काम (Sex) का दमन बना अभिशाप

बलात्कार, यौनशोषण, बच्चियों से बलात्कार व हत्या के समाचार से भरे रहते हैं समाचार पत्र

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आदिकाल से वैश्यावृति, यौनशोषण, यौनहिंसा चला आ रहा है, जो पकड़ा गया वह पापी और जो नहीं पकड़ा गया वह पुण्यात्मा |

सेक्स की भूख प्राकृतिक है और सनातन है | सनातन इसलिए क्योंकि यह धर्म, जाति, सवर्ण दलित, ब्राह्मण-शूद्र के भेदभाव से परे है | यह आस्तिकता, नास्तिकता से भी परे, यह देश, राज्य की सीमाओं से भी परे है….अर्थात सनातन है, सार्वभौमिक है |

चूँकि अधिकाँश मानव प्रजाति सेक्स कुंठा से ग्रस्त है, और सभी को सही समय पर सेक्स अनुभव नहीं मिल पाता या योग्य साथी नहीं मिल पाता, इसलिए सेक्स विश्व का सबसे प्राचीन व शायद प्रथम व्यवसाय बना | सेक्स के प्रति मानव व बंदरों की आसक्ति लगभग समान है | इंसान बंदर न बन जाएँ वापस इसलिए सेक्स के प्रति दमन का भाव भर दिया गया | अब जो भी खुद को आध्यत्मिक या धार्मिक दिखाना चाहता है, वह डींगे मारता है कि सेक्स के प्रति उसका भाव शून्य हो गया है | वास्तविकता यह है कि निरंतर दमन करते करते, वह नपुंसक हो चुका होता है या फिर अपने मस्तिष्क में यह धारणा ही बैठा चुका होता है सेक्स पाप है | और ऐसे लोग समाज में बहुत ही सम्मानित माने जाने लगे |

समाज आगे बढ़ता चला गया और सेक्स के प्रति दमन का भाव भी बढ़ता चला गया | पहले समाज में विवाह पच्चीस वर्ष की आयु तक हो ही जाता था | लेकिन आज बच्चे डिग्रियाँ बटोरने में ही आधी जवानी बर्बाद कर देते हैं | उसके बाद नौकरी के लिए भटकते हुए आधी उम्र निकल जाती है | ऐसे में सेक्स का व्यवसाय तेजी से फला फूला | समाज ने कभी भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया कि सेक्स मनुष्य की मौलिक आवश्यकता है | और देखते ही देखते सारा समाज ही सेक्स कुंठित हो गया |
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ऐसे में स्त्रियों का ही नहीं, पुरुषों का भी शोषण शुरू हो गया और जो आर्थिक व सामाजिक रूप से समृद्ध हैं, जिनकी राजनैतिक पहुँच अच्छी है वे ऐसे सेक्स से संबाधित सभी सुख प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र होते हैं और उन्हें सभी सुख उपलब्ध भी रहते हैं | लेकिन साधारण व गरीबों के लिए ये सब सुविधाएँ स्वर्ग या जन्नत पहुँचने से पहले सोचना भी पाप है |इसलिए मानव समाज  में अधिकांश सेक्स कुंठित जीवन जीता है और उनमें से कुछ मानसिक रूप से विक्षिप्तता के स्तर तक पहुँच जाते हैं | परिणाम होता है यौनहिंसा, बलात्कार अश्लील साहित्यों व चलचित्रों का वृहद होता बाजार | चूँकि समाज ही सेक्स कुंठाओं से ग्रस्त है, इसलिए इस समस्या को सुलझाने में असमर्थ हो गया | जैसे नशे का आदि परिवार नशे से मुक्त हो पाने में असमर्थ हो जाता है | उन्हें समझ में ही नहीं आता कि नशे से मुक्त कैसे हुआ जाये  | यदि कोई उन्हें सुझाव दे भी तो व्यर्थ हो जाता है क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अधिक समझदार हैं | यही स्थिति है समाज की |

समाज ही दोषी है अपराधों के लिए

समाज यौन हिंसा, यौन उत्पीडन और बलात्कार की परिभाषा भी सही नहीं कर पाया आज तक | यौनहिंसा, यौन उत्पीडन का अर्थ होता है किसी को  शारीरिक रूप से यातना देकर या कष्ट पहुँचाकर यौन सुख प्राप्त करना |बलात्कार का अर्थ है किसी की सहमती के बिना या बलपूर्वक शारीरिक सम्बन्ध बनाना | लेकिन समाज ने नयी नयी परिभाषाएं गढ़ लीं और नई नई सजाओं का आविष्कार कर लिया | क्योंकि समाज यह मानता है कि अपराधों के मूल कारणों को दूर करने की बजाय, भय व दण्ड से अपराध को रोका जा सकता है| यह कुछ वैसी ही बात हो जाती है जैसे कोई व्यक्ति भूख से निढाल हो जाता है, वह इस आशा में रहता है कि उसका समाज उसकी भूख मिटाने का कोई उपाय करेगा | लेकिन समाज को उस व्यक्ति की कोई चिंता नहीं होती | अंत वे वह चोरी करता है पहली बार और पकड़ा जाता है | समाज स्वयं पर शर्मिंदा नहीं होता कि उसके समाज में कोई भूखा रह गया, बल्कि भूखे को दण्ड दे देता है | क्योंकि समाज में भूखा मर जाना महानता है लेकिन भूख मिटाने के लिए चोरी करना पाप है, अधर्म है, अपराध है | जबकि सनातन धर्मानुसार दोषी वह समाज माना जायेगा, जिसके समाज में कोई भूखा रह गया |
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सभी धार्मिक ग्रंथों में भूखों को अन्न देना, असहायों की सहायता करने के उपदेश भरे पड़े हैं | लेकिन समाज इन उपदेशों को केवल दूसरों को सुनाने के लिए प्रयोग करता है, व्यव्हार में लाने के लिए नहीं | समाज भूखों को अपमानित करेगा, प्रताड़ित करेगा और अपेक्षा करेगा कि वह नैतिक हो जाये | वह मेहनत करना भी चाहे तो कोई उसे नौकरी नहीं देगा और चाहेगा कि वह नैतिक हो जाए भूखे पेट नैतिक उपदेश सुनकर, भजन-कीर्तन सुनकर | तो कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का अपराध करता है, उसके लिए दोषी वह व्यक्ति नहीं, समाज है | अपराधियों को कारागारों में ठूंस दिया जाता है, लेकिन समाज कभी उनसे पूछने नहीं जाता कि किन परिस्थियों में उन्हें अपराध करना पड़ा उलटे अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की वकालत करने लगते हैं | सजा तो समाज, धर्म व नैतिकता के ठेकेदारों को मिलनी चाहिए | क्योंकि उन्हीं का दायित्व था कि उनके समाज में कोई ऐसा वातावरण न बने कि उनके समाज में अपराधी जन्म ले पायें | लेकिन समाज, नैतिकता व धर्म के ठेकेदार असफल हो गये, इसलिए अपना दोष अपराधियों के मत्थे मढ़कर चैन की नींद सोते हैं | यौन अपराध हों या किसी भी और प्रकार के अपराध, जब तक मूल कारणों पर समाज ध्यान नहीं देगा, जब तक मूल कारणों को दूर करने का सार्थक प्रयास नहीं करेगा, अपराध नहीं रुकेंगे और सजा से तो बिलकुल भी नहीं | क्योंकि सजा भी समाज केवल निर्बलों, असहायों को ही दे पायेगा, सबल, समृद्ध व प्रभावशाली लोगों को नहीं | और चूँकि प्रभावशाली लोगों में सामर्थ्य होता है, पुलिस अधिकारी से लेकर मंत्रियों और न्यायाधीश तक को खरीदने का, इसीलिए जिनकी प्रवृतिक ही अपराधिक होती है, वे इन प्रभावशाली व्यक्तियों के संरक्षण में रहते हैं |फिर ये अपराधी माध्यम बनते हैं प्रभावशाली लोगों के इशारों पर हत्या करवाने, दंगे करवाने, भीड़ बनकर हत्या करवाने, लड़कियों की तस्करी करवाने, देहव्यापार से लेकर सभी तरह के अवैध कार्यों को करवाने के लिए | समाज केवल कुछ छुटपुट अपराधियों को सजा दिलाकर अपनी पीठ ऐसे थपथपाता है, मानो अपराध का नामों निशान ही मिटा दिया हो | लेकिन न अपराध कभी मिटा है और न मिटेगा | क्योंकि समाज धार्मिकता, कूपमंडूकता और आत्ममुग्धता के नशे में धुत्त है | और नशे में धुत्त व्यक्ति हो या समाज वह पतन की राह ही पकड़ता है |
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अपराधियों को समाज द्वारा चुने गये नेताओं और समाज द्वारा सम्मानित धनवानों का संरक्षण प्राप्त रहता है | समाज यह सब जानते हुए भी अपराधियों या उनके रिश्तेदारों को ही दोबारा अपना नेता चुन लेता है  इस प्रकार समाज अपराध को बढ़ाने में, अपराधों को फलने फूलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | मुझे ऐसे लोगों पर अब हँसी आती है जो अपराधियों को वोट देते हैं और अपराधियों को कड़ी सजा देने की वकालत भी करते हैं | यौनअपराध भी तभी रुकेगा, जब समाज मनुष्य की नैसर्गिक यौन आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए सार्थक कदम उठाएगा | दमन करने से समस्या का समाधान नहीं होने वाला, बल्कि मनुष्य मानसिक रूप से विक्षिप्त ही होगा और परिणाम होगा वीभत्स व क्रूर यौन हिंसाएँ, बलात्कार व हत्याएं | ~विशुद्ध चैतन्य

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