मुझे छूआ-छूत की बीमारी है यह मैं स्वीकार करता हूँ

आज फिर दिमाग कुंद है और कुछ समझ में ही नहीं आ रहा कि क्या लिखूं । अब तो ऐसा भी लग रहा है कि लिखना बहुत ही मुश्किल काम है । कई बार ऐसा भी लगता है कि मैंने पहले कभी लिखा ही नहीं । और ऊपर से आज ब्रॉडबैंड भी नहीं चल रहा बारिश के कारण ।

हाँ एक बार अवश्य अनुभव किया है मैंने कि जब भी डेस्कटॉप पर होता हूँ तो न जाने कैसे लिखने लगता हूँ और कई बार तो अपने ही लेख पढ़कर डर जाता हूँ कि इतना कुछ मैंने कैसे लिख दिया ? यह भी नहीं कि हर बार मैं किसी विषय पर पहले से सोचकर लिखता हूँ । बस अचानक कुछ दिमाग में आया और लिखना शुरू किया कि दो चार लाइन ही तो लिखना है, लेकिन पता ही नहीं चलता कि कब ‘चार लाइना’ उपन्यास में रूपांतरित हो जाती है । और मेरा डेस्कटॉप साउथ फेसिंग है । यानि उत्तर दिशा की दीवार की तरफ रखा है टेबल । तो टाइप करते समय मेरा मुँह उत्तर की तरफ रहता है । वास्तुशास्त्र में रूचि थी बचपन से इसलिए उसी के अनुसार मैं हमेशा उत्तर या पूर्व की तरफ ही मुँह करके बैठना पसंद करता हूँ । हालांकि मैंने सबसे अधिक नाम और पैसा कमाया पश्चिम की तरफ मुँह करके बैठने पर । (पढ़े-लिखे व वैज्ञानिक सोच के विद्वान् अपने मंस्तिष्क के बाएँ भाग की ऊर्जा व्यर्थ न करें )

फिर मैंने यह भी पाया कि किसी और कमरे में या किसी और के मकान में मेरा लिखना पढ़ना सब कुंद हो जाता है । मैं केवल वहीँ अधिक सहज रहता हूँ जहाँ मुझे टोंका टाँकी न किया जाता हो । मैं अपने पुराने अनुभवों को याद करूँ तो केवल उन्हीं स्टूडियो में मेरा परफॉर्मेंस अच्छा रहा, जहाँ मालिक सर के ऊपर नहीं था या पूरा मालिकाना अधिकार ही मेरे हाथ में रहा । यानि निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता रही और निर्णय लेने के बाद किसी से पास नहीं करवाना पड़ा । लेकिन मैं वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाया जहां शेयरिंग करना पड़ता हो । मैं आज भी उन चीजों से सहज नहीं हूँ जो मेरे अलावा कोई और प्रयोग करे चाहे वह बाथरूम या टॉयलेट ही क्यों न हों ।

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तो जब ब्रॉडबैंड नहीं चलता तब मैं टेबल पर नहीं बैठता । और जब टेबल पर नहीं बैठता तब कुछ लिखा ही नहीं जाता है । मेरी स्थिति बिल उस बालक की तरह हो जाती है जो एक टीले पर बैठकर बहुत अच्छा न्याय करता है लेकिन टीले से उतरते ही सामान्य हो जाता है । लोगों ने टीले की खुदाई की तो पाया कि उसके नीचे सिंहासन बत्तीसी है ।

आध्यात्मिक जगत में भी मैंने देखा कि सिद्ध लोग अपने प्रयोग करने में आने वाली चीजें हर किसी को नहीं छूने देते । केवल किसी प्रिय शिष्य, या पत्नी या सहयोगी को ही हाथ लगाने की अनुमति होती है । मेरे बड़े मामा तो इतने सेन्जिटिव थे कि एक बार अचानक उनकी तबियत बिगड़ गयी । उन्हें तेज बुखार व उल्टियाँ शुरू हो गयीं |तब उन्होंने पूछा कि उनके बर्तन को किसी बाहरी व्यक्ति ने तो हाथ नहीं लगाया । सबने इनकार में सर हिला दिया । उन्होंने कहा कि पता करो किसी रजस्वला स्त्री ने मेरे बर्तन को छुआ है । पूछताछ की गई जितने भी भक्त व श्रद्धालु उस दिन आये थे मिलने । तब पता चला कि एक श्रद्धालु महिला सेवाभाव से उनके पीने के पानी का गिलास धो लाइ थी और वह रजस्वला है ।

इसी प्रकार युटीवी के एक साउंड इंजिनियर थे जो मेरे सीनियर व गुरु भी थे, अपनी चेयर पर किसी को नहीं बैठने देते थे फिर चाहे कोई कितनी ही बड़ी हस्ती क्यों न हों । और गलती से यदि प्रोड्यूसर ही उनकी चेयर पर बैठ गए तो रिकॉर्डिंग ही कैंसल कर देते थे ।

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बस मामा की तरह ही कोई बिमारी मुझे भी बचपन से है । जब भी कोई मेरे कंप्यूटर या मेरे प्रयोग की चीजों को हाथ लगा देता है तो मैं फिर उस पर काम करने में असहजता महसूस करता हूँ।

तो मेरे जीवन में यह स्थान तीसरा स्थान है जहाँ मैं स्वयं को स्वतंत्र पाता हूँ । और विशेषकर अपने कंप्यूटर टेबल वाले कमरे को । यहाँ मैं बहुत ही सहज अनुभव करता हूँ । साथ ही उत्तर दिशा की तरफ मुँह रहने से एकाग्रता बढ़ती है । इसलिए वास्तु शास्त्र में कहा जाता है कि पढ़ाई में रूचि बनी रहे और मन स्थिर रहे इसके लिए बच्चों को उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके बैठना चाहिए । त्राटक या गहन साधना के समय भी उत्तर दिशा की तरफ मुँह रखकर बैठने की सलाह दी जाती है । इससे एकाग्रता शीघ्र प्राप्त होती है |

~विशुद्ध चैतन्य ।

नोट: पढ़े-लिखे व वैज्ञानिक सोच वाले (वैज्ञानिक नहीं) विद्वान् इस पोस्ट को दिल पर न लें क्योंकि ये सारी बातें उनपर लागू नहीं होते। इसमें जो कुछ भी कहा गया है वह केवल उनपर लागू हो सकता है जिनके दिमाग का दायाँ भाग सक्रिय है ।


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