अरुणाचल मिशन

अरुणाचल मिशन

(एक संक्षिप्त परिचय)

प्रकाशक:

स्वामी ध्यान चैतन्यानंद

संकलनकर्ता:

माहिम चन्द्र चौधरी

 

हिन्दी अनुवाद:

विशुद्ध चैतन्य

लीलामन्दिर आश्रम, कबिलासपुर, देवघर, झारखण्ड

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जय जय दयानन्द, प्राण गौर नित्यानंद

अरुणाचल मिशन

Thakur Dayanand Devसन १९०९ में सिलचर से तीन किलोमीटर दूर, आसाम के काछार जिले में ठाकुर दयानन्द देव जी ने अरूणाचल आश्रम से अरुणाचल मिशन नामक अभियान का शुभारम्भ किया |

अरुणाचल मिशन का मुख्य उद्देश्य था भौतिक, नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा में संतुलन बनाते हुए नवीनता प्रदान करना | ताकि लोगों में भटकाव व उलझन दूर कर विश्व समुदाय में शांति स्थापित की जा सके |

भौतिक रूप से मानव समाज का पुनर्निमाण करके ऐसा नया समाज बनाना, जो समानता, समभाव, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित हो | ताकि समाज का प्रत्येक व्यक्ति भौतिक उलझन, चिंता व तनावों से स्वयं को मुक्त रख सके |

नैतिक व अध्यात्मिक रूप से व्यक्ति को उन्नत व समृद्ध बनाना, ताकि व्यक्ति मानसिक व आत्मिक रूप से स्वयं को सौभाग्यशाली अनुभव कर सके, आनंद व उल्लास से भर सके |

भौतिक नैतिक व आध्यात्मिक उत्थान को अलग अलग नहीं माना, बल्कि एक दूसरे का पूरक माना | और अपने इस नवीन सिद्धांत को विश्व में सभी तक पहुँचाने के लिए ठाकुर दयानन्द देव जी ने विश्वबंधुत्व पर आधारित अरुणाचल मिशन की आधारशिला रखी |

मिशन का प्रमुख सिद्धांत था विश्वधर्म यानि एक ऐसा धर्म जो सम्पूर्ण विश्व का धर्म हो, ईश्वर के प्रति समर्पित रहते हुए जीवन को पूर्णता में जीना |
मानव समाज में जो जाति या रंग भेद है, मिशन में उसके लिए कोई स्थान नहीं था | मिशन मानव समाज में किसी भी प्रकार के भेदभाव को नहीं मानता था |

ठाकुर दयानन्द ने स्वयं को केवल ईश्वर का वह माध्यम माना, जिसके द्वारा ईश्वर अपनी कोई योजना और उद्देश्य पूरा करना चाहते हों |

उन्होंने छुआ-छूत और ब्राहमण व शूद्रों के लिए अलग अलग बैठकर प्रसाद लेने की परम्परा बंद करवा दी और सभी को एक ही साथ बैठकर बिना कोई भेद-भाव प्रसाद लेने की परम्परा को लागू किया |

स्त्री हों या पुरुष, हिन्दू हों या मुस्लिम, ऊँच हो या नीच, सवर्ण हों या दलित….सभी का खुले हृदय से ठाकुर दयानन्द देव जी स्वागत करते थे | मंदिर के द्वार सभी के लिए खुले थे बिना किसी भेदभाव के

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वे स्त्रियों के अध्यात्मिक उत्थान, स्वतंत्रता व समानता के समर्थक थे |

वे न दान मांगते थे, न भीख मांगते थे और न ही किसी से कोई मासिक भत्ता ही लेते थे | वे पूर्ण रूप से केवल ईश्वर पर निर्भर थे और जो भी ईश्वर की कृपा से उन्हें प्राप्त होता था वही ईश्वर का प्रसाद समझकर स्वीकारते थे |

मई 1922 को अरुणाचल मिशन ने पहली बार World Peace के नाम से एक शाखा शुरू किया | यह दो वर्षों तक अस्थिर रूप से चला फिर बंद कर दिया गया | दोबरा 1935 में शुरू किया गया लेकिन फिर 1946 में बंद कर दिया गया |

मिशन विश्वभर में फैले सभी बंधुओं से पत्राचार द्वारा संपर्क बनाये रखता था | मिशन से सम्बंधित पाठ्य सामग्री विश्व भर में वितरित की जाती थीं, और  विचार शक्ति को सर्वाधिक महत्व दिया जाता था |

वे विश्वशान्ति के लिए प्रार्थना शक्ति को बहुत महत्व देते थे

ठाकुर दयानंद अपने अनुयाइयों को प्रियजनों, परिवार के प्रति आसक्ति व मोह से ऊपर उठने के लिए कहते थे | जाति, धर्म, देश की सीमाओं से मुक्त होकर सम्पूर्ण विश्व के हित के लिए काम करने के लिए प्रेरित करते थे | वे कहते थे, “मैं रहूँ न रहूँ, तुम लोग रहो न रहो, लेकिन मेरा काम निर्बाध चलता रहेगा” |

ठाकुर दयानन्द का पहला उद्देश्य था भारत को स्वतंत्र करवाना | उनका मानना था यदि भारत स्वतंत्र हो गया, तो सम्पूर्ण विश्व स्वतंत्र हो जाएगा |

1912 में जगत्शी, सिलहट (अब बांग्लादेश में पड़ता है) के डोलगोबिंद आश्रम में मिशन ने नाम यज्ञ यानि निर्बाध कई दिनों तक चलने वाली प्रार्थना का आयोजन किया | जब नाम यज्ञ चौथे हफ्ते में पहुँचा तब ब्रिटिश सरकार को चिंता हुई और उसने क्रूरता पूर्वक नाम यज्ञ को बंद करवाने का प्रयास किया यह कहकर कि सरकार विरोधी गतिविधि चल रही है यहाँ |

पुलिस द्वारा किये जा रहे उत्पात को रोकने के लिए अधिकारीयों से किये जा रहे सभी निवेदन व अनुरोध व्यर्थ हो गये | तब 30 जून 1912 में  ठाकुर दयानन्द ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की,

“From the sole Consideration of Dharma (Truth, Righteousness) alone, we today dissolve the relation of Ruler and Ruled.” (एकमात्र धर्म के आधार पर आज से हम राजा और प्रजा का सम्बन्ध समाप्त करते हैं)

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8 जुलाई 1912, बड़ी संख्या में सशस्त्र बल ने आश्रम को उस समय घेर लिया, जब सभी अनुयायी, जिनमें बच्चे, महिलायें भी थे, कीर्तन भजन में लीन थे | उन्होंने सभी को मारना पीटना शुरू कर दिया, कुछ सैनिकों ने गोलियाँ भी चलाई जिससे कई घायल हो गये | ऋषि युगानन्द जो कि गोली से घायल हो गये थे, बाद में अस्पताल में मृत्यु को प्राप्त हुए |

ठाकुर दयानन्द देव और उनके बारह अनुयाइयों पर दंगा भड़काने का आरोप लगाकर कठोर सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी | जबकि उनके विरुद्ध कोई भी प्रमाण नहीं था |

दूसरों को कष्ट न देना, किन्तु ईश्वर के नाम पर सभी कष्ट स्वयं ही सहना, इसी सिद्धांत पर भारत को स्वतंत्रता मिली | ठाकुर दयानन्द देव जी ने अपने शिष्यों और अनुयाइयों को स्पष्ट आदेश दिया था तब जब आश्रम पर अंग्रेजों ने आक्रमण किया था कि कोई प्रतिकार नहीं करेगा, आत्मरक्षा के लिए भी नहीं |

30 जून 1912 को ठाकुर दयानन्द देव जी की घोषणा का असर दिखने लगा था | लोग अब जागरूक होने लगे थे और लगभग विश्वभर में एक हलचल भी दिखनी शुरू हो गयी थी |  ऐसा लग रहा था कि ईश्वर ने सारी शक्तियाँ ठाकुर जी के घोषणा के पक्ष में ही कर दी थीं | महात्मा गांधी का आगमन हुआ और उनके नेतृत्व में भारत को स्वाधीनता प्राप्त हुई |

17 दिसम्बर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध निर्णयात्मक मोड़ पर पहुँच चुका था | ठाकुर दयानन्द देव ने पेरिस पीस कांफेरेंस और उससे जुड़े सभी महत्वपूर्ण सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से ईश्वरीय राज को पृथ्वी पर स्थापित करने के लिए अपनी एक योजना भेजी |

इस योजना को भारत के लिए भारत द्वारा कहकर प्रस्तुत किया गया | उसका शीर्षक था “An Appeal” और स्वयं के लिए संबोधन उन्होंने चुना A Sannyasi and Friend of the World” (संन्यासी और विश्व का मित्र).

राजनैतिक रूप से उन्होंने राष्ट्रीय अलगाव को समाप्त कर सभी राष्ट्रों के नागरिकों को अंतर्राष्ट्रीय स्वतंत्रता का सुझाव दिया | एक ऐसा विश्व का स्वप्न देखा जिसमें पूरे विश्व का एक राष्ट्रपति हो, एक विश्व मन्त्री परिषद हो, एक विश्व प्रबंधक समिति हो जो विश्व शहर से सम्पूर्ण विश्व को संचालित करे |

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आर्थिक रूप से विश्व राष्ट्रमंडल यह मानकर चले कि सभी चीजें ईश्वर की संपत्ति हैं और ईश्वर ने अपने सभी संतानों के सुख व उपभोग के लिए भेजी हैं | जिसे सभी की आवश्यकतानुसार उपलब्ध होना चाहिए |

गरीबी, युद्ध, शस्त्र होड़, उपनिवेशवाद पुर्णतः समाप्त होना चाहिए | युद्ध करना न केवल अनावश्यक हो जाना चाहिए, अपितु असंभव ही हो जाना चाहिए |

अंत में उन्होंने लिखा, “I have felt within myself that this is the only way to bring about a solution and that there is no other”. (मैं अपने अंतर्मन से यह अनुभव करता हूँ कि यही एक मात्र विकल्प है समस्या के समाधान का और दूसरा कोई नहीं)

विश्व के सभी महान आत्माओं तक ठाकुर दयानन्द देव जी का सन्देश पहुँच चुका था और धीरे धीरे जैसा ठाकुर जी चाहते थे उसी के अनुरूप विश्व ढलने लगा और 24 अक्तूबर 1945 में संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना हुई |

ईश्वर की अनुकम्पा से स्वतंत्र भारत ने दृढ़ व स्पष्ट रूप से समाजवाद को स्वीकार लिया है | पंडित नेहरु के प्रयास व विनोबा भावे के नैतिक व आध्यात्मिक धरातल पर सहयोग से भारत अपने अंतिम लक्ष्य की ओर बढ़ा चला जा रहा है |

आज विश्व खड़ा है विश्वशांति के तीन आयामों पर | आधार पूर्णतः अनुकूल है विश्वशांति के लिए | सभी मानवीय, वैज्ञानिक तैयारियाँ हो चुकीं हैं | मानव व राष्ट्र सभी दिल से चाहते हैं कि विश्व जिस भयावह परिस्थितियों में घिरा हुआ था, उससे निकल कर ईश्वरीय योजनाओं को सार्थक करें और विश्वशांति की ओर अग्रसर हों | ये तभी संभव होगा जब होशपूर्ण, निरंतर प्रयास प्रत्येक व्यक्ति व राष्ट्र करे ईश्वर को पिता मानकर और परस्पर बंधुत्व का भाव रखकर |

गहराई से समझने का प्रयास करें तो दिव्य नाट्यकार ही पहल करता है | लेकिन यह तब तक संभव नहीं होता, जब तक परमात्मा स्वयं नहीं चाहता और मानव के भीतर एक नई चेतना व दिव्य अलौकिक शक्ति का प्रवाह नहीं कर देता |

ईश्वर आप सभी पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखें |

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