संन्यास और दीक्षा से क्या तात्पर्य है ?

Sadhna Awasthi जी ने पूछा है मुझसे, “संन्यास और दीक्षा से क्या तात्पर्य है ?

पहले संन्यास को समझ लेते हैं |

संन्यास क्या है ?

संन्यास यह शब्द एक विशिष्ट अर्थ में रूढ़ हो गया है, जो चिंतनशील लोगों के मन में खिन्नता का सहज भाव पैदा करता है। दीर्घकाल से यह शब्द अकर्मण्य लोगों की निष्क्रियता, निठल्लापन, पलायन, गैरजिम्मेदार जीवन-यापन, परावलंबन, पाखंड का प्रतीक बनकर रह गया है। इसका प्रमुख कारण है कि शास्त्रों से संन्यास किसी की समझ में नहीं आया |

सम + न्यास = संन्यास | सम का अर्थ है एक समान और न्यास के कई अर्थ होते हैं | जैसे; 1. स्थापित करना, 2. यथास्थान रखना, 3.निशान, चिह्न (जैसे—शस्त्र–न्यास, नख–न्यास), 4. अमानत, थाती, धरोहर, 5. सौंपना, अर्पण, भेंट,  6. छोड़ना, त्यागना, 7. विश्वासपूर्वक विशेष कार्य हेतु सौंपी गई संपत्ति, ट्रस्ट

संन्यास आश्रम के विषय में पढ़ा लोगों ने और यह माना कि संन्यास आश्रम यानि वानप्रस्थ आश्रम के बाद संन्यास आश्रम यानि अंतिम अवस्था | संन्यास यानि सब कुछ छोड़ छाड़ कर, वन में चले जाओ और वन से भी मन उकता जाए तो वन से भी विरक्त हो जाओ और कहीं धूनी रमा कर ध्यान मग्न होकर, आराध्य का नाम जपते हुए हुए मृत्यु की प्रतीक्षा करो |

जबकि यह आशय था ही नहीं संन्यास का | संन्यास का आशय या भाव केवल यही था कि व्यक्ति सांसारिक उलझनों, व्यसनों, वासनाओं, कामनाओं व मोह में लिप्त रहता है और संन्यास से वह इन सब से मुक्त पाए | लेकिन यदि वृद्धावस्था में भी वह मोह व कामनाओं से मुक्त न हुआ तो व्यक्ति का जन्म ही बेकार हो जाएगा | अतः संन्यास आश्रम की व्यवस्था की गयी ताकि व्यक्ति सभी प्रकार के मोह, बंधनों से जीते जी ही मुक्त हो जाए और यदि वह दूसरा जन्म भी ले, तो फिर इस जन्म में प्राप्त अनुभवों पर संन्यास आश्रम में जो चिंतन मनन किया, उसके सार को संस्कार बनाकर नए जन्म में प्रवेश ले और कुछ नवीन करे | यदि व्यक्ति मोह और कामनाओं से आसक्त होकर नया जन्म लेगा, तो वह भी उसी भेड़चाल में चल पड़ेगा, जिसपर वह पिछले जन्म में चल रहा था | और यह ऐसा चक्र है कि व्यक्ति निकल ही नहीं पायेगा कभी भी बाहर | जैसे दौलत कमाने की दौड़ में पड़े लोगों को देखिये, जैसे सत्ता की चाह में भटकते लोगों को देखिये, जैसे स्त्रियों पर आसक्त व्यक्तियों को देखिये….उनकी भूख शांत नही हो पाती, कितना ही उन्हें मिल जाए, उनकी आँखे कुछ और कुछ और की कामना में डूबी मिलेंगी | वे अपनी भूख मिटाने के लिए दूसरों की संपत्ति यहाँ तक जीने का मौलिक अधिकार छीनने से भी नहीं चूकेंगे |

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इसीलिए उस समय वृद्धावस्था में अपना सारा दायित्व युवाओं को सौंपकर संन्यास ले लेना श्रेष्ठ माना जाता था |

लेकिन संन्यास की नयी परम्परा शुरू की आदिशंकराचार्य ने | इसमें संन्यास लेने के लिए वृद्ध होना अनिवार्य नहीं था, बल्कि युवाओं को संन्यास के लिए प्रेरित किया जाता था | उसका प्रमुख कारण था कि मुगलों से लड़ने के लिए, अपने देश की संस्कृति की रक्षा करने के लिए युवाओं की आवश्यकता थी | मुगलों के जाने के पश्चात् ये अखाड़े कर्मकाण्ड और परम्परा ही ढोते रह गये और मूल उद्देश्यों को भूल गये |

तो संन्यास आज हम जो देख रहे हैं, यह वह संन्यास नहीं है जिसका वर्णन शास्त्रों में है | अब साधू-संन्यासी केवल विरक्त होने का ढोंग करते हैं, भीतर से कामनाओं और वासनाओं में लिप्त रहते हैं | अब साधू-संन्यासी सत्य के पक्ष में नहीं, बल्कि सत्ता और धन के पक्ष में लिप्त मिलेंगे | अखाड़ों के बीच सत्ता को लेकर आपसी तनाव यहाँ तक कि खुनी लड़ाई आज भी जारी ही है | अब आप स्वयं सोचिये त्यागी होते ये लोग तो क्या सत्ता और धन के लिए आपस में लड़ते कभी ?

आधुनिक संन्यास

अब चूँकि प्रश्न आपने मुझसे पूछा है, तो मैं आपको शास्त्रों में नहीं उलझाऊंगा क्योंकि अब तक लोग शास्त्रों में ही उलझे रहे, लेकिन संन्यास नहीं समझ पाए | संन्यास का वास्तविक अर्थ होता है तटस्थता का संकल्प लेना | संन्यास का अर्थ होता है सभी के लिए समान भाव रखने का संकल्प लेना यहाँ तक कि स्वयं के भावों के प्रति भी | निरंतर अपने मनोभावों, कामनाओं पर चिंतन मनन करते रहना | संन्यास का का अर्थ त्याग भी है, लेकिन त्याग मन मारकर नहीं | संन्यास में त्याग का अर्थ है आसक्ति से मुक्त होना | सीधे-सादे शब्दों में कहूँ तो संन्यास है स्वयं में स्थिर हो जाना | बाहरी आडम्बरों, दिखावों से स्वयं को मुक्त कर अपनी स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त कर लेना ही संन्यास है |

मैं आपको आधुनिक संन्यास समझा रहा हूँ न कि प्राचीन वैदिक संन्यास या मध्ययुगीन शंकराचार्य द्वारा स्थापित संन्यास | मैं ढोंग या पाखंड में विश्वास नहीं करता | मैं उन साधू-संन्यासियों की तरह आपको विरक्ति व त्याग की महिमा का बखान नहीं करूँगा, जो स्वयं लोभ, मोह, कामनाओं और अहंकारों से मुक्त न हुआ हो लेकिन प्रवचन वैदिक काल के दे रहा है |

तो आधुनिक संन्यास है व्यक्ति समाज द्वारा बनाये गये भेदभाव से स्वयं को मुक्त कर ले | आधुनिक संन्यास है व्यक्ति अनासक्त रहते हुए सभी कुछ भोगे, गृहस्थ भी निभाये तो आसक्त हुए बिना यह मानकर कि ये सब एक दिन छूट ही जाना है | आप कितना भी धन संचय कर लो, कितनी ही संपत्ति संचय कर लो, एक दिन सब छूट जाना है यहाँ तक कि यह शरीर भी छोड़कर जाना पड़ेगा |

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कुछ लोग संन्यासी से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह तो त्यागी हो जाए, जो कुछ भी है उसके पास उसे त्याग दे और हमें बाँट दे, ऐसे लोभी लोगों के लिए संन्यासी त्यागी नहीं होता | तो संन्यासी को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि त्याग की दुहाई देकर कोई ठग उसे न ठग ले | यानि संन्यासी को सचेत व सतर्क ही रहना चाहिए तभी वह चैतन्यता को प्राप्त कर सकता है |

दीक्षा क्या है

विद्वान लोग कहते हैं कि दीक्षा का अर्थ है-गुरु के पास रहकर सीखी गई शिक्षा का समापन।

शिक्षा हमारे जीवन में हमारी दशा को सुधारती है परन्तु दीक्षा हमें एक नित्य दिशा देती है। कहा जाता है कि मानव को शिक्षा पुस्तकों से, समाज के लोगों से, नित्य निरंतर प्राप्त होती है परन्तु दीक्षा यानि दिशा किसी महापुरुष से ही प्राप्त हो सकती है। स्वामी विवेकानंद के पास भौतिक शिक्षा का भण्डार तो था परन्तु रामकृष्ण ने जब उन्हें दीक्षा दी तो उनके जीवन में एक नयी दिशा का प्रादुर्भाव हुआ।

मेरा मानना है कि दीक्षा गुरु और शिष्य के संबंधों की नींव है | जब कोई गुरु किसी को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करता है, तब वह शिष्य को दीक्षा यानि कोई मन्त्र, या नाम देकर दीक्षित करता है | यह सामान्य टीचर-स्टूडेंट, शिक्षक-छात्र जैसे संबंधो जैसा नहीं होता | यह मैं अपने अनुभवों से कह रहा हूँ |

गुरु और शिक्षक में अंतर

मुझे कभी भी कोई ऐसा गुरु नहीं मिला था, जिसे मैं अपना गुरु बना पाऊँ | एक से एक विद्वानों से मिला, लेकिन मेरी आत्मा ने उन्हें गुरु नहीं स्वीकारा | मैं भटकता रहा और यह समझता रहा कि मैं सही ही चल रहा हूँ | लेकिन जब किसी ने मुझे अपना शिष्य स्वीकारा, मेरे न चाहते हुए भी, तब स्थिति बदलने लगी | मेरे और गुरु के बीच हमेशा छत्तीस का आँकड़ा रहा क्योंकि जहाँ मैं जिन चीजों से स्वयं को मुक्त करना चाह रहा था, वही हमारे गुरुदेव की कमजोरी थी | यानि उन्हें पैसों से बहुत अधिक स्नेह है और सुबह आँख खुलते ही वे अकाउंट देखने लगेंगे और दिन भर पैसा पैसा करते रहेंगे | मुझसे कभी कोई आध्यात्मिक चर्चा नहीं करते, मुझसे तो क्या किसी से भी नहीं करते | बस अपने बच्चे, अपने दामाद, अपने डॉक्टर, इंजिनियर शिष्य, किस ने कितनी डिग्रियाँ बटोरी, किसकी कितनी अधिक सेलेरी है, कौन विदेश में है……बस इन्हीं सब के किस्से कहानियाँ |

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आज यदि मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो तो गुरु मिलने के बाद से मैं वही नहीं रह गया, जो गुरु मिलने से पहले था | दीक्षित होने के बाद से स्थिति बिलकुल बदल गयी और मेरा रूपांतरण हो गया | गुरु ने मुझे कभी भी कुछ सिखाने, रटाने का प्रयास नहीं किया, बल्कि हम आपसे में झगड़ते ही रहे | फिर भी मेरा रूपांतरण हो गया |

तो गुरु कैसा होगा, यह चुनना आपके हाथो में होता है, फिर भी यह आवश्यक नहीं होता कि आपके द्वारा चुना गया सही ही हो और वह आपको रूपान्तरित कर पाए | रुपंतातरित करने वाला गुरु आपको आकस्मिक ही मिलता है | गुरु और शिक्षक या ट्यूटर में अंतर होता है | गुरु आपको स्वयं से मिलाता है, स्वयं की पहचान करवाता है, जो आपके भीतर छुपा है, उसे बाहर निकालने में सहायता करता है | गुरु चोट करता है आपके स्वाभिमान पर, आपके आत्मसम्मान पर ताकि स्वाभिमान व आत्मसम्मान की खोखली परत उतर जाए और वास्तविक, मौलिक स्वाभिमान व आत्मसम्मान से आपका परिचय हो जाए |

किसी भी व्यक्ति के प्रथम गुरु उसके माता-पिता या अभिभावक ही होते हैं | लेकिन वे भी आपको वही शिक्षा दे पाते हैं, जो उन्होंने सीखा दूसरों से | गुरु आपको कुछ नहीं सिखाता, बल्कि आपके भीतर ही जो योग्यताएं छुपी हुईं हैं, उन्हें ही उभारने का माध्यम बनता है | एक गुरु अपने दस शिष्यों के साथ एक समान व्यव्हार नहीं करेगा, जबकि शिक्षक या ट्यूटर सभी के साथ एक समान ही व्यव्हार करेगा | शिक्षक आधे घंटे की क्लास लेगा और सभी को अपनी बात समझाएगा | जबकि शिष्यों के लिए गुरु का अनुभव बिलकुल अलग अलग होगा | किसी शिष्य को गुरु बहुत दयालु व परोपकारी दिखेगा, तो किसी को धूर्त मक्कार | किसी को गुरु प्रेम से भरा हुआ दिखेगा, तो किसी को क्रोधी, घमण्डी | लेकिन एक दिन ऐसा आता है, कि शिष्यों में रूपांतरण होना शुरू हो जाता है | गुरु के प्रति चाहे उसके जो भी भाव रहे, लेकिन वह स्वयं बदलना शुरू हो जाता है |

और यह रूपांतरण ही गुरु संबोधन को महत्वपूर्ण बना देता है |

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