पत्थरों को पूजते पत्थर के इन्सान

दूर दराज के गाँवों, देहातों या घने जंगलों में आदिवासियों के आसपास कोई संत या संन्यासी एकांत खोजता हुआ पहुँच जाता है | जो भी गाँव देहात से उसे कुछ भोजन पानी मिल जाता है, उसी पर गुजर बसर करता है, नहीं तो वनों में अकेले जीने की आदत डाल लेता है |

वह संत अपनी तरफ से ग्रामीणों की कोई न कोई सहायता करता ही है इस तरह उसकी झोंपड़ी एक दिन आश्रम में परिवर्तित हो जाती है | बाद में उस संत के शिष्य व अनुयायी भी आ जाते हैं और इस तरह एक बड़ा कुनबा तैयार हो जाता है |

एक दिन संत गुजर जाता है और जो उसके शिष्य बने हुए थे, वे आश्रम के उत्तराधिकारी बन जाते हैं | अब चूँकि आश्रम के पास पर्याप्त भूमि हो चुकी होती है, तो उसे ही बेचकर या किराए पर चढ़ाकर ये शिष्य गुरु बनकर बैठ जाते हैं | ग्रामीणों की अब कोई सुध नहीं केवल धनवानों के पीछे डोलते फिरते हैं ये गुरु |

ऐसे आश्रमों में जब कोई प्रतिमा की स्थापना की जा रही होती है, लोग प्रतिमा की स्थापना के लिए लाखों का चंदा दे रहे होते हैं, तब कभी ऐसी कोई तस्वीर सामने आ जाती है सामने, तब अंतरात्मा रो पड़ती है | समझ में नहीं आता कि ये आश्रम, इनके गुरु, शिष्य, व अनुयायी कैसे खुश हो लेते हैं ?

गाँव देहातों, गरीबों, असहायों के लिए वे कुछ करने की बजाये पत्थर की प्रतिमाओं पर सर फोड़कर खुद को धन्य मानते हैं लोग | मुझे वास्तव में ये लोग पत्थर के ही जान पड़ते हैं |

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मैं स्वयं ऐसे ही आश्रम का सदस्य हूँ, और स्वयं को बहुत ही विवश पाता हूँ | सारा समाज, सारे धार्मिक, सारे धन्ना सेठ आडम्बरों और दिखावों में लिप्त हैं…मैं अकेला इन सबको समझा भी नहीं सकता | प्रतिमा स्थापित करवानी हो, मंदिर बनवानी हो, तो करोड़ों का चंदा मिल जाएगा, लेकिन कुछ ऐसा काम करना हो, जिससे समाज का कोई हित होता है, तो ठोकरें ही मिलेंगी या फिर सौ पचास रूपये की चिल्ल्हर |

आज यह तस्वीर मेरे सामने आयी, न जाने किस गाँव की है, लेकिन तस्वीर देखकर ही दिल रो पड़ा | मैं स्वयं को उस वृद्ध के स्थान पर रखकर और उस स्त्री के स्थान पर अपने ही किसी प्रियजन को रखकर कल्पना करता हूँ कि क्या गुजर रही होगी उनपर…तो सचमुच हाथ पैर ठन्डे पड़ जाते हैं |

लेकिन यह देश किताबी धार्मिकों का देश है, सारे परोपकार, नैतिकता, सहयोगिता के प्रवचन किताबी हैं व्याहारिक नहीं | किताबी धार्मिकों, किताबी धर्मगुरुओं और आश्रमों के प्रमुखों से कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे इस जन्म में कम से कम कभी कभार ही कुछ समय के लिए इंसान बन जाएँ |

पत्थरों की प्रतिमाओं को भोग लगाने या उनपर लाखों लुटाने की बजाये, ईश्वर की अनुपम रचना यानि जीती जगती प्रतिमाओं पर भी कुछ धन लुटाओ, उन्हें भी कुछ भोग लगाओ, उनके जीवन को थोडा तो सरल बनाओ ?

~विशुद्ध चैतन्य

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