गुरु अच्छा या बुरा नहीं होता, गुरु केवल गुरु होता है

द्रोणाचार्य, भीष्म के शिष्य कौरव भी थे और पांडव भी । लेकिन दोनों ही पक्ष ने शिक्षा अपनी अपनी योग्यतानुसार ही प्राप्त की ।

वास्तव में गुरु आपको वह सिखाता है, जो शिक्षक, अध्यापक, टीचर, ट्यूटर नहीं सिखा पाते । गुरु आपको किताबी ज्ञान या थोपी हुई ज्ञान नहीं थोपता । वह तो आपके भीतर छुपी-दबी योग्यताओं को उभारता है और आपसे आपका परिचय करवाता है ।

गुरु और शिष्य के सम्बन्ध प्रारब्ध व नियति तय करता है न कि समाज, परिवार या व्यक्ति । यह अरेंज मैरिज या स्कूल, टीचर, ट्यूटर चुनने जैसा सरल-साधारण नहीं है ।

कौन कब किसका गुरु हो जाये और कौन कब किसका शिष्य हो जाये यह कोई नहीं बता सकता, यहाँ तक कि गुरु और शिष्य को भी पता नहीं चलता कई बार, बरसों साथ रहने के बाद भी ।

मैं अपना ही उदाहरण दूँ तो जो संन्यास गुरु बने मेरे, उनसे पहली मुलाकात में ही कहा था कि हम साथ चल रहे हैं, लेकिन मुझसे बिल्कुल भी यह अपेक्षा मत रखियेगा कि मैं आपको गुरु मानकर रहूंगा । मेरे जैसे सरफिरे का योग्य गुरु ओशो, स्वामी विवेकानंद जैसा ही कोई सरफिरा हो सकता है । परंपराओं, आडंबरों को ढोने वाला साधु-संन्यासी नहीं ।

लेकिन क्या जानता था कि एक दिन ऐसा गुरु जीवन मे अपनाऊंगा जो मुझसे बिल्कुल विपरीत विचारधारा का होगा । वास्तव में मैंने गुरू को नहीं खोजा, गुरु ने ही मुझे खोज लिया | मुझे पैसा-पैसा करने वाले लोग पसंद नहीं, मेरे गुरु हर साँस में पैसा-पैसा करते हैं ।

बाहर से देखने वाले यह समझते हैं कि हम दोनों में छत्तीस का आँकड़ा है और है भी । फिर भी हम साथ रहते हैं बिल्कुल विपरीत विचारधारा के बावजूद ।

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न तो गुरुजी मुझे कभी कहते हैं बदलने के लिए और न मैं उन्हें बदलना चाहता हूँ । कभी उन्होंने कोई आदेश नहीं दिया केवल सुझाव दिया । मानना या न मानना मुझपर छोड़ देते हैं ।

तो जब दो विपरीत विचारधारा के व्यक्ति साथ चल पड़ते हैं, तब इसे मैं प्रारब्ध मानता हूँ । हम साथ हुए तो किसी महत्वपूर्ण उद्देश्य के लिए । मैं पैसों की होड़ से भागना चाहता था, लेकिन गुरु मिला वह जो पैसों के सिवाय कुछ और नहीं सोचता । तो इसका कारण भी है ।

शायद नियति मुझे यह समझाना चाहती है कि जिससे तुम भाग रहे हो, अभी उसका समय नहीं आया । क्योंकि जिस संकल्प के साथ मैंने जन्म लिया, उसमें अहम भूमिका धन की ही है ।

और शायद यही कारण है कि नियति ने ऐसे गुरु से मिलाया, जो हर दिन किसी न किसी रूप में कटाक्ष करते रहते हैं कि आश्रम के लिए मैं धन की व्यवस्था नहीं कर पा रहा । जबकि मेरे कई गुरु भाइयों ने काफी धन उपलब्ध करवाया आश्रम के रिनोवेशन के लिए ।

खैर…मैं अपनी जिद पर ही हूँ कि मुझे पैसों की होड़ में शामिल नहीं होना । मुझे अपनी नैसर्गिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आवश्यक धन उपलब्ध हो ही जाता है चाहे कुछ न भी करूं ।

तो गुरु आप अपनी पसंद का चुनेंगे तो चुनने में गलती हो सकती है । लेकिन यदि प्रारब्ध चुनेगा गुरु आपका, तब सही मायने में आपको गुरु मिलेगा । जैसे जिनकी जेब कट चुकी हो, उनके लिए वह जेबकतरा गुरु हुआ । क्योंकि उस जेबकतरे ने होश में रहने की शिक्षा दी ।

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वास्तव में विपरीत परिस्थिति या व्यक्ति या विचारों से सामना किये बिना आप न तो ऊपर उठ सकते हैं और न ही कोई व्यवहारिक ज्ञान ही प्राप्त कर सकते हैं । माता-पिता, गुरु व जीवनसाथी ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जो केवल गुरु होते हैं बस व्यक्तित्व व दायित्व अलग अलग होते हैं । जिनके बिना आप न तो स्वयं से परिचित हो पाते हैं और न ही पूर्णता व आत्मसंतुष्टि को प्राप्त कर पाते हैं । ये संबंध आत्मिक होते हैं और शर्तों पर आधारित या समझौते नहीं । जहाँ ऐसे संबंध शर्तों पर आधरित हों, समझौतों पर आधारित हों, वे आत्मिक या प्राकृतिक नहीं, व्यावसायिक व स्वार्थों पर आधारित होते हैं ।

यह भी सत्य है कि आज हर संबंध फिर चाहे गुरु-शिष्य का संबंध हो, पिता-पुत्र का संबंध हो, या फिर पति-पत्नी का संबंध, सभी व्यापारिक समझौते ही होते हैं और भौतिक लाभ व स्वार्थों पर आधारित होते हैं ।

मैं निर्धन हूँ, कोई चमत्कारिक शक्तियाँ नहीं है मेरे पास, पहले धन कमाने की योग्यता थी, वह भी अब नहीं रही । पहले पढ़-लिखा था अब अनपढ़-गंवार हो गया हूँ, पहले मैं बहुत मीठा बोला करता था, अब कुनेन की गोली से भी कड़वा बोलता हूँ । पहले बहुत मेहनती था अब महा-आलसी हो गया हूँ….यानी सच्चा त्यागी हूँ । अपनी हर खूबी, अपना हर गुण त्याग दिया । अब मेरे जैसे त्यागी से कोई अपेक्षा करे कि मैं भेड़-चाल में चलने वाले, पैसों के पीछे दौड़ने वाले, धार्मिक या पारंपरिक कूपमंडूक का जीवन जीने वाले, सभ्य, संस्कारी व्यक्ति की तरह अच्छा इंसान बन जाऊँ तो भला यह कैसे सम्भव है ?

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और यह ज्ञान भी मुझे अपने गुरु से मिलने के बाद ही प्राप्त हुआ, उससे पहले तो मैं दुविधा में था कि मुझे अच्छा इंसान बनना चाहिए या ऐसा बुरा इंसान जिससे समाज इतनी घृणा करता हो कि सूली पर चढ़ा देता है, ज़हर देकर मार देता है क्योंकि वह समाज को जगाना चाहता है । मैनें दूसरा विकल्प चुना अपने लिए । और यह दूसरा विकल्प भी मुझे आश्रम आने के बाद ही समझ मे आया ।

और शायद यही कारण है कि गुरु का स्थान माता-पिता व देवताओं से भी ऊपर माना जाता है । एक गुरु बिना कुछ किये ही आपको रूपांतरित कर देता है ।

~विशुद्ध चैतन्य

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