अहिंसक संन्यासी

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कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | एक गाँव से एक संन्यासी गुजरा | उसके विषय में यह कहा जाता था कि वह बहुत ही अहिंसक है और उसे कभी क्रोध नहीं आता | वह इतना सीदा और सरल व्यक्तिव् का स्वामी है कि मच्छर पर भी हाथ नहीं उठाता था |

तो गाँव से जब वह गुजरा तब बहुत से लोग उसके दर्शन को आये | किसी ने कुछ भेंट की तो किसी ने भोजन पानी दिया | उसी गाँव में कुछ संघी और भाजपाई भी थे और मोदी के कट्टर समर्थक |

उन्होंने साधू से पूछा कि आप तो भगवाधारी हैं तो हिंदुत्व की रक्षा करने वाले मोदी जी के विषय में आपके क्या विचार हैं ? क्या आप भी मानते हैं कि मोदी जी का साथ देकर भारत को इस्लाम मुक्त हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहिए ?

साधू ने उनकी तरफ ध्यान से देखा और कहा बेटा अभी तो मोदी को हिन्दू का मतलब भी नहीं पता, तो हिन्दू राष्ट्र की बात ही कहाँ से आ गयी ? फिर मैं तो सनातनी हूँ किसी दड़बे में समा नहीं सकता….

साधू कुछ कहता आगे, उससे पहले ही भक्तों के सब्र का बाँध टूट गया | चिल्लाने लगे कि ये पाकिस्तानी मुल्ला है, भेस बदलकर आया है….इसने हिंदुत्व को गाली दी, सारे हिन्दुओं को गाली दी..ये आज यहाँ से जिन्दा नहीं जाना चाहिए |

गाँव वाले तो भेड़-बकरियों की तरह सीधे होते हैं कोई भी उन्हें हांक ले जाता है | तो वे भी सब चिल्लाने लगे कि ये देशद्रोही है, पाकिस्तानी है…और साधू की तरफ लाठी, डंडा लेकर दौड़ पड़े | साधू थोड़ी दूर भागा और फिर ठहर गया | अपना झोला नीचे रखा और वापस भीड़ की तरफ लौटा | भीड़ ठिठक कर खडी हो गयी….

स्वाभाविक नियम है कि जब कुत्ता पीछे पड़ पड़ जाए तो भागने की बजाय खड़े हो जाओ या वापस कुत्तों की तरफ ही बढ़ने लगो, तो कुत्ते ठिठक जायेंगे या पीछे हटने लगेंगे | बिलकुल वही स्थिति थी |

लेकिन मोदी भक्तों को तो गाली-गलौज के साथ साथ लाठी-डंडा चलाने की भी ट्रेनिंग मिली हुई थी | तो गाँव वाले तो पीछे हट गये लेकिन मोदी भक्त और जोश से आगे बढे | एक ने लाठी चलाई तो साधू ने लाठी छीन ली उससे और फिर उसी लाठी से सभी की धुलाई की और साथ ही दुनिया भर की गालियाँ भी सुनाई | सब पिट कर गाँव वालों के पीछे पहुँच गये और चिल्लाने लगे कि ये ढोंगी है पाखंडी है, लाठी चलाना जानता है और गालियाँ भी देता है | ये अहिंसावादी नहीं है, और न ही अपने क्रोध को काबू रखना जानता है | असली साधू-संन्यासी तो वे होते हैं जो हमारे हाथों पिट जाए, दुनिया भर की गालियाँ सुने हमसे और श्री श्री रविशंकर की तरह मुस्कुराता रहे |

गाँव वालों ने भी सुर में सुर मिलाया, तब साधू ने समझाया | अहिंसा का अर्थ है अनावश्यक हिंसा से परहेज | लेकिन हिंसक पशुओं से आत्मरक्षा करना या आत्मरक्षा के लिए किसी की हत्या कर देना हिंसा नहीं, आत्मरक्षा है | दूसरी बात यह कि साधू संन्यासी को कैसा होना है वह स्वयं तय करता है | किसी दूसरे के बनाये पथ पर ही चलना होता तो साधू-संन्यासी होने की आवश्यकता ही क्या है, फिर तो आप लोगों की तरह ही जीना ठीक है | कोई भी लुच्चा लफंगा तुम लोगों का नेता बनकर बैठ जाता है और तुम लोग उसकी जय जय करने लगते हो | ये सड़क छाप गुण्डे मवाली ही तुम लोगों को हाँक ले जाते हैं, ये ही तुम्हें उकसा देते हैं वह काम करने के लिए जो तुम होश में कभी नहीं कर सकते | यदि गुंडों मवालियों के ही इशारों पर चलना है तो फिर ये धार्मिकता का ढोंग क्यों ? छोड़ दो ये धार्मिकता और शराफत का ढोंग और शामिल हो जाओ इन्हीं गुण्डे मवालियों में |

मैं संन्यासी हूँ, अहिंसक हूँ लेकिन किसी निर्दोष के लिए | हिंसक पशुओं, लुच्चे-लफंगों, गुंडे-मवालियों के लिए नहीं |

ग्रामीणों को अपनी गलती समझ में आयी और उन्होंने उस दिन शपथ ली कि आज के बाद वे गुण्डे मवालियों के सरदार को अपना नेता नहीं चुनेंगे और न ही साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वालों, लुच्चे-लफंगों, गाली-बाजों की सेना बनाने वालों को धार्मिक मानेंगे | आज के बाद हम सनातन धर्म के सिद्धांत पर चलेंगे और किसी भी निहत्थे, निर्दोष, बुजुर्ग या महिला या बच्चों पर हाथ नहीं उठाएंगे | हम पहले इनके बहकावे आकर मोबलिंचिंग जैसे जघन्य अपराध भी कर चुके हैं, आज पता चला कि ये लोग हमें धर्म से भटका कर अधर्म के पथ पर ले जा रहे थे | ये लोग हमें भी अपनी ही तरह लुच्चा-लफंगा बनाना चाहते थे |

~विशुद्ध चैतन्य

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