मेरे जाने से पहले…


मेरा विरोधी कोई भी मानवतावादी नहीं है । केवल वही लोग मेरे विरोधी हैं जिन्होंने दड़बों को ब्रह्माण्ड समझ रखा है और दड़बों के तथाकथित मालिको जिन्हें में ठेकेदार कहता हूँ उनका गुलाम समझ रखा है खुद को। सम्प्रदायों को धर्म मान रखा है और वर्ण व जाति को पहचान समझ रखा है ऐसे ही लोग मेरे विरोधी हैं । क्योंकि वे सदियों पुराने पिस्सुओं खटमलों से भरे कम्बल को छोड़ना नहीं चाहते और न ही धार्मिक रंगीन चश्मा उतारकर दुनिया का असली सौंदर्य देखना चाहते हैं । उन्हें डर है की यदि उन्होंने ऐसा किया तो दड़बे के मालिकों के पालतू कुत्ते उन्हें उसी प्रकार नोच खाएंगे जैसे कलिबुरगि को खा गए, जैसे दाभोलकर को खा गए, जैसे बांग्लादेश में ब्लॉगर को खा गए जैसे पकिस्तान में ओशो समर्थक बिजनेसमेन को खा गए ।

आये दिन उनके शिकारी नरभक्षी कुत्ते हम जैसे दड़बों से स्वतंत्र जीवों का शिकार करते रहते हैं । लेकिन जिन्होंने स्वतंत्रता को समझ लिया हो, ईश्वर व ब्रम्ह को जान लिया हो, वह किसी की गुलामी क्यों स्वीकार करेगा भला ? मृत्यु भी स्वतंत्रता ही है और वह भेड़-बकरियों और गुलामों का जीवन जीने के बजाय सहर्ष मृत्यु को स्वीकार करेगा ।

और जिन्हें मौत से भय लगता हो वे दड़बों से बाहर क्यों निकलना चाहेगा ? उनमे तो इतना भी साहस नहीं है कि सदियों से उनका खून चूस रहे पिस्सुओं से अपना कम्बल ही झाड़ ले । उनमे तो इतना भी साहस नहीं है कि अपने दड़बों में बीमार लाचार लोगों की देखरेख ही कर लें । उनमे तो इतना भी साहस नहीं है कि दंगों के नाम पर मुर्गों की तरह आपस में लड़वाकर खुश होने वाले दड़बों के मालिकों के विरुद्ध कोई आवाज उठायें । उनमे तो अपनी ही चिताओं पर रोटियाँ सेंकने वाले को दोबारा अपना मालिक चुनने में परहेज नहीं..। और मुझे आश्चर्य होता है इनपर जब ये लोग आकर मुझे धर्म, प्रेम और भाईचारा समझाते हैं । जब ये लोग आकर कहते हैं कि हमारे दड़बे की किताब पढ़ो और समझो कि ईश्वर और ब्रम्ह क्या है, मोक्ष क्या है….।

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मुझे मत डराया कीजिये इन शिकारी नरभक्षी कुत्तों से जो निहत्थे, निर्दोष मानवों का शिकार किया करते हैं धार्मिकता और जाति की आढ़ में । मैंने अब तक जितना जी लिया वह अपनी शर्तों पर जीया और जितने पल मेरे पास बचे हैं उतना ही मेरे लिए बहुत है । जिस दिन इन शिकारी कुत्तों का शिकार बनुँगा वह दिन भी मेरा जश्न का दिन होगा क्योंकि मुझे नया शरीर पाने का अवसर मिलेगा और फिर से नए जोश और उत्साह के साथ आऊँगा ।

लेकिन मेरे जाने से पहले कुछ लोग जाग जाएँ और ये धार्मिक उन्माद और नफरत फैलाने वालों का बहिष्कार करके समाज को रोगमुक्त करवाने का संकल्प ले सकें और निडरता से अत्याचारियों और शोषकों का सामना करने के लिए तत्पर हो जाएँ तो थोड़ी सी प्रसन्नता अवश्य होती ।~विशुद्ध चैतन्य

नोट: उपरोक्त पोस्ट किसी के द्वारा दी गयी धमकी पर आधारित नहीं है, केवल मनोवेग था जिसे लिख कर सार्वजनिक कर दिया ।

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