध नहीं करते तो आप अधर्मी हैं | फिर आ चाहे कितने भी बड़े पुजारी-नमाजी, दानी, प्रेम व दया के सागर ही क्यों न हों |
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धर्म की विजय का अर्थ आप और आपके पड़ोसियों के बीच आपसी सौहार्द इतना प्रगाढ़ हो जाये, कि शत्रु या विरोधी आपस में कोई मतभेद न पैदा कर पायें | उदाहरण के लिए दादरी के अख़लाक़ पर जब हमला हुआ तो उसने अपने बचपन के हिन्दू मित्र को फोन किया, लेकिन दुर्भाग्य से वह समय पर नहीं पहुँच पाया और पहुँच भी जाता तो शैतानों की भीड़ उसे भी मार ही देती शायद | लेकिन यहाँ दोनों मित्र रहे बचपन से भिन्न मत व मान्यताओं को मानते हुए भी | तो यह मित्रता वास्तविक मित्रता थी और यहाँ उस मित्र का धर्म था कि वह अपने मित्र की सहायता के लिए पहुँचे और वह पहुँचा भी | तो यहाँ पहली नजर में दिखेगा कि मित्र धर्म की हार हुई, लेकिन गहराई से देखें तो यह मित्र धर्म की जीत ही थी कि हिन्दुओं ने ही आक्रमण किया एक मुस्लिम परिवार पर, लेकिन उस मुस्लिम ने हिन्दू मित्र को ही याद किया अपने अंतिम समय में…. तो इससे बड़ा उदाहरण और कोई नहीं हो सकता धर्म के विजय का |

एक और उदाहरण यहाँ मेरी फेसबुक मित्र ने दिया कि उनके पडोसी जो कि मुस्लिम हैं उन्होंने बहुत मेहनत से एक एक पैसा जोड़कर अपना मकान बनवाया | एक दिन अचानक शहर में दंगा भड़कने की आशंका फ़ैल गयी और वह पड़ोसी कहीं बाहर था, उसका फोन आया कि वह उनके मकान को अपने नाम करवा ले कोर्ट में सारे दस्तावेज वह भिजवा देगा | इनको बहुत ही आश्चर्य हुआ और पूछा कि ऐसा क्यों कर रहे हो ? उसने कहा कि हमारा कोई भरोसा नहीं है, कभी भी मारे जायेंगे इस दंगे में, कम से कम हमें इस बात की ख़ुशी रहेगी कि हमारा मकान हमारी बहन के काम तो आया |

जब फेसबुक मित्र ने मुझे यह बातें बताई तो मेरे आँखें भर आईं थीं | यहाँ देखने को मिला कि धर्म आपस में नफरत नहीं सिखाता, बल्कि अपने पड़ोसी के प्रति अपनत्व का भाव बढ़ाता है | वह मुस्लिम परिवार, मरने को लेकर इतना चिन्त्तित नहीं था, जितना कि इस बात से चिंतित था कि मरने के बाद उसका मकान उसकी मुँहबोली हिन्दू बहन को ही मिले |

इसलिए धर्म को समझिये ! धर्म वह नहीं जो ये रट्टामार मौलवी, पंडित, और धर्मों के ठेकेदार समझाते हैं और जिसकी रक्षा के लिए ये सड़कछाप टपोरी त्रिशूल, तलवार और एके४७ लेकर क़त्ल-ऐ-आम करते फिरते हैं | जिस दिन एक साधारण आम व्यक्ति भी धर्म को सही रूप में समझ जाएगा, उस दिन इन भेड़ियों का आस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और राष्ट्र को विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे शासक व शुभचिंतक मिल सकते हैं |

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मुझसे कई बार धार्मिक लोग कहते हैं कि लोगों ने धर्म को नहीं समझा इसलिए वे उत्पात कर रहे हैं, लेकिन जब मैं पूछता हूँ कि आपने समझा तो कहते हैं कि हम धर्मग्रंथों में जो लिखा है उसके अनुसार ही आचरण करते हैं, क़त्ल-ऐ-आम नहीं करते फिरते निर्दोषों और मासूमों का | तो यदि आप मानते हैं कि आप धार्मिक हैं और सही मार्ग पर हैं तो हर धर्मग्रन्थ एक बात कही है अन्यायी व अत्याचारी का साथ मत दो और न ही उनसे डरो, फिर जब आप किसी पर अत्याचार होते देखते हैं और दुम दबाकर भाग लेते हैं, तो क्या आपने धर्म का पालन किया ? सभी धार्मिक ग्रन्थ कहते हैं ईश्वर के सिवाय किसी से न डरो और न किसी के सामने झुको, लेकिन आप सड़कछाप मवालियों, गुंडों से डर जाते हैं, आप भ्रष्ट, दागी नेताओं को वोट देकर उन समर्थन करते हैं उनके सामने नतमस्तक होते हैं… तो क्या आप धर्मानुसार आचरण कर रहे हैं ?

जब तक जघन्य अपराधियों और मूर्खों को हम वोट देते रहेंगे, न धर्म की स्थापना हो पायगी इस देश में और न ही सुखी व समृद्ध हो पाएंगे | शैतानों को वोट देकर अधर्मियों को सत्ता सौंपने से राष्ट्र का भला कभी नहीं हो सकता यह आप सभी ने देख ही लिया है आजादी के बाद से लेकर आज तक | शैतानों के शिकारी नरभक्षी कुत्तों से भयभीत होने से और आँखें मूँद लेने से एक दिन आप सभी धार्मिकों, अध्यात्मिकों और बुद्धिजीवियों का भी वही हश्र होगा जो ईराक में हुआ उन लोगों का जिन्होंने कभी अन्याय का विरोध नहीं किया, सीरिया में हुआ उन लोगों का जो यह मानकर चल रहे थे कि अल्लाह आकर बचा लेगा, सोमनाथ मंदिर में हुआ उन लोगों का जो ईश्वर के भरोसे बैठे थे कि हम तो ईश्वर के सच्चे भक्त हैं, हम तो लड़ाई-झगड़ों से दूर रहते हैं…. और परिणाम होता है शरणार्थी बनकर उन लोगों से शरण माँगना, जिनको हम अधर्मी और काफिर मानते रहे और उनको मिटाने के सपने देखते रहे |

तो धर्म का मतलब शास्त्रों को रटना, पाँच वक्त की नमाज पढ़ना, मंदिरों में जाकर सवा रूपये का प्रसाद चढ़ा देना, पंडितों और पितरों को श्राद्ध खिला खिला देना, हरे-रामा हरे-कृष्णा करने दुनिया भर में नाचते फिरना…… ये सब धर्म नहीं हैं | धर्म है स्थान परिस्थिति व आवश्यकतानुसार आचरण करना | जहाँ युद्ध करना हो, वहाँ युद्ध ही करें, भजन कीर्तन नहीं और जहाँ भजन कीर्तन हो रहा हो, वहाँ भजन कीर्तन ही करें, युद्ध नहीं, यही धर्म है | ~विशुद्ध चैतन्य

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एक दिन इन्हीं सच्चे धार्मिकों की तरह अपना देश छोड़कर भागना पड़ेगा |

नीचे कुछ लिंक्स दे रहा हूँ जिसमें आप देखेंगे कि किस प्रकार समाज को सही दिखाने वालों और धर्म के पथ पर चलने वालों को मौत के घाट उतार दिया जाता हैं | वही जो लोग समाज में नफरत और हिंसा को बढ़ावा देते हैं, उन्हें समाज न केवल अपना नेता चुनता है, बल्कि उन्हें सारी ताकत व समर्थन भी देता है | और परिणाम यह होता है कि हर आवारा कुत्तों का झुण्ड खुद को धार्मिक समझने लगता है और आये दिन किसी न किसी की हत्या करके खुद को धार्मिक सिद्ध करने का प्रयास करता है | यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि जो धर्म के मार्ग पर नहीं हैं उन्हें धार्मिक माना जाता है, और जो धर्म के मार्ग पर हैं, उन्हें मृत्युदंड दे दिया जाता है |

Family of Afghan Mob Murder Victim Farkhunda: We Live In Fear

इसके अलावा हम देखें निम्न लिंक्स पर कि कैसे धर्म और जाति के नाम पर कट्टरपंथी धार्मिक लोग नरभक्षी शिकारी कुत्ते बन जाते हैं और

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