यदि हम धार्मिक संगठनों की गतिविधियों पर नजर डालें तो ये धर्म व मानवता के शत्रु ही होते हैं

कहते हैं इतिहास से हमें सबक लेना चाहिए, लेकिन भारतीयों ने तो वर्तमान से ही सबक नहीं लिया, इतिहास से सबक लेने का तो सोच भी नहीं सकते | धर्म को आधार बनाकर जिस प्रकार आइसिस, अलकायदा को आस्तित्व में लाया गया, वैसे ही भारत में आरएसएस. हिन्दू सभा, सिम्मी व अन्य हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक संगठनें आस्तित्व में आये |

विस्तार से….

लेकिन हम देखें इनकी गतिविधियाँ तो इन्होने धर्म के विरुद्ध ही कार्य किये | जहाँ धर्म सभी को सहयोगी बनाता है, आपस में जोड़ता है, प्रेम और सद्भाव जागृत करता है, वहीँ ये धार्मिक संगठनें नफरत और हिंसा का प्रचार करते हैं | ये संगठन दोमुहें होते हैं और एक तरफ सद्भाव दिखाते हैं और वहीं दूसरी तरफ समाज में नफरत बोते हैं | ये किसी के सगे नहीं होते और मतलब साधने के लिए हर किसी से दोस्ती कर लेते हैं, लेकिन मतलब निकलते ही, ताकत मिलते ही ये ऐसे काम करने लगते हैं, जिससे दो पक्षों में नफरत बढ़ती चली जाए | जैसे हाल ही में गाय खाने के आरोप में एक बुजुर्ग की हत्या और उसके बेटे को मरणासन्न कर दिया गया |

अब जो मारा गया या जो पकड़े गये वे तो केवल मोहरे हैं और उनका प्रयोग केवल इसी काम के लिए किया जाता है | ऐसे मोहरों की कोई कमी नहीं होती इनको लेकिन इनका महत्वपूर्ण उद्देश्य सफल हो जाता है | अब उनको कोई फर्क नहीं पड़ता आप गालियाँ दो, बद्दुआ दो…. वे अब बैठकर हँस रहे होंगे | व जानते है कि न तो प्रशासन उनका कुछ बिगाड़ सकता है और न ही ईश्वर और अल्लाह… | अब वे खुश हैं कि हिन्दुओं और मुस्लिमों में खाई और गहरी हो गई | रही-सही कसर उनके पालतू पिल्ले और मानसिक रूप से विक्षिप्त धार्मिक समर्थक और कार्यकर्ता सोशल मिडिया में पूरी कर ही रहे हैं |

तो इन धार्मिक संगठनों की स्थापना किसी भी धार्मिक उद्देश्य के लिए नहीं होता, न तो ये अपने सम्प्रदायों को आर्थिक सहयोग देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना पाते हैं, न ही प्रेम और सौहार्द ही स्थापित कर पाते हैं… उलटे पूरे देश को मारकाट में झोंक देते हैं | इनको ये सब करने के लिए फंड भी उन व्यापारियों व विदेशी राजनयिकों से प्राप्त होता है जिनको देश की अस्थिरता और अराजकता से आर्थिक लाभ हो रहा होता है | अब चूँकि भारत एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है तो इसे भी ईराक या सीरिया बनाना आवश्यक हो गया है | जिस प्रकार शिया सुन्नी आपस में लड़ मर रहे हैं उसी प्रकार भारत में तो बहुत विध्वंसक सामग्री बिखरी पड़ी है | दलितों को सवर्णों के विरुद्ध, शूद्रों को ब्राहमणों और राजपूतों के विरुद्ध, गरीबों को अमीरों के विरुद्ध, मुस्लिमों को हिन्दुओं के विरुद्ध भड़का कर पुरे देश को हमेशा के लिए बर्बाद किया जा सकता है | यह इतना सरल काम है कि किसी भी पक्ष के एक व्यक्ति की हत्या करवा दो, अपने पालतू लोगों से सोशल मिडिया में पीड़ित पक्ष का मजाक उड़वा दो, मंत्री और अधिकारी दोषियों के पक्ष में बयान देने लग जाएँ… बस हो गया काम ! अब दूसरा पक्ष समझेगा कि न सरकार उसके साथ है और न ही ईश्वर… वह खुद ही हथियार उठा लेगा लड़ने के लिए | यही वे चाहते भी हैं…. फिर उन्हें आतंकवादी, नक्सली बता कर मौत के घाट उतारना शुरू कर दो… विद्रोह और बढ़ेगा और लोग मरेंगे….. इस प्रकार पूरा देश गृहयुद्ध में उलझकर बर्बाद हो जाएगा | उदाहरण सभी के सामने है इस्लामिक देशों का | लेकिन भारत कोई छोटा-मोटा देश तो है नहीं, और डेढ़ अरब की जनसँख्या इतनी जल्दी मिटने वाली तो है नहीं, तो यह लड़ाई कितनी लम्बी होगी उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता |

इसलिए पूंजीपति और विदेशी राजनयिक इन नफरत और मौत के सौदागरों का भरपूर सहयोग करते हैं…. लेकिन जैसे ही उनका काम हो जाता है, तब वे अचानक भगवान् बनकर उतरते हैं और फिर जो हाल आज आइसिस का हो रहा है, वही होता है | जबकि सभी जानते हैं कि आइसिस, अलकायदा का जन्मदाता कौन है लेकिन किसीने तब उनका विरोध नहीं किया और न ही आज कर रहे हैं | जिस प्रकार आइसिस, अलकायदा, तालिबानियों का मौन समर्थन था मुस्लिमों का उसी प्रकार आज भारत में भी धार्मिक संगठनों और उनके सहयोगी संगठनों के कुकर्मों का भी मौन समर्थन भारतीय कर रहे हैं…. इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि धर्म इंसान को इन्सान नहीं रहने देता और सोचने समझने की शक्ति भी छीन लेता है | हर अनैतिक का समर्थन करने लगते हैं धार्मिक लोग यदि करने वाला ताकतवर दिखाई देता है, लेकिन गरीब और कमजोर हुआ तो तुरंत धर्म की दुहाई देने लग जाते हैं |

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अब सोवियत रूस भी आइसिस पर अपने हमले तेज कर चुका है…. जरा सोचिये एक दिन अमेरिका और सोवियत से लेकर चीन भी भारत की इसी प्रकार सहायता कर रहा होगा, जब देश की आधी से अधिक आबादी इन धर्मों के ठेकेदारों के बिछाए जाल में फंसकर दम तोड़ चुकी होगी | फिर ये लोग हमारी ही जमीन से खनिज और वन्य सम्पदा बेचकर अपने किये अहसान की कीमत वसूल करेंगी और जो गिनती के बचे खुचे लोग होंगे वे विरोध करने लायक ही नहीं रह जायेंगे | ~विशुद्ध चैतन्य

Amaan Mirrza  का यह आपबीती अवश्य पढ़ें | आपको पता चल जाएगा कि धर्म के नाम पर राजनैतिक लोग धर्मों के नाम पर कैसे हमे आपस में लड़ा रहे हैं |

पोस्ट को पढ़ना है तो पूरा पढ़ें वरना ऐसे ही छोड़ दे… मत पढ़ें..

सितम्बर 2013
जब मुज़फ्फरनगर दंगों की आग में सुलग रहा था।

मैं तो बेफिक्र अपने काम में लगा था, बहन की कॉल आई, अमान कहाँ है? मैंने कहा अभी तो काम में लगा हूँ।
बोली कितनी देर में आएगा मैंने कहा 1 घंटा लगेगा।
वो बोली तू आज मत आना वही रुक जाना अपने दोस्त के यहाँ।

थोड़ी देर बाद भतीजे की कॉल आई.. उसने भी वही प्रश्न किये,लेकिन इस बार मैंने भी सवाल कर दिया…

ऐसा क्या हो गया?

तब उसने बताया गाँव का हर एक आदमी लठ लेकर उसमे गंडासे लगवाने लोहार के पास जा रहे हैं…
तब मैंने कहा अबे लोहार तो अपना है… उसने बोला भाई अब तो हो गए… लोहार के यहाँ गंडासों (चारा काटने की मशीन में लगने वाला ब्लेड) का ढेर लगा है, प्लीज़ तू मत आना तू हमेशा देरी से आता है।

अक्सर मैं भी देरी से जाता था, थोड़ा डर ज़रूर लगा, लेकिन मैंने सोचा,नहीं! मेरा गाँव ऐसा नहीं है।

उस दिन मैं 8 बजे ही घर के लिए निकल पड़ा… चारों तरफ सन्नाटा…

सच में मेरा गाँव ऐसा नहीं था, हम भी अपने काम से मतलब रखने वाले थे… उस दिन मैं सवेरा घर पहुंचा…
गाँव के सभी लोग अब्बू को बहुत मानते हैं, अब्बू को लगता की कोई ख़तरा नहीं है। मैंने कहा चलो कुछ दिन के लिए गाँव से चले जाते हैं, अब्बू ने मना किया नहीं!
इससे गाँव की बेइज़्ज़ती हो जायेगी।

गाँव का हरेक मुस्लिम अब्बू से कहने आया था मिस्त्री साहब जब तक आप नहीं जाएंगे हम भी गाँव से नहीं जाएंगे… इसलिए आप भी निकल जाइए हम भी निकल जाएंगे…
लेकिन अब्बू ने कहा कि मत जाओ… गाँव की बेइज़्ज़ती है, यहाँ ऐसा कुछ नहीं होगा, लेकिन जब नहीं माने तो अब्बू ने बोला कि अपनी औरतों को यहाँ से भेज दो… अगर इतना ही डर है… इसी बहाने आधे से ज़्यादा बाहर जा चुके थे…

महापंचायत से पहले सब इतना माहौल खराब नहीं था महापंचायत में नारे लग रहे थे “मुल्लों जाओ पाकिस्तान, नहीं पहुंचा देंगे कब्रिस्तान”

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अगली सुबह का अखबार भी ऑनलाइन पढ़ा।
हर जगह मार काट की ख़बरें थी, लोग अपना घर बार छोड़कर जा चुके थे। मुस्लिम परिवार पलायन कर रहे थे, लेकिन इन सबके बीच अच्छे और समझदार लोग भी थे,जो मुस्लिमों को बचा रहे थे समझा रहे थे।

लेकिन जैसे मेरा दिमाग भी बदल चुका था,मैं अब कट्टर हो चुका था और जो मुस्लिमों की मदद कर रहे थे एक बार मैं उनपर विश्वाश करना भी चाहता था तो दूसरा कोई कहता कि हिंदुओं की चाल है… अब मेरे मन में तो नफरत भर ही चुकी थी… सब पढ़ाई लिखाई पर पानी फिर चुका था.. उस दंगे ने जब मेरे जैसे इंसान को कट्टर बना दिया था तो बाकी दोनों तरफ़ा के लोग जो कर रहे थे उसमे मुझे आश्चर्य नहीं था..मैं नहीं जानता था कि यह भोले लोगों को धर्म के नाम पर भड़काने की राजनैतिक चाल है।

मेरा परिवार कट्टरवाद से बहुत दूर था, हमारे गाँव के आधे से अधिक मुस्लिम लोग गाँव छोड़कर शरणार्थी कैम्प में चले गए थे। गाँव के कुछ गणमान्य लोग समझाने आ रहे थे कि आप बेफिक्र रहें कुछ नहीं होगा…
लेकिन दिन तो जैसे तैसे कट जाता…रात काटना मुश्किल हो चुका था…

गाँव के नए लौंडे जोश में आकर कहते कि आज सबका सफाया करेंगे लेकिन अब उनकी इन बातों के कारण ही अब मैं और बाकि लोग भी कट्टर हो सबके थे… भैया भाभी, भतीजा, और गली से सब लोग।

अब बस हमारी गली बची थी, हालात और ज़्यादा खराब थे…

अगले दिन गाँव के ही कुछ बदतमीज़ों और जाहिलों की कुछ कमेंट सुनने को मिली…
कि इनका परिवार ख़त्म कर दो और इनकी लड़कियों से शादी कर लो…

कौन इतनी बात सुन सकता था… मैंने कुछ पैसे सेविंग किये हुए थे… मैं अब हथियारों को ढूँढने में लगा था… आज तक घर में किसी हथियार की ज़रूरत न पड़ी लेकिन अब अवैध हथियार खरीदने ज़रूरी थे। मेरी 2 साल की जमा पूँजी थी 2 लाख रुपये…ऐसे ही इंटरनेट के माध्यम से पता चला था कि 5000/- में कट्टा आ जाता है और 50,000/- में चोरी की माउज़र… (कोई खबर पढ़ी थी)

अपनी सुरक्षा के लिए मैंने सोचा एक चोरी की माउज़र कहीं न कहीं मिल ही जायेगी… और 10- 12 कट्टे गली वालों को दे दूं…

लेकिन अब हमने अपने ही घरों में रखे सामान… जैसे बिसौला… आरी… चाकू.. कैंची…. ये सब अपनी छत पर रखते और चौकीदारी करते…. वो लोग भी अपनी छत पर खुद की चौकीदारी करते थे…

अब किसी को भी मौत से डर नहीं लगता था… बस घर वालों की फ़िक्र होती थी… मैं तो मौत का डर भूल चूका था… इतना साहस मेरे अंदर पता नहीं कहाँ से आ गया था… सोचता था कि कोई अगर आकर मारेगा तो तीन को ज़रूर मार सकता हूँ…. घर में अपनी बहनों को मिर्च पाउडर और बाल्टी में पानी भरकर देता…. घर में सभी को कहा कि कैंची रखकर अपने पास सो जाओ…हम अगर मर गए तो जैसे ही कोई आये तो सबसे पहले मिर्च पाउडर मारना फिर कैंची का वार दिल पर होना चाहिए….

मेरा छोटा भाई जो सबसे ज़्यादा मज़बूत है, शैतान है , मैंने सोच लिया था उसको बदमाश बनाना है… एक एक करके सबसे बदला ले ही लेगा…

यहाँ तक प्रोग्राम था एक एक को चुन चुन कर मारकर बदला लेना है और इन की वीडियो बनाकर सोशल साइट्स पर डालना है…

हम निर्दयी हो चुके थे…… मेरी ज़िन्दगी के सपने थे… मैं वो नहीं बनना चाहता था जो बन गया…

मुस्लिमों को छोड़कर सभी से नफरत करने लगा था…

सिर्फ 10-12 इंसान थे जिनपर मुझे पूरा भरोसा था

हरेन्द्र अंकल ने कहा था मैं आ रहा हूँ गाडी लेकर … जबकि हरेन्द्र अंकल खुद एक जाट थे.. मामा के यहाँ मैं छोड़ आऊंगा… मैं तो मान गया था… मगर मोहल्ले वाले उनको किसी पर भरोसा नहीं था अब…कहने लगे कि जाट हैं… ये वो सब… मैं मज़बूर था… लेकिन यह सब वो नफरत बोल रही थी जो राजनैतिक दलों ने लोगों के मन में भर दी थी।

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श्रीओम अंकल हमेशा साथ खड़े रहे…काफी लोग थे जो हमेशा साथ थे.. उस दिन भी साथ खड़े रहे और आज भी साथ ही हैं…

दंगे से पहले हमारे नए पडोसी आये थे… बेचारे बहुत सीधे और गरीब थे… अम्मी से कहती थी कि हम मुस्लिमों के मोहल्ले में हैं… प्लीज़ हमें कुछ मत कहना…
सभी ने कहा आपको कौन कुछ कहेगा आपकी हिफाज़त की ज़िम्मेदारी हमारी है…

लेकिन मुझे तो उन पर भी शक था.. मैं अम्मी से कहता था कि किसी की मदद मत करो… ये बाहर से आये हैं… कब हमें मारकर चले जाएँ कुछ पता नहीं….

बस तब मैं बोर होकर फेसबुक चलाने लगता… हर पेज पर हर खबर में गालियाँ और आक्रोश था… हिन्दू मुस्लिम्स को और मुस्लिम्स हिंदुओं को गालियाँ दे रहे थे…

तभी ओवैसी के बारे में सुना था… यहाँ तक कि परेशान होकर मैं ओवैसी की पार्टी से जुड़ने वाला था… मैं खूब फोन करता ओवैसी के प्रतिनिधि को… उधर से भी कॉल्स आई लेकिन सिर्फ और सिर्फ राजनीति होनी थी।

फिर फेसबुक पर अच्छे लोगों की कमेंट्स भी पढ़ी… उनमे हिन्दू भी थे और मुस्लिम्स भी… उनको ऐड किया… क्यूंकि वो सब धोखेबाज़ नहीं हो सकते थे… उनपर भरोसा किया जा सकता था… क्योंकि वो हमारे पडोसी नहीं थे…. उनको हमसे लालच भी नहीं था।

उनमे एक 10 वीं पास दिलशाद आलम भी थे… जिन्होंने सिखाया कि नफरत ही नफरत को बढ़ाती है…

काफी लोगों को पढ़ा तो पाया कि काफी अच्छा भी है यहाँ…अच्छे लोग भी है…

मेरी तरह हिन्दू परिवार से भी न जाने कितने होंगे… जो इसी तरह कट्टर बन गए होंगे… उनको हर मुस्लिम दुश्मन दिखाई देता होगा…

वो आज भी इसी तरह मारने काटने की बात करते होंगे…

क्या मेरे साथ जो हुआ उसकी वजह हिन्दू थे? नहीं न?

उन वजह को आप भी जानते हो… सभी राजनेताओं ने अपनी राजनितिक रोटियां सेंक ली…

मेरा क्या होता या तो जेल जाता या फिर मार दिया जाता…

नफरत का जवाब नफरत नहीं होता… प्यार से समझाना भी ज़रूरी होता है…

इन राजनितिक रोटियां सेंकने वालों को पहचानों… वो किसी भी रूप में आपको मिल जाएंगे.. आपको गुमराह करेंगे झूठा इतिहास दिखाकर… मैं अब बिलकुल शांत रहता हूँ… हिंसा मुझे भी पसंद नहीं… लेकिन अगर आप किसी हिन्दू या मुस्लिम से नफरत करते हो तो पहले नफरत करने की वजह तलाश लें… कहीं ऐसा तो नहीं आपको गुमराह किया जा रहा है। आपको मुहरा बनाकर बहुत बड़ा राजनितिक खेल खेला जा सकता है.. इन्ही राजनितिक दलों ने 2013 के दंगों में वही किया था… न जाने कितनों को कट्टर बना दिया…कितनों को मोहरा बनाकर अपनी राजनितिक रोटियां सेंकी… कौन मरा?

देखो… अवलोकन करो बेटे किसके गए और राजनितिक लाभ किसको मिला…

खैर… बसेहड़ा में जो हुआ उसके पीछे भी यही वजह है…अब न जाने कितने मुसलमान हिंदुओं से नफरत करेंगे और कितने हिन्दू मुसलामानों से नफरत करेंगे वो भी बेवजह… मरेंगे ये आम इंसान… और फायदा होगा इन राजनैतिक दलों को…

ज़रूरत इन जैसे लोगों से… इनके विचारों से अपने आप को बचाने की ज़रूरत है…

अहिंसा का पाठ पढ़िए…

संयोग है तब भी दंगे/हिंसा के कुछ दिनों बाद… अहिंसा के पुजारी का जन्म दिन था..

आज भी अख़लाक़ के मरने के बाद अहिंसा के पुजारी का जन्मदिन है…

नमन बापू मैं तुम्हारे रास्ते पर चल रहा हूँ।

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