कीचड़ की होली

Mud Festival

भारत में जिस प्रकार रंगों की होली का चलन है ठीक वैसे ही विदेशों में और भारत में भी कहीं कहीं कीचड़ की होली का चलन है | लेकिन ये होली आपस में नफरत नहीं, बल्कि अपनत्व व आपसी सौहार्द ही बढ़ाता है | भारत में भी होली एक ऐसा त्यौहार है जो आपसी मनमुटाव मिटाकर फिर एक हो जाने का अवसर होता था कभी |

ऐसी ही कीचड़ की एक होली मनाया जाता है हर पाँच से में कई बार और हमारे यहाँ भी उतना ही उत्साह होता है | मैं इस कीचड़ की होली को हिंदी में मतदान, चुनाव और अंग्रेजी में इलेक्शन के नाम से जानता हूँ | इस तस्वीर को आप ध्यान से देखें तो आपको लगेगा कि सभी एक दूसरे के दुश्मन हैं, लेकिन वास्तव में वे खेल का आनन्द ही ले रहे होते हैं और कोई बुरा नहीं मानता अगर कोई कीचड़ में किसी को घसीट ले या कीचड़ उछाल दे | ठीक इसी प्रकार चुनाव में भी प्रतियोगियों में आपस में कोई बैर नहीं होता बस सब एक दूसरे पर कीचड़ ही उछाल रहे होते हैं और त्यौहार समाप्त हो जाने पर सब कुछ सामान्य हो जाता है |

लेकिन बाहर से देखने वाले इसे दिल पर ले लेते हैं और असली शत्रुता पाल लेते हैं | यह बिलकुल ही गलत है | हम अपने ही पडोसी से बात करना बंद कर देते हैं, अपने दोस्तों और परिचितों से दुश्मनी ले लेते हैं | कॉलेज में साथ पढ़ने वाले सहपाठियों से झगड़ा मोल ले लेते हैं…. आखिर क्यों ?

क्यों नहीं हम एक त्यौहार को त्यौहार की तरह ही मना पाते ? क्यों कीचड़ की होली, खुनी होली में बदल जाती है ? क्या मिलता है यह सब करके ? प्रतियोगियों को तो जीतने और हारने पर करोड़ों की सम्पत्ति मिलती है, घोटाला करने की छूट मिलती मिलती है, जमीन हड़पने का अधिकार मिलता है, जितने भी केस उनपर चल रहे होते हैं वे ख़ारिज हो जाते हैं, चुनाव से पहले जो दोषी थे, जिनके विरुद्ध ३-४ सौ पेज के साक्ष्य होते हैं, वे कोरे कागज़ में बदल जाते हैं, जघन्य अपराधों में जेल में बंद चहेते, जेल से बाहर हो जाते हैं…… लेकिन आप लोगों को क्या मिलता है ?

यह तो कुछ वैसी ही बात हो गयी जैसे, “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना |”

तो त्यौहार को त्यौहार की तरह ही मनाइए | जब भी चुनाव का मौसम आये और चारों तरफ रंग बिरंगे झंडे और बैनर लहराए, मन उमंगों और नए सपनो से भर जाए, अच्छे दिन आयेंगे वाले गीत पर पैर थिरकने लगें और मन मयूर नाचकर गाने लगे, “हमरा नेता लाओ देश बचाओ….” तब पूरे उत्साह से मनाइए त्यौहार… फेंकिये कीचड़ जितना मन चाहे…. लेकिन पूरे साल मत खेलिए | त्यौहार समाप्त होते ही फिर से एक हो जाइए और देश व देश के नागरिकों के विषय में चिंतन कीजिये |

रावण यूपी का था या लंका का, दलित था या ब्राह्मण… साक्षी महाराज, साध्वी प्रज्ञा, औवेसी, तोगड़िया, आदित्यनाथ, भागवत जैसे महान विद्वानों के बयानों पर भी हमें आपसे में सर फुटव्वल करने की तब तक आवश्यकता नहीं है, जब तक वे किसी को आर्थिक लाभ न दे रहे हों | या किसी को कोई अधिकारी या मंत्री पद देने का लिखित वादा किया हो, तब तो ठीक है कि आप फेसबुक पर सर-फुटव्वल करें…. लेकिन हर किसी को यह सब करने की आवश्यकता नहीं है | ये लोग जो भी विषय उठाते हैं वे न जनता के हित के होते हैं और न ही राष्ट्रीय हित के होते हैं…. वे तो केवल अपनी अपनी आदत से विवश होते हैं…. लेकिन आप जैसे पढे-लिखे लोग ऐसे विषयों को उछालना शुरू कर देते हैं तो आश्चर्य ही होता है | हम दुमछल्लों की और बात है क्योंकि उनके पास अपना तो कोई दिमाग होता नहीं है, लेकिन समर्थक भी यदि ऐसे कामों में व्यस्त होंगे तो कैसे काम चलेगा ? इन विषयों में लिप्त होने का कोई लाभ नहीं है इसलिए कीचड़ की होली समाप्त होते ही इन मुद्दों को भी ठन्डे बस्ते में उसी प्रकार डाल दीजिये, जैसे चुनावी वादों को डाल देते हैं | जैसे विजेता अपनों अपनों में मस्त हो जाते हैं और जनता को भूल जाते हैं, ठीक वैसे ही आप भी सब भी अपनों में मस्त हो जाइए और प्रतियोंगियों को अगले चुनावी मौसम तक भूल जाइये |

तभी इस कीचड़ भरे त्यौहार की सार्थकता है और यही त्यौहार इतना आनंददायक हो जाएगा कि एक दिन यह त्यौहार वार्षिकोत्सव में परिवर्तित हो जायेगा | फिर यह त्यौहार खुनी त्यौहार के रूप में नहीं, कीचड़ और गाली-गलौज के त्यौहार के रूप में जाना जाएगा | और हर किसी के जुबान पर होगा, “बुरा न मानो इलेक्शन है !”

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