एक समय था जब लोग विद्वान हुआ करते थे और बड़े बड़े वैज्ञानिक, ज्योतिषी भी हुआ करते थे…


अक्सर मुझे सुनने मिलता है कि यह जरुरी नहीं कि आप सही ही हो…. या फिर फिर लोग व्यंग्य करते हैं, “मैं बहुत ज्ञानी हूँ, मुझसे अधिक ज्ञानी कोई नहीं, मुझे दुनिया कि हर बातें पता है….. ” कुछ लोग कहते हैं कि शास्त्रों में जो लिखा है वही सत्य है शास्त्रों को पढ़ो…….नास्तिक मानते है कि विज्ञान ही सत्य है बाकि सब झूठ है…..धार्मिक विद्वान मानते है, “जगत मिथ्या है, ईश्वर सत्य है” |

तो मैं यदि उनके थोपे हुए विज्ञान और धार्मिक ग्रंथों को उन्हीं की नजरिये से स्वीकारने में अपने आपको सहज नहीं पाता तो उनके लिए या तो मैं मजाक का पात्र हो जाता हूँ, या फिर “बकने दो ये बकता रहता है..” वाला व्यक्ति हो जाता हूँ |

सहमती-असहमति चलती ही रहेगी | सूर्य भी सम्पूर्ण पृथ्वी से अँधेरा नहीं मिटा सकता | लेकिन यहाँ मैं यदि अपनी बेचैनी की बात कहूँ और जिसे आप लोग द्वन्द या मानसिक उलझन समझ रहे हैं, मैं उससे भी सहमत हूँ | द्वन्द होना स्वाभाविक ही है क्योंकि मैं निश्चित नहीं हूँ कि मैं सही हूँ या गलत हूँ | मैं निश्चित नहीं हूँ कि मैंने जो मार्ग चुना है वह सही है या गलत है | मैं निश्चित नहीं हूँ कि मैंने वास्तव में मार्ग ही चुना है या केवल भ्रम में हूँ और एक पगडण्डी को ही मार्ग समझ लिया…. हो सकता है यह पगडण्डी मुझे किसी बियाबान जंगल की ओर ले जा रही हो….हो सकता है यह पगडण्डी मुझे मृत्यु की ओर ले जा रही हो….. लेकिन….

बनी बनाई पटरी पर चलने से तो मुझे यही बेहतर लग रहा है | एक रेल इंजिन की जिंदगी से तो यह मुझे अधिक बेहतर लग रहा है क्योंकि यहाँ कुछ भी निश्चित नहीं है | भविष्य का ही पता नहीं है कि आगे क्या होना है | कोई ज्योतिषी मेरी भविष्यवाणी नहीं कर सकता…. तो यही मार्ग मुझे अधिक आकर्षक लग रहा है | यहाँ कुछ नया पाने की सम्भावना है, लेकिन बनी-बनाई पटरी पर चलने से कुछ नया नहीं मिलने वाला | मैंने यह भी जाना कि जो पढ़ाया जाता है और जिसके दम पर लोग विशेषज्ञता प्राप्त करते हैं और विद्वान् कहलाते हैं… वह भी एक समय बाद झूठ सिद्ध हो जाता है |

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जैसे एक समय था जब लोग विद्वान हुआ करते थे और बड़े बड़े वैज्ञानिक, ज्योतिषी भी हुआ करते थे… उस समय पृथ्वी केंद्र थी और सारे ग्रह सूर्य समेत पृथ्वी की परिक्रमा करती थी लेकिन समय बदला और सूर्य केंद्र हो गया और बाकि सभी ग्रह परिक्रमा करने लगे पृथ्वी समेत सूर्य की | एक समय वह भी था जब चाय से केंसर हो जाया करता था लेकिन समय बदला और पता चला कि चाय में केंसर को नष्ट करने का गुण है और फिर ब्रेस्ट केंसर के मरीजों को दिन में कम से कम चार बार बगैर दूध की चाय पीने कि सलाह दी जाने लगी | इसी प्रकार बहुत सी बातें हैं जो कभी विद्वता थी तो आज मुर्खता है…. आज कोई विद्वान कहे कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है तो वह मूर्ख ही कहलायेगा, लेकिन एक समय सुकरात, गैलिलियो मूर्ख कहलाये गये, क्योंकि उन्होंने पृथ्वी को सूर्य के चक्कर लगवा दिए…..

मेरे भीतर कोई है जो निरंतर मुझे इन सब को नकार कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है… नहीं जानता कि कौन सा वह रहस्य है जो मुझे जानना है लेकिन भीतर एक बेचैनी सी अवश्य है |

जो खुद को पढ़ा-लिखा जताते हैं वे मुझे गुलाम ही लगते है.. और इसमें मेरा कोई दोष नहीं है | क्योंकि पढ़े-लिखों को मैंने नौकर बनते ही देखा है और सही का साथ देते कम ही देखा है | जैसे एक आईपीएस, आईएएस को ही ले लीजिये, वे केवल मोहरे होते हैं सरकार के, सही या गलत का विवेक उनमें नहीं होता | वे भूमाफियाओं के लिए भी उतनी ही वफादारी दिखाते हैं, जितने कि भ्रष्ट नेताओं के लिए | एक ही तरह के जुर्म के लिए एक गरीब को जेल भिजवा देते हैं, वही किसी पूंजीपति को जमानत दिलवा देते हैं | इसी प्रकार पढ़े-लिखे वकील जज, डॉक्टर….. सभी गुलामी ही कर रहे होते हैं अपना अपना जमीर बेचकर | फिर ये अफसर जब कभी मेरे सामने आते हैं, तब स्वतः ही इनके प्रति कोई सम्मान का भाव नहीं रहता | पिछले साल यहाँ सर्कल ऑफिसर आई आश्रम में, लेकिन पहली ही नजर में ऐसा लगा कि वह जिस पद के लिए चुनी गयीं हैं वह उसके योग्य नहीं हैं | और बाद में यह पता भी चल गया कि मेरा अनुमान सही था…. जबकि सभी लोग उसकी बहुत ही तारीफ़ कर रहे थे | इसी प्रकार भूमि अधिग्रहण से सम्बंधित शिकायत पर जब जाँच आधिकारी और थानाध्यक्ष आये… तब पहली ही नजर में समझ गया कि ये लोग विश्वस्त नहीं हैं | और वह अनुमान भी सही निकला जब शाम को दोबारा आये और हमसे ब्लैंक पेपर पर साइन करके देने के लिए कहा | हमने पूछा कि लिखना क्या है, तो वे बोले कि बस यही लिख कर दीजिये कि जिनके विरुद्ध आपने शिकायत की  है वे भूमाफिया नहीं हैं और यह साधारण विवाद था जो अब सुलझ गया है आपसी बातचीत से | मैने साइन करने से मना किया तो बोले आप लोग तो सन्यासी हैं, काहे को इन सब झमेले में पड़ते हैं…… |

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तो विद्वान तो मुझे कोई मिला नहीं, गुलाम ही मिले आजतक | फिर जो धर्मों के ठेकेदार हैं, दुनिया भर के शास्त्रों को रट कर बैठे हैं, वे कर क्या रहे हैं वे ? क्या वे कोई राष्ट्रहित या समाज हित कि बातें करते हैं ? नहीं !

वे केवल राजनीती करते हैं और लोगों को मुख्य मुद्दों से भटकाते रहते हैं | आज तक वे जातिगत भेदभाव नहीं मिटा पाए लेकिन डायलॉग मारते हैं कि धर्म सभी को एक करता है,  ईश्वर कोई भेदभाव नहीं करता…. और इनकी सोच और नजरिया इतना सीमित होता है कि कुएं का मेंढक  भी कुँए से कूदकर आत्महत्या कर ले | लेकिन लोग इनको विद्वान कहते हैं, ज्ञानी कहते हैं |

इसलिए मैंने दुनिया को सुनना अब बंद कर दिया, दुनिया की सलाह लेना भी बंद कर दिया…क्योंकि मेरे पास खोने को कुछ नहीं है और यदि शरीर खो गया तो दूसरा फिर मिल जाएगा… इसलिए जितना एक्सपेरिमेंट मैं इस जन्म में कर सकता हूँ कर लूँ, बाकी अगले जन्म में देखा जायेगा | तो अब आप लोग मुझे अहंकारी, आत्ममुग्ध या मानसिक रोगी कुछ भी कह सकते हैं…. लेकिन साथ ही साथ यह अंग्रेजी वाला लेख भी पढ़ लीजिये…. मुझे अंग्रेजी आती नहीं, नहीं तो मैं ट्रांसलेट करके दे देता | ~विशुद्ध चैतन्य

It is currently accepted by science and geology that coal is a by-product of decaying vegetation. The vegetation becomes buried over time and is covered with sediment. That sediment eventually fossilizes and becomes rock. This natural process of coal formation takes up to 400 million years to accomplish.

Anything that is found in lumps of coal or in coal seams during mining, had to have been placed or dropped into the vegetation before it was buried in sediment.

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In 1944, as a ten year old boy, Newton Anderson, dropped a lump of coal in his basement and it broke in half as it hit the floor. What he discovered inside defies explanation based upon current scientific orthodoxy.

Inside the coal was a hand crafted brass alloy bell with an iron clapper and sculptured handle.

When an analysis was carried out it was discovered that the bell was made from an unusual mix of metals, different from any known modern alloy production (including copper, zinc, tin, arsenic, iodine, and selenium).

The seam from whence this lump of coal was mined is estimated to be 300,000,000 years old!

Full article: Everything We Have Been Taught About Human Origins Is A Lie

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