यदि ऑक्सिजन की खोज में मछलियाँ हिमालय में जाकर तप करने लगें…

मैं जब भी साधू सन्यासियों को देखता हूँ तब मेरे भीतर कोई श्रृद्धा का भाव नहीं उत्पन्न होता | क्योंकि यह एक ऐसा समाज है जो भ्रम में है कि वे ईश्वर की खोज में हैं और एक दिन उसे पा लेंगे | बिलकुल वैसे ही जैसे मछलियों का कोई समूह सागर में जल खोज रहा हो या ऑक्सीजन खोज रहा हो |

शायद आपको पता हो कि पानी में ऑक्सिजन होता है और मछलियाँ जब पानी में तैर रही होती हैं तब पानी उनके ग्रिल में से निकलता जाता है और ग्रिल पानी में से ऑक्सिजन सोख लेती हैं | इस प्रकार मछलियाँ पानी में आसानी से जीवित रह लेती हैं | अब यदि ऑक्सिजन की खोज में मछलियाँ हिमालय में जाकर तप करने लगें तो क्या वे ऑक्सिजन खोज पाएंगी ?

इसी प्रकार साधू-सन्यासियों को भी देखता हूँ भटकते हुए ईश्वर की खोज में | लेकिन क्या वास्तव में वे ईश्वर की खोज में हैं ?

शायद नही | ईश्वर से तो तो उनको कुछ लेना देना कभी रहा ही नहीं | फिर उन साधू सन्यासियों से तो और भी परेशानी होती है मुझे जो कर्मकांडी हैं और ध्यान आदि से अनभिज्ञ | मस्तिष्क के दोनों भागों को संतुलन देने व समान रूप से सक्रिय रखने के लिए ध्यान सर्वोत्तम विधि है | लेकिन अपने अराध्य को भोग लगाते, नहलाते धुलाते, नए नये कपड़े पहनाते, ठण्ड में कम्बल ओढ़ाते और गर्मियों में पंखा झलते साधू संन्यासी मुझे उस छोटे से बच्चे जैसे लगते हैं जो गुड्डे गुड़िया से खेलते हैं |

बच्चे तो फिर भी एक दिन समझदार हो जाते हैं, लेकिन ये साधू-संन्यासी कब समझदार होंगे ? ~विशुद्ध चैतन्य

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