जिस दिन इन्सान बन जाएँ उस दिन महान होने की बात करिये

अधिकांश सामाजिक व सभ्य लोग अपनी जात-धर्म देखकर ही दोस्ती करते हैं या किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखते हैं | मैं बचपन से ही अधर्मी, असामाजिक व असभ्य रहा क्योंकि शहरी तौर तरीके यानि छल-कपट, बेईमानी, धोखाधड़ी मुझे सीखने ही नहीं मिला आदिवासियों के साथ रहने के कारण, तो मैं सभी से समान भाव से ही मिलता था… आज भी मुझे कोई मुस्लिम है या ईसाई है या हिन्दू है वह उनके नाम से ही पता चलता है | आज भी मैं कश्यप, शर्मा, भरद्वाज, शिया, सुन्नी, देवबंदी, वहाबी, कैथोलिक, बैप्टिस्ट….. आदि में कोई अंतर नहीं कर पाता | मुझे आज भी नहीं पता कि इनमें क्या अंतर है और क्यों है | मुझे आज भी नहीं पता चल पता कि इनके खून में अंतर है, शारीरिक अंतर है, दिमागी अंतर है…. अब इसमें मेरा दोष भी नहीं है | बचपन से ही मैं बुद्धिमान नहीं था और अनपढ़ तो पैदा होने से भी पहले से हूँ | तो जाहिर सी बात है कि आप जितना सभ्य व समझदार तो हो ही नहीं सकता कभी भी और किसी भी जन्म में कि इनमें अंतर कर पाऊं |

मुझे याद है मैं जब मिडिया में था, तब मुझे एक दिन अचानक तीन हज़ार रुपयों की आवश्यकता पड़ी | मुझे मकान का किराया देना था जो कि उस समय साढ़े आठ हज़ार के करीब था… तो तीन हज़ार रूपये कम पड़ गये | मैंने अपने कुछ मित्रों को फोन किया कि मुझे तीन हज़ार रूपये दे दो और तनखा मिलते ही लौटा दूँगा | और आप आश्चर्य करेंगे कि किसी के भी पास रूपये नहीं थे और सभी कोई न कोई बहाने बना रहे थे | कुछ ने तो फोन उठाना ही बंद कर दिया था…. तब ऐसे समय में पीसीआर में एक कैमरामेन जो कि मुस्लिम था, उसे पता चला कि मुझे रुपयों की आवश्यकता है, वह शाम को घर पहुँचा और रूपये दे गया | मुझे आश्चर्य हुआ कि इसकी सेलेरी तो मेरी सेलेरी की आधी से भी कम है और यह सहायता को आ गया | बातचीत में पता चला कि वह अपना कोई मकान बनवा रहा है, उसी के लिए जोड़ रहा था तो उसमें से निकाल कर दे रहा है……

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सारांश यह कि दड़बों से बाहर निकलिए और धार्मिकों से नहीं, इंसानों से सम्बन्ध बनाना सीखिए | न हिन्दू होने से आप महान हैं और न ही मुसलमान होने से आप महान हैं | जिस दिन इन्सान बन जाएँ उस दिन महान होने की बात करिये और तब गर्व से कहिये हम इन्सान हैं ! ~विशुद्ध चैतन्य

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