ये कैसा घटिया समाज है ?

“आप जानते हैं कि मैंने फेसबुक बंद कर दिया है । ट्वीटर पर लिखना बंद कर दिया है ।
मेरे कई दर्शकों ने सलाह दी कि आनलाइन गुंडागर्दी को दिल पर मत लीजिये । यह सब चलता रहता है । यह आपके सेलिब्रेटी होने की क़ीमत है । मैं सेलिब्रिटी नहीं हूँ और हूँ भी तो यह कब तय हो गया कि मुझे अनाप शनाप गाली खाली खानी पड़ेगी । मेरे परिवार और बच्चों तक को गाली दी जाएगी । मुझे क्यों गालियाँ और अनाप-शनाप आरोप बर्दाश्त करने चाहिए ? जब मैं कमज़ोर लोगों की तकलीफ़ बर्दाश्त नहीं कर सकता, तो अपने साथ हो रही इस नाइंसाफी को क्यों बर्दाश्त करूँ । मुझे लगता है कि इस आनलाइन गुंडाराज के ख़िलाफ़ मुझे भी बोलना चाहिए और आपको भी । पूरी दुनिया में ऑनलाइन बुली यानी गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ हो रहा है, भारत में क्यों चुप्पी है ?”  
मेरा सवाल आपसे हैं, आपसे पूछ रहा हूँरविश कुमार

रवीश्‍ा कुमार की इन पंक्तियों को पढकर सकते में हूं। उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग कस्‍बा पर लिखा है – ”ये कैसा घटिया समाज है जो मुझे अकेला छोड़ इस गुंडागर्दी को सह रहा है।”

इस विषय में गुगल करने पर मालूम चलता है कि दक्षिणपंथ के हिंसक गुटों से जुडे लोग रवीश कुमार के नाम पर तरह-तरह की अफवाहें फैला रहे हैं। उन्‍हें धमकियां दी जा रही हैं। इन कारणों से उन्‍होंने अपना टिवीटर एकाऊंट तो पहले ही बंद कर दिया था। अब उन्‍हें अपना फेसबुक एकाऊंट भी बंद कर करना पडा है। उनके इन बॉक्‍स में उन्‍हें और उनके परिवार के लिए गालियां और धमकियों के मैसेज आ रहे थे। अब उनके नाम पर फर्जी पेज बनाये जा रहे हैं।

READ  मेरी अपनी पहचान ही क्या है ?

कुछ महीने पहले तमिल लेखक पेरूमल मुरूगन ने ऐसी ही धमकियों के बाद कहा था कि मैं एक लेखक के रूप में मर चुका। उसके बाद उन्‍होंने लिखना बंद कर दिया था। कभी-कभी सोचता हूं कि अगर कभी मैं ऐसी स्थिति में आ जाऊं तो क्‍या करूंगा। मुझे लगता है कि कोई मुझे मेरे विचारों के लिए, मेरे लिखने के लिए गोली मार दे तो ज्‍यादा अच्‍छा है। हां, यह चुप करा देने से ज्यादा अच्‍छा है। अकेला छोड दिये जाने से ज्यादा अच्‍छा है। एक लेखक, एक पत्रकार के लिए अकेला छोड दिये जाने से अधिक पीडादायक कुछ नहीं हो सकता।

रवीश आज यह पीडा झेल रहे हैं। मित्रों, हम शायद और कुछ न कर सकें लेकिन उन्‍हें अहसास तो करवा ही सकते हैं कि वे अकेले नहीं हैं। आज मुखर नहीं हुए तो एक-एक कर हम सब चुप करवा दिये जाएंगे।

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध। -Pramod Ranjan  
कभी कभी मेरा मन उन महान आत्माओं के प्रति श्रृद्धा से भर जाता है जिन्होंने माँ काली जैसी देवी की कल्पना की और रक्तबीज नाम के असुर की कहानी हमें पढ़ने को मिली |

युग कोई भी रहा हो, असुर और राक्षस हमेशा रहे और रहेंगे ही | देत्यों दानवों कि कहानियाँ भी केवल कहानियाँ नहीं है समाज की सच्चाई ही है | हम आज भी असुरों को देखते हैं, हम आज भी रक्तबीजों से संघर्ष करते हैं…बस अब ये लोग किस्से कहानियों वाले रक्तबीज नहीं हैं कि दूर से ही पहचान में आ जाएँ… ये लोग हमारे आसपास ही होते हैं, फ्रेंडरिक्वेस्ट भेजते हैं, मैसेज करते हैं…..

READ  जिन्हें आलोचना ही करना है, निंदा करना है, उन्हें रोकना भी संभव नहीं हुआ है, वे बड़े आविष्कारक होते हैं और सदा ही नए मार्ग निकाल लेते हैं।

रविश ने अपना ट्विटर अकाउंट बंद कर दिया, रक्तबीजों से त्रस्त होकर, और भी न जाने कितने जागरूक लोग रहे होंगे जिनकी आवाज ही बंद करवा दी रक्तबीजों ने….. लेकिन समाज खामोश रहा | क्योंकि समाज को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई अकेला रक्तबीजों का सामना कर रहा है… उसे तो यह देखना होता है कि वह जीत रहा है या नहीं | जीत गया या मारा गया तो माला डाल देंगे, मूर्ती बनवा देंगे या फिर भगवान् बनाकर एक और नया दड़बा या दूकान खोल लेंगे | लेकिन जब वह लड़ रहा होता है, तब लोग तमाशा देख रहे होते हैं |

मुझे भी आये दिन इन रक्तबीजों द्वारा कुछ न कुछ कहा ही जाता रहता है | लेकिन मैं जानता हूँ कि इनसे निबटना तो अकेला ही पड़ेगा और जीते जी मैदान छोड़ देना कायरता ही होगी | यदि समाज को आइना दिखाना है तो पत्थरों की बारिश के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा | लेकिन यदि जागरूक लोग ही मैदान छोड़ने लगें तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम ही कमजोर निकले | और ये रक्तबीज चाहते ही यही हैं |

लेकिन इस प्रकार हार मान लेना वह भी इन मूर्खों के सामने, वह तो कुछ जँचा नहीं | क्या सोचकर गरीबों और पीड़ितों के हितैषी बने थे, क्या दुनिया साथ देगी ? या फिर ये सड़क छाप मवाली और गुंडे आपकी आरती उतारेंगे ? अगर पीड़ितों के हितों के लिए काम करना इतना ही सम्मानीय होता तो हर नेता यही कर रहा होता | लेकिन नेता जानते हैं इस काम में उनको मिलना कुछ नहीं, उलटे अपमानित ही होना पड़ता है | और ऊपर से समाज खड़ा होकर तमाशा देखता रहता है | वोट भी वह उसी को देता है जिसके खाते में कई संगीन अपराधों के मामले दर्ज हों या फिर नंबर एक का घोटालेबाज हो | सीधे सादे, समाजसेवकों को तो भूखों मरने की नौबत आ जाती है |

READ  आंखों के किनारे से झरते आंसू वह चाह कर भी रोक नहीं पा रहा था...

इसलिए या तो यह काम कोई करे ही नहीं या फिर करे तो जूते खाने को तैयार रहे | यदि जागरूक व मानवतावादियों को रक्तबीजों से मुक्त रहकर सोशल मीडिया या ब्लॉग पर जमे रहना है, तो इनको ब्लॉक करने की आदत डाल लें | ये लोग न समाज का भला कर सकते हैं और न ही अपना, लेकिन दूसरों को भी कुछ नहीं करने देने की कसम खा रखी है | ये लोग तो पूरी सेना के साथ आते हैं और निपटना हमें अकेले ही पड़ता है | इसलिए ब्लॉक करना ही एकमात्र उपाए है ताकि जो सही मार्ग पर हैं या मानते है कि भटके हुए हैं, वे तो कम से कम पढ़ सकें, चिन्तन-मनन कर सकें |~विशुद्ध चैतन्य

यदि समाज को आइना दिखाना है तो पत्थरों की बारिश के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of