दाढ़ी का रहस्य

मैं विश्वविद्यालय में शिक्षा के लिए भर्ती हुआ। मुझे स्कालरशिप चाहिए थी। बजाय लंबे रास्तों के, मैं सीधे वाइस चांसलर के दफ्तर में पहुंच गया। वाइस चांसलर ने कहा, यह ठीक नहीं है, जहां दरख्वास्त देनी है वहां दरख्वास्त दो, और समय पर तुम्हें उत्तर मिल जाएगा।

मैंने कहा, अंततः आपको निर्णय करना है। व्यर्थ समय क्यों खोना? इसलिए मैं सीधी आपके पास ही चला आया हूं। यह रही दरख्वास्त। और मैं नहीं कहता कि स्वीकार करो। जो तुम्हारी मर्जी हो। हकदार मैं हूं। वह इस दरख्वास्त में सब लिखा हुआ है। और अगर कल कोई मुझसे बड़ा हकदार आ जाए, तो मुझे खबर करके बुलवा लेना। स्कालरशिप वापस कर दूंगा। झंझट क्या है?

उसे भी लगा कि लड़का थोड़ा अजीब है। और इसके पहले कि वह कुछ कहे, मैं आराम से कुर्सी पर बैठ गया। उसने कहा,यह बात ठीक नहीं।

मैंने कहा, गलती तुम कर रहे हो और बात ठीक मेरी नहीं? इतनी देर से मैं खड़ा हूं और तुम कुर्सी पर बैठे हो। तुम्हें कहना चाहिए था कि कुर्सी पर बैठो। तुम कुछ कहते नहीं, कुर्सी कुछ कहेगी, इधर और कोई दिखाई पड़ता नहीं। मजबूरी में निर्णय मुझे खुद करना पड़ा। मैं कुर्सी पर बैठ गया हूं।

उसने कहा, तुम आदमी अजीब मालूम पड़ते हो। क्या मैं पूछ सकता हूं, यह तुमने दाढ़ी क्यों बढ़ा रखी है? मैंने कहा, अब थोड़ी बातचीत हो सकती है। अब आप मेरे चक्कर में आ गए। स्कालरशिप का निर्णय हो लेगा, हो लेगा। बूढ़े आदमी थे। आक्सफोर्ड में इतिहास के प्रोफेसर थे। उसके बाद जब रिटायर हुए, तो हिंदुस्तान की उस यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर हो गए थे। मैंने उनसे पूछा, यह भी हद हो गयी! अगर मैं आपसे पूछूं कि दाढ़ी क्यों कटाते हैं, तो प्रश्न सार्थक मालूम होता है। आप उल्टे मुझसे पूछ रहे हैं कि दाढ़ी क्यों बढ़ाते हो? मैं नहीं बढ़ाता, दाढ़ी अपने आप बढ़ रही है। सवाल मैं वापस लौटकर आपसे पूछता हूं, कि दाढ़ी क्यों कटी? आपकी दाढ़ी और मूंछ को क्या हुआ?

READ  आध्यत्मिक उत्थान और शाकाहार-माँसाहार

कहने लगे, यह बड़े मुश्किल है, मगर बात तुम्हारी ठीक है। दाढ़ी बढ़ती है अपने आप; काटता मैं हूं रोज दिन में दो बार, मगर क्यों काटता हूं, यह कभी सोचा नहीं। और सभी लोग काटते हैं इसीलिए काटता हूं।

मैंने कहा, यह तो कोई बहुत विचारपूर्ण उत्तर न हुआ। इस दुनिया में नालायकों की भीड़ है और तुम उन्हीं नालायकों की भीड़ का अनुसरण कर रहे हो। और चूंकि मैंने अनुसरण नहीं किया उनका, तुम मुझसे उत्तर पूछ रहे हो। अब दुबारा दाढ़ी मत छूना। और मैं रोज आकर देख जाया करूंगा। मैंने कहा, थोड़ा सोचो तो। अगर स्त्रियां दाढ़ी बढ़ाने लगें और मूंछें बढ़ाने लगें, या रामलीला में बिकने वाली मूंछें खरीद लाए और और दाढ़ी चिपका लें, तो क्या खूबसूरत लगेंगी? और तुम बामेहनत रोज सुबह-सांझ दाढ़ी और मूंछ को काटकर वही कर रहे हो, जो कोई स्त्री दाढ़ी और मूंछ बढ़ाकर करे।

उस बूढ़े आदमी ने मुझसे कहा, माफ करो मुझे। स्कालरशिप तुम्हारी स्वीकार हुई, मगर रोज मत आना। और अब इस बुढ़ापे में दाढ़ी मत बढ़वाओ। क्योंकि अभी तुम अकेले पूछने वाले हो। अगर मैं दाढ़ी और मूंछ बढ़ाऊंगा तो पूरी यूनिवर्सिटी पूछेगी कि क्या हुआ, आप दाढ़ी और मूंछ क्यों बढ़ा रहे हैं? मत झंझट में मुझे डालो। लेकिन उस आदमी को चोप लग गयी। उस आदमी ने फिर दाढ़ी-मूंछ नहीं काटी। सारी यूनिवर्सिटी पूछती थी और वह कहता था, कि उस लड़के से पूछ लेना। सारा राज उसे मालूम है।

चारों तरफ हजारों लोग हैं और तुम उनका अनुसरण कर रहे हो। और इसी अनुसरण से तुम्हारे व्यक्तित्व का निर्माण हो रहा है। और इसी व्यक्तित्व को तुम अपनी आत्मा समझे हुए हो। सदगुरु का काम होगा, कि सबसे पहले यह चादर उतार ले। तुम्हें नग्न कर दे। तुम्हें वहां पहुंचा दे, जहां तुम्हारे ऊपर कोई दाग नहीं। तुम्हें वैसा ही कर दे, जैसे तुम पैदा हुए थे–खाली, निर्दोष, शून्य। ओशो सदगुरु शिष्य की मृत्यु है

READ  शराबी...

लेख से सम्बंधित अपने विचार अवश्य रखें

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of