जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है

ओशो ने या कहानी सुनाई थी जो इतनी गहरी बात कहती है कि वह उसे जो आत्मसात कर ले, उसका यह जीवन ही सफल हो जाये | पहले आप कहानी पढ़िए फिर मैं इसे अपनी अनपढ़ बुद्धि से समझाऊंगा |

बुद्ध के जीवन की बड़ी मीठी कथा है। जब उनका जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने कहा कि यह व्यक्ति या तो सम्राट होगा या संन्यासी होगा। सब लक्षण सम्राट के थे। फिर बुद्ध तो भिक्षु हो गए, संन्यासी हो गए। और सम्राट साधारण नहीं, चक्रवर्ती सम्राट होगा, सारी पृथ्वी का सम्राट होगा।

बुद्ध एक नदी के पास से गुजर रहे हैं, निरंजना नदी के पास से गुजर रहे हैं। रेत पर उनके चिह्न बन गए, गीली रेत है, तट पर उनके पैर के चिह्न बन गए। एक ज्योतिषी काशी से लौट रहा था। अभी-अभी ज्योतिष पढ़ा है। यह सुंदर पैर रेत पर देख कर उसने गौर से नजर डाली। पैर से जो चिह्न बन गया है नीचे, वह खबर देता है कि चक्रवर्ती सम्राट का पैर है। ज्योतिषी बहुत चिंतित हो गया। चक्रवर्ती सम्राट का अगर यह पैर हो, तो यह साधारण सी नदी के रेत पर चक्रवर्ती चलने क्यों आया? और वह भी नंगे पैर चलेगा कि उसके पैर का चिह्न रेत पर बन जाए! बड़ी मुश्किल में पड़ गया। सारा ज्योतिष पहले ही कदम पर व्यर्थ होता मालूम पड़ा। अभी-अभी लौटा था निष्णात होकर ज्योतिष में। अपनी पोथी, अपना शास्त्र साथ लिए हुए था। सोचा, इसको नदी में डुबा कर अपने घर लौट जाऊं, क्योंकि अगर इस पैर का आदमी इस रेत पर भरी दुपहरी में चल रहा है नंगे पैर–और इतने स्पष्ट लक्षण तो कभी युगों में किसी आदमी के पैर में होते हैं कि वह चक्रवर्ती सम्राट हो–तो सब हो गया व्यर्थ। अब किसी को ज्योतिष के आधार पर कुछ कहना उचित नहीं है।

लेकिन इसके पहले कि वह अपने शास्त्र फेंके, उसने सोचा, जरा देख भी तो लूं, चल कर इन पैरों के सहारे, वह आदमी कहां है। उसकी शक्ल भी तो देख लूं। यह चक्रवर्ती है कौन, जो पैदल चल रहा है! तो उन पैरों के सहारे वह गया। एक वृक्ष की छाया में बुद्ध विश्राम कर रहे थे। और भी मुश्किल में पड़ गया, क्योंकि चेहरा भी चक्रवर्ती का था, माथे पर निशान भी चक्रवर्ती के थे। बुद्ध की आंखें बंद थीं, उनके दोनों हाथ उनकी पालथी में रखे थे; हाथ पर नजर डाली, हाथ भी चक्रवर्ती का था। यह देह, यह सब ढंग चक्रवर्तियों का, और आदमी भिखारी था, भिक्षा का पात्र रखे, वृक्ष के नीचे बैठा था, भरी दुपहरी में अकेला था।

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हिला कर बुद्ध को उसने कहा कि महानुभाव, मेरी वर्षों की मेहनत व्यर्थ किए दे रहे हैं, सब शास्त्र नदी में फेंक दूं, या क्या करूं? मैं काशी से वर्षों से मेहनत करके, ज्योतिष को सीख करके लौट रहा हूं। और तुममें जैसे पूरे लक्षण प्रगट हुए हैं, ऐसे सिर्फ उदाहरण मिलते हैं ज्योतिष के शास्त्रों में। आदमी तो कभी-कभी हजारों-लाखों साल में ऐसा मिलता है। और पहले ही कदम पर तुमने मुझे मुश्किल में डाल दिया। तुम्हें होना चाहिए चक्रवर्ती सम्राट और तुम यह भिक्षापात्र रखे इस वृक्ष के नीचे क्या कर रहे हो?

तो बुद्ध ने कहा कि शास्त्रों को फेंकने की जरूरत नहीं है, तुझे ऐसा आदमी दुबारा जीवन में नहीं मिलेगा। जल्दी मत कर, तुझे जो लोग मिलेंगे, उन पर तेरा ज्योतिष काम करेगा। तू संयोग से, दुर्घटनावश ऐसे आदमी से मिल गया है, जो भाग्य की सीमा के बाहर हो गया है। लक्षण बिलकुल ठीक कहते हैं। जब मैं पैदा हुआ था, तब यही होने की संभावना थी। अगर मैं बंधा हुआ चलता प्रकृति के नियम से तो यही हो जाता। तू चिंता में मत पड़, तुझे बहुत बुद्ध-पुरुष नहीं मिलेंगे जो तेरे नियमों को तोड़ दें। और जो अबुद्ध है, वह नियम के भीतर है। और जो अजाग्रत है, वह प्रकृति के बने हुए नियम के भीतर है। जो जाग्रत है, वह नियम के बाहर है। -ओशो (समाधी के सप्त द्वार)

“अगर में बंधा हुआ चलता प्रकृति के नियम से तो यही हो जाता |”

यह वाक्य को कोई साधारण वाक्य नहीं है और कोई साधारण व्यक्ति यह कह भी नहीं सकता कभी | मेरे अपने जीवन में जीवन के अनुभव ही ऐसे रहे कि इस वाक्य को समझना मेरे लिए आसान हो गया | मेरे परिवार में ज्योतिष पर सभी को बहुत विश्वास था इसलिए आये दिन कोई न कोई ज्योतिषाचार्य से भेंट होती ही रहती थी | मेरे विषय में जितनी भी भविष्यवानियाँ हुईं वे सभी लगभग गलत सिद्ध हुईं, लेकिन मैंने देखा कि दूसरों के विषय में वे ही ज्योतिषी जो भविष्यवाणियाँ करते थे, वे लगभग सही होती थी | यह विषय मेरे लिए हमेशा रहस्य बना रहा | इसलिए मैंने खुद ज्योतिष सीखा और खुद के विषय में जानना चाहा, खुद की ही भविष्यवाणी करने की कोशिश की लेकिन व्यर्थ हो गया | जबकि दूसरों के लिए की तो वे सही निकले |

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तो उपरोक्त वाक्य उनके लिए है जो सहजता से जी रहे हैं | जो कुछ खोज नहीं रहे, जो कुछ नया नहीं करने जा रहे, बस रूटीन लाइफ जीना पसंद करते हैं, बने हुए ट्रेक पर चलना पसंद करते हैं | ऐसे लोगों के लिए तो भविष्यवाणी सही हो सकती है, लेकिन जो बचपन से ही कुछ नये की खोज में हों, जो परम्परा को न मानते हों, उनके लिए भविष्यवाणी सही नहीं बैठती क्योंकि ज्योतिष की पुस्तकें ठहरी हुईं है लेकिन सभी मनुष्य ठहरे हुए नहीं है | सभी एक ही भेड़चाल में चलने के लिए नहीं आते |

पशु को हम कह सकते हैं कि वे प्रकृति के साथ जीते हैं और सनातन धर्म का पालन करते हुए जीते हैं | उनका उठाना बैठना सोना जागना… सब निश्चित है | यहाँ तक कि उनकी मृत्यु भी लगभग समान ही होती है यदि कोई दुर्घटना न घटे | लेकिन सभी मानवों के साथ ऐसा नहीं होता | सभी भेड़ों कि तरह नहीं जी सकते और न ही सभी का चिंतन ही एक समान होगा | तो जो प्रकृति के नियमों से बंधा हुआ है उसके लिय भविष्यवाणी करना सुगम हो जाता है और फलित भी होगा | लेकिन जो प्रकृति के नियमों से न बंधा हो उसकी भविष्यवाणी करना कठिन हो जाता है | हाँ कुछ अनुभवी ज्योतिषी या जिन्होंने ध्यान साधना आदि पर काफी मेहनत की हो, उनके लिए ऐसे लोगों की भविष्यवाणी करना कठिन भी नहीं है | तब वे लोग पुस्तक से ऊपर उठ जाते हैं और अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा सही भविष्यवाणी कर पाते है |

यहाँ अबुद्ध से तात्पर्य वे लोग जो पुस्तकों से बंधे हुए हैं, जो पुस्तकों से बाहर न सोच सकते हैं न देख समझ सकते हैं | जो यह मानते है कि जो किताबों में पूर्वजों ने लिख दिए वही सत्य है और दूसरा कोई सत्य हो नहीं सकता | मैं इस वर्ग में उन धार्मिकों को रखता हूँ जो कर्मकांडों, पूजा पाठों में जीवन व्यतीत कर देते हैं बिना कोई प्रश्न किये और बिना यह समझे कि जो कर रहे हैं, उसका वास्तव में उद्देश्य क्या है | ऐसे लोग कोई रिस्क नहीं लेना चाहते | जो है जैसा है, चलता है चलने दो वाले सिद्धांत पर जीते हैं | वही जागृत लोगों में वे लोग आते हैं जो हर घटना का गहनता से विश्लेषण करते हैं और स्वविवेक का प्रयोग करते हैं | मैं उन्हें जाग्रत नहीं कहता जो नास्तिक है.. .क्योंकि वे भी आस्तिकों के विरोध में ही नास्तिक है इसलिए दोनों में कोई भेद नहीं है | नास्तिक अपने मस्तिष्क के दायें भाग का प्रयोग करने में असमर्थ होते हैं | तो वे भी एक प्रकार से मशीनी जीवन ही जीते हैं | लेकिन जो जाग्रत होंगे वे अलौकिक जगत के अनुभव भी ले पायेंगे और भौतिक जगत का आनंद भी उठा पायेंगे | वे ध्यान भी सहजता से कर पाएंगे तो संगीत नृत्य का भरपूर आन्नद भी उठा पाएंगे |

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सारांश यह कि एक जागृत व्यक्ति समाज व धर्म की कुरीतियों पर प्रश्न भी खड़े करने का साहस रखेगा और अध्यात्मिक ज्ञान व अनुभव भी रखेगा | वह मूर्ती पूजकों की निंदा नहीं कर पायेगा और न ही किसी और मत या मान्यताओं की | क्योंकि वह उन कर्मकांडों की सूक्ष्मता को समझता होगा लेकिन वह विरोध करेगा तो कर्मकांडों के नाम पर हो रहे आडम्बरों का, लूट-पाट व शोषण का | व विरोध करेगा तो धर्म के नाम पर हो रहे दिखावों का | वह अन्याय  व अत्याचार का विरोध भी करेगा तो निडरता से करेगा | ऐसे जागृत लोगों की भविष्यवाणी करने के लिए उतने ही ऊँचे स्तर का ज्योतिषी भी होना चाहिए | यहाँ ऊँचे स्तर के ज्योतिषी से मेरा तात्पर्य विश्वप्रसिद्ध या सेलिब्रिटी ज्योतिष से नहीं है | बल्कि उस ज्योतिष से है जो शास्त्रों और पुस्तकों से बाहर हो चुका है और ज्योतिष जिसकी जीविका का साधन नहीं, बल्कि ज्योतिष जिसका जीवन है | जो पैसा कमाने के लिए ज्योतिषी नहीं बना, बल्कि वह पूर्वजन्मों के संस्कारों से ज्योतिषी बना है |

यह भी ध्यान रखें कि जागृत होने का अर्थ उपद्रव करना नहीं है | जाग्रत होने का अर्थ है भेड़चाल से अलग होकर देखने व समझने की क्षमता का विकसित होना | और ऐसे ही लोग एक दिन बुद्धत्व को प्राप्त होते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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विशुद्ध चैतन्य
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यह अच्छी बात है कि स्वयं पर विश्वास हो

damodar singh yadav
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बात समझ में आई, मुझे लगता है कि मैं सही रास्ते पर हूँ।

Unknown
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बात समझ में आई, मुझे लगता है कि मैं सही रास्ते पर हूँ।