दुर्दशा मृत्योपरांत एक विश्वप्रसिद्द संत के देह की

worse plight

जैन मुनि तरुण सागर के अंतिम यात्रा की तस्वीरें देखकर और अंतिम संस्कार के कर्मकांडों पर लगी करोड़ों की बोली पढ़कर मैं हतप्रभ रह गया | जैन समाज समान्यतः सबसे अधिक शिक्षित, सभ्य व समृद्ध समाज माना जाता है सभी सम्प्रदायों में | लेकिन जैन समाज ने जो कुछ भी किया, वह न केवल आश्चर्य चकित कर देने वाला है, बल्कि जैन समाज को कलंकित करने वाला भी है | क्योंकि किसी भी सम्मानित व्यक्ति के शव का ऐसा तिरस्कार किसी भी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय या समाज में स्वीकार्य नहीं है | क्रूर माने जाने वाले समाज में भी किसी सम्मानित व्यक्ति के शव के साथ ऐसा व्यव्हार नहीं किया जा जाता, जैसा जैन मुनि तरुण सागर के मृत देह के साथ किया गया | शास्त्रों में तो यह भी कहा गया है कि शत्रु के शव के साथ भी दुर्व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए |

तो फिर शिक्षित जैन समाज इतना असभ्य व क्रूर कैसे हो गया हो गया ?

जैन तो अहिंसा, सात्विकता व सदाचार के परम समर्थक व प्रचारक हैं | वे तो लहसुन, प्याज तक नहीं खाते ताकि चित्त शांत रहे, काम, क्रोध वश में रहे, तो फिर मुनि तरुण सागर के मृत देह की ऐसी दुर्दशा क्यों और कैसे हो गयी ?

फिर यह भी प्रश्न उठता है कि क्या साधू-संतों के अंतिम संस्कार की नीलामी क्या किसी संत के त्याग व सात्विकता का अपमान नहीं है ?
मैं कुछ लिखूं आगे, उससे पहले मुनि श्री तरुण सागर जी महाराज से सम्बंधित कुछ ख़बरें पढ़ लीजिये फिर आगे बढ़ते हैं:

मुनि श्री तरूण सागर जी महाराज ने ली देवलोक समाधि

प्रसिद्ध जैन मुनि तरुण सागर महाराज का आज सुबह (शनिवार ०१/०९/२०१८) दिल्ली में निधन हो गया। वह 51 वर्ष के थे। उनकी हालत कई दिनों से गंभीर बनी हुई थी। उन्हें 20 दिन पहले पीलिया की शिकायत के चलते मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मैक्स अस्पताल की ओर से कहा गया था कि उनकी सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा है। कहा जा रहा है कि जैन मुनि ने इलाज कराने से इन्कार कर दिया था और कृष्णा नगर (दिल्ली) स्थित राधापुरी जैन मंदिर चातुर्मास स्थल पर जाने का निर्णय लिया था। जानकारी के मुताबिक, जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज का निधन शनिवार सुबह तीन बजे हुआ। कृष्णा नगर के राधे पूरी में उऩ्होंने अंतिन सांस ली। निधन के बाद जैन मुनि के शव को राधे पुरी से मोदीनगर (यूपी) ले जाया गया। यहां पर तरुण सागर जी नाम से एक आश्रम है, जहां उनका अंतिम संस्कार होगा। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे पर शव यात्रा निकल रही है, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हैं।

बताया जा रहा है कि मुनिश्री अपने गुरु पुष्पदंत सागर महाराज की स्वीकृति के बाद संलेखना (आहार-जल न लेना) कर रहे थे। वे जिस कमरे में ठहरे थे, वहां पर सिर्फ जैन मुनियों और शिष्यों को ही जाने की इजाजत थी।

क्या है संलेखना ?: जैन धर्म के मुताबिक, मृत्यु को समीप देखकर धीरे-धीरे खानपान त्याग देने को संथारा या संलेखना (मृत्यु तक उपवास) कहा जाता है। इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है। राजस्थान हाईकोर्ट ने 2015 में इसे आत्महत्या जैसा बताते हुए उसे भारतीय दंड संहिता 306 और 309 के तहत दंडनीय बताया था। दिगंबर जैन परिषद ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। दिल्ली स्थित लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के प्रोफेसर वीर सागर जैन ने बताया कि संथारा की प्रक्रिया 12 साल तक भी चल सकती है। यह जैन समाज की आस्था का विषय है, जिसे मोक्ष पाने का रास्ता माना जाता है।

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राष्ट्र संत तरुण सागर का दाह संस्कार

Funeral of Jain muni shri tarun sagar

जैन मुनि श्री तरुण सागर जी का अंतिम संस्कार सम्पन

क्रांतिकारी राष्ट्र संत मुनिश्री तरुण सागर महाराज की अंतिम क्रिया के लिए लाखों रुपये की बोली लगी। इसके बाद उनका दाहसंस्कार किया गया।  शांति धारा की बोली सबसे पहले लगी। पुष्प वर्षा, कलश, पंचामृत, मुखग्नि देने तक की बोली लगी। गुजरात, हरियाणा, यूपी, दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि प्रदेशों से लोग अंतिम यात्रा में शामिल हुए। आपको बता दें कि तरुण सागर का मुरादनगर में अंतिम संस्कार किया गया।

अग्नि संस्कार देने की बोली: 1 करोड 94 लाख
सिक्के उछाल की बोली सोना, चांदी: 21 लाख रुपये 
गुलाल उछाल की बोली: 41 लाख रुपये 
मुहपति की बोली: 21 लाख 94 हजार 194 रुपये 
बायां कंधा लगाने की बोली: 32 लाख रुपये 
दायां कंधा लगाने की बोली: 21 लाख 21 हजार 111 रुपये

मुनि तरुण सागर मेरी नजर में

कोई भी संत या फ़कीर अपनी मौलिकता  के कारण जाना, पहचाना जाता है और सम्मानित या अपमानित होता है समाज में | कई समाजों से मिलकर एक देश बनता है और हर समाज की अपनी अपनी धारणाएं, मान्यताएँ व परम्पराएँ होतीं है | एक संत या फ़कीर जब समाज के बन्धनों से स्वयं को मुक्त करके ऊपर उठता है, तब वह सही मायनों में संत बन पाता है | लेकिन मुनि तरुण सागर के विषय में ऐसा नहीं माना जा सकता कि वे धार्मिक ढोंग पाखण्ड से मुक्त हो पाए थे | वे शंकराचार्य या पंडित-पुरोहित की तरह ही अपने समाजिक मान्यताओं व परम्पराओं में कैद ही रहे आजीवन | उन्होंने अपने समाज की कुरीतियों को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि उन्हीं कुरीतियों को ढोते रहे आजीवन | वे चाहे अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते हों, चाहे अपने कडुए वचनों के लिए जाने जाते हों, लेकिन अपने ही समाज में फैली कुरीतियों के विरुद्ध वे कुछ भी कहने का साहस नहीं कर पाए |

उनका स्वास्थ्य खराब था, बुखार व पीलिया हो रखा था, लेकिन उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध Max अस्पताल में भर्ती करवाया गया | लेकिन उन्होंने किसी भी तरह की चिकित्सीय सेवा लेने से इनकार कर दिया था ऐसा बताया गया | स्थिति और गंभीर हुई तो उन्होंने इलाज करवाने की बजाये आत्महत्या यानि संलेखना को चुना | मेरे लिए यह बहुत ही आश्चर्य की बात थी कि इतना विद्वान व्यक्ति ऐसी रुढिवादिता को ढो रहा है | वह व्यक्ति जो चश्मा तो लगाता है, लेकिन निर्वस्त्र रहता है, इलाज करवाने से इनकार कर देता है मेरी नजर में वह सुलझा हुआ नहीं हो सकता |

आप कह सकते हैं कि संलेखना जैन समाज की परम्परा है, या जैन समाज की उस आस्था का विषय है | लेकिन मैं इसे आत्महत्या ही मानता हूँ और संलेखना को उसी श्रेणी में रखता हूँ, जिस श्रेणी में राजाराम मोहन राय सतीप्रथा को रखते थे | यदि आत्महत्या से ही मोक्ष प्राप्त होता, तो जितने भी लोगों ने आज तक आत्महत्या की है, उन सभी को मोक्ष प्राप्त हो चुका होगा | आजकल तो नौ दस वर्ष के बच्चे भी जरा जरा सी बात पर आत्महत्या कर ले रहे हैं…क्या उन सभी को मोक्ष प्राप्त हो जाएगा ?

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आप लोग संलेखना की विधि को कितना ही महिमामंडित करें, कितना ही पवित्र व ईश्वरीय बताएं, मैं उसे आत्महत्या ही मानूंगा | किसी ज़माने में सती-प्रथा को भी बहुत ही महिमामंडित किया जाता था, सारा समाज ढोल ताशे बजाते हुए श्मशान घात में इकट्ठे होते थे, मृतक की पत्नी को जिंदा ही पति की चिता में बैठाकर चिता में आग लगा दी जाती थी | लोग सती माता की जयकारा लगाते थे…..अमानवीय होते हुए भी हिन्दू समाज इसे बड़े श्रृद्धा से ढो रहा था | यदि राजा राममोहन राय ने कठोरता से पहल न की होती और अंग्रेज प्रशासन ने सहयोग न किया होता, तो आज भी यह प्रथा ढोई जा रही होती | क्योंकि किसी भी साधू-संत में इतना साहस नहीं था कि वह समाज की इस कुरीति का विरोध कर पाए | वही स्थिति मुनि तरुण सागर की थी वे भी संलेखना नामक कुप्रथा का विरोध नहीं कर पाए |

एक संन्यासी होने का अर्थ ही है मुक्ति के पथ पर कदम रखना और जब कोई मुक्ति या मोक्ष के पथ पर कदम रखता है, तब उसे कई तरह के विरोधों, अवरोधों, तिरस्कारों, मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है | समाज ऐसे व्यक्ति या संन्यासियों को स्वीकार नहीं कर पाता, जो समाज द्वारा ढोई जा रही मान्यताओं व परम्पराओं के विरुद्ध हो | भले वह परम्परा ढोंग हो, पाखण्ड हो, दिखावा हो, या फिर अमानवीय ही क्यों न हो |

त्याग, आध्यात्म,श्रृद्धा व भक्ति का व्यवसायीकरण

जैन समाज वास्तव में व्यापारियों का ही समाज बनकर रह गया | हर चीज का व्यवसायीकरण कर दिया गया, यहाँ तक की अंत्येष्टि तक की नीलामी की जाती है | यह कोई सम्मानित प्रथा नहीं मानी जा सकती | और व्यावसायिक मानसिकता का समाज मानवीयता को महत्व नहीं देता, उसे तो हर भावना, हर श्रृद्धा, हर विश्वास, हर रिश्ते को करेंसी में कनवर्ट करवाने में रूचि होती है | यहाँ तक कि ऐसे संत जिसने आजीवन सांसारिक सुख सुविधाओं से दूरी बना रखी, निर्वस्त्र रहे, उन्हीं की अंत्येष्टि की बोली लगा दी ? केवल उस धन के लिए, जिसे त्यागकर घूम रहे थे वह संत जिसकी अंत्येष्टि की बोली लगी ?

जैन संतो को कई वर्षों की साधना के बाद ही दिगंबर दीक्षा दी जाती है! उसके बाद वे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं 24 घंटे में एक बार अन्न जल लेते हैं उसके बाद एक बूंद भी पानी और दवा तक नहीं लेते !कहीं भी जाना हो पैदल चलते हैं गर्मी सर्दी सभी मौसम में दिगंबर ही रहते हैं
जब जैन मुनि यह जान लेते हैं कि उनका शरीर अब उनका साथ नहीं देगा और मृत्यु निकट है तो वह सल्लेखना धारण कर अन्न जल त्याग देते हैं !देह त्यागने के बाद भी इनके ऊपर कोई कपड़ा या चादर नहीं डाला जाता और समाधि स्थान पर ही उनका अंतिम संस्कार किया जाता है !

क्या केवल इसलिए किसी बालक या किशोर को इतने कठोर जीवन शैली अपनाने के लिए विवश किया जाता है, ताकि बाद में उनके अंत्येष्टि की नीलामी कर करोड़ों रूपये अर्जित किये जा सकें ?

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इससे बड़ा ढोंग और पाखंड क्या हो सकता है किसी भी समाज के लिए ?

ऐसी प्रथा से तो अच्छी प्रथा कसाइयों की है, जो बलि से पहले अच्छी तरह से खिलाते पिलाते हैं न कि उन्हें भूखा मारते हैं |

और यदि धन इतना ही महत्वपूर्ण है कि अंत्येष्टि की भी नीलामी करके प्राप्त करना आवश्यक है, तो फिर और भी कई माध्यम हैं धन कमाने के लिए | किसी व्यक्ति को निर्वस्त्र, कठोर जीवन शैली अपनाने के लिए विवश करके, उनपर अत्याचार करके धर्म व त्याग के नाम पर धन अर्जित करने का माध्यम क्यों बनाया जा रहा है ? क्यों किसी व्यक्ति को आजीवन सभी सांसारिक सुख सुविधाओं से वंचित रखा है जाता है ? क्या प्रत्येक व्यक्ति को सांसारिक सुख सुविधाओं का लाभ उठाने का अधिकार ईश्वर प्रदत्त नहीं है ? केवल कुछ लोग सांसारिक सुख सुविधाओं का लाभ उठाने से वंचित केवल इसलिए रह जाएँ, ताकि बाद में उनके जिस्म का तमाशा बनाया जा सके, उनकी अंत्येष्टि पर करोड़ों रूपये वसूले जा सकें, क्या यह धर्म, न्याय व ईश्वरीय विधान सम्मत है ?

और एक संत की अंतिम यात्रा इतने अपमान जनक रूप से कोई पढ़ा-लिखा समृद्ध समाज कर सकता है, मैं तो क्या कोई कल्पना भी नहीं कर सकता | मैंने तो अफ्रीकी जनजातियों को भी मृतकों के शरीर के साथ शालीनता का व्यव्हार करते देखा है, मैंने तो अंडमान निकोबार के आदिवासियों को भी मृतक के शरीर के साथ शालीनता का व्यव्हार करते देखा है | क्या जैन समाज उनसे भी अधिक असभ्य व अशिष्ट हो गया ?

और इतना तिरस्कार वह भी सम्मान करने के नाम पर और बाद में बोली लगाकर धन संग्रह करना घोर निंदनीय है | भले ही आपके समाज में ऐसा करना बड़ा पवित्र धार्मिक कार्य माना जाता हो, लेकिन मैं ऐसी प्रथा को असभ्य व अमानवीय ही कहूँगा |

अंत में कहना चाहता हूँ कि साधू-संन्यासियों का दायित्व होता है समाज में फैली कुरीतियों, पाखंड व ढोंग से समाज को मुक्ति दिलाये | इसलिए पहले वह स्वयं को मुक्त करता है, फिर समाज को मुक्त करने निकलता है | धन के पीछे भाग रहे जैन समाज के साधू संत, समाज को कैसे सद्मार्ग दिखा सकते हैं ? सही मार्ग तो यह है कि धन जीवन के लिय आवश्यक है यह समझाएं समाज को और स्वयं भी त्याग और बैराग के नाम पर स्वयं के शरीर व मन को कष्ट देने की बजाय, सभी सांसारिक सुख सुविधाओं का उपभोग करें |

जैन समाज को चाहिए कि संलेखना प्रथा, शव को अप्राकृतिक रूप से रस्सियों से बाँधकर, बैठाकर अंतिमयात्रा निकालने की प्रथा और अंत्येष्टि आदि की नीलामी की प्रथा पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध लगाए |

~विशुद्ध चैतन्य

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