आस्था और अश्लीलता

“समझ में नहीं आता आप चाहते क्या हैं ?” “आप हिंद्त्व के विरोधी हैं क्या ?” “क्या आप ओशोभक्त हैं ?” “शायद आप सीआईए के एजेंट हैं !” शायद आप गेरुआ के भेस में कोई पाखंडी हैं जो हिन्दुओं कि बुराई करने के लिए आया है !” “आपने संन्यास लिया है या नौटंकी कर रहे हैं ?” “संन्यासी हैं तो फेसबुक क्यों चला रहे हैं ?” यह सारे डायलोग मुझे आये दिन सुनने मिलता था पहले | इसलिए मैंने अपने फ्रेंडलिस्ट शार्ट करनी शुरू कर दी और नए रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने ही बंद कर दिए | अब बहुत हद तक शान्ति है |

किसी ने कहा मेरे एक पोस्ट पर, “पहले लोग जो करते थे हम भी वही करने लग जाएँ ? पहले लोग माँसाहार करते थे उनकी मजबूरी थी, लेकिन आज तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं है फिर क्यों माँसाहार करते हैं लोग ?”

समझ तो मेरे भी नहीं आया कि आप लोग क्या चाहते हैं ! दोगलेपन से मुक्त क्यों नहीं होना चाहते ? दोहरे चेहरे और दोहरे मापदंड से मुक्त क्यों नहीं होना चाहता समाज ?

दुनिया भर में धर्म के नाम पर मारकाट मचा हुआ है और तर्क दे रहे हैं कि उन्होंने ने धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़ा और पढ़ा भी है तो समझा नहीं…. अरे तो यहाँ क्या कर रहे हो ? जाओ जाकर उनको समझाओ अपना धर्मग्रन्थ ! वे कैसे भटक गये यदि उन्होंने धर्मग्रन्थ पढ़ा है तो ? आप क्यों नहीं भटके ?

आये दिन कोई क़ुरान पढ़ाने चला आता है कोई गीता तो कोई वेद…. अरे मुझे क्यों पढ़ा रहे हो ? उनको पढाओ न जो मानव जाती को ही मिटाने पर तुले हुए हैं ! कभी धर्मग्रन्थ पढ़वाया उन नेताओं और पूंजीपतियों को जो किसानों और आदिवासियों की भूमि हड़प रहे हैं लालच, जोरजबर्दस्ती, पुलिस और प्रशासन से लेकर भूमाफियों का साथ लेकर ? कभी उनको पढ़ाया अपना धर्मग्रन्थ जो लाखों टन अनाज बर्बाद कर देते हैं लेकिन जरूरतमंदों, भूखों, लाचारों में नहीं बाँटते ? कभी पढ़ाया उनको जो सत्ता के लोभ में जाति और धर्म के नाम पर नागरिकों को बाँटते हैं ? कभी पढ़ाया उनको जो झूठे वादे करके सत्ता हथियाते हैं और बेशर्मों की तरह मुँह छुपा कर बैठ जाते हैं पाँच साल तक ? कभी पढ़ाया उनको अपना अंतिम सत्य कहने वाला धर्म ग्रन्थ जो न्याय के मंदिर न्यायालय को व्यावसायिक बाजार और अपराधियों के लिए पनाहगाह बना रखे हैं ? कभी पढ़ाया अपना यह ईश्वरीय धर्म ग्रन्थ जिन्होंने धार्मिक स्थलों को बाजार बना दिया ?

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नहीं न… ? लेकिन मुझे समझाने, धमकाने और पढ़ाने तुरंत चले आते हो !

क्या आपको समझ में आया आपका ही यह ईश्वरीय धर्म ग्रन्थ ?

किसी भी धर्म ग्रन्थ का मूल सार ही समझें तो एक बात सभी ने कही है, अन्याय, शोषण को सहन मत करो और न ही अन्यायी और शोषकों का साथ दो कभी भी | चाहे अपनी जान ही गँवानी पड़े हमेशा सही का ही साथ दो…… क्या पालन करते है अपने ईश्वरीय धर्म ग्रन्थ के इस आदेश का ? क्या जानबूझ कर भी आप लोग अपराधियों को वोट नहीं देते ? क्या जानबूझ कर भी सड़कछाप गुंडों की गुंडागर्दी का विरोध करने के स्थान पर मुँह छुपा कर भाग नहीं जाते ?

और उसपर बेशर्मी से चले आते हैं मुझे धर्मग्रन्थ पढ़ाने ? ये धर्मग्रन्थ न तो पंडितों की समझ में आये, न मौलवियों की समझ में आये, न पादरियों की समझ में आये, न पढ़े-लिखों की समझ में आये, न डिग्रीधारियों की समझ में आये, न्यायपालिका से लेकर सत्ता के श्रेष्ठ पदों पर बैठे महान विभूतियों को ही समझ में नहीं आये…. तो मुझ अनपढ़, गँवार की समझ में कैसे आ जायेंगे ?

अरे पहले खुद तो समझ लो धर्मग्रन्थ फिर आना मुझे समझाने |

खुद को सभ्य कहने वाला समाज क्या वास्तव में सभ्य है ? खुद को धार्मिक कहने वाला समाज क्या वास्तव में धार्मिक है ? खुद को शिक्षित समझने वाला समाज क्या वास्तव में शिक्षित है ? क्या धार्मिक ग्रंथों को रटने मात्र से कोई व्यक्ति अध्यात्म को समझ जाता है ?

जब कोई जैन मुनि या नागा साधू, निर्वस्त्र सड़क पर आ जाता है तो लोग नतमस्तक हो जाते हैं | वहीँ कोई सामान्य व्यक्ति निर्वस्त्र सड़क पर आ जाए तो उसे अश्लीलता, असभ्त्या कहते है | एक तरफ आस्था है और दूसरी तरफ अश्लीलता | एक तरफ श्रृद्धा है भक्ति है वहीँ दूसरी तरफ तिरस्कार है घृणा | वही समाज है वही लोग हैं लेकिन दोहरा चरित्र, दोहरा मापदंड, दोहरी मानसकिता |

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यदि नग्नता असभ्यता है, अश्लीलता है तो फिर धर्म के नाम पर वही चीज सभ्य और पूजनीय कैसे हो गई ? और यदि पुरुष साधू-संत निर्वस्त्र घूम सकते हैं तो स्त्री साधू-संत क्यों नहीं घूम सकतीं ?

क्या यह दोहरी मानसिकता नहीं है ? यदि आप मानते है कि वे लोग अपने काम पर विजय पा चुके हैं इसलिए उनको नंगे रहने का अधिकार है, तो फिर स्त्रियाँ काम पर विजय पा कर नंगी क्यों नहीं रह सकतीं ?

क्या सिद्ध करना चाहते हैं नंगे रहकर ?

विदेशों में लोग अब निर्वस्त्र रहना चाहते हैं और उनकी मांग है कि निर्वस्त्र रहना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है | तो क्या वे लोग असभ्य हो गये ? क्या वे लोग अश्लीलता पर उतर आये ?

एक तरफ आस्था है और एक तरफ अश्लीलता, एक तरफ उच्च वर्ग है जिनकी महिलायें शरीर ढकने को रुढिवादिता और गँवारपन मानती हैं और वहीं दूसरी तरफ है वे गरीब जिनके पास तन ढकने को कपड़े ही नहीं हैं | एक तरह है वे लोग जो ईश्वर का खौफ दिखाते हैं सबको और खुद खुले आम अपराधों व अनैतिक कर्मों में लिप्त हैं, वहीँ दूसरी ओर वे लोग हैं जो गरीबी और भुखमरी से विवश होकर अपराधों व अनैतिक कर्मों में लिप्त हैं या फिर मंदिर मस्जिदों में इस आशा से जा रहे हैं कि शायद ईश्वर उनकी फ़रियाद सुन ले | एक तरफ वे शासक वर्ग हैं जो अपनी कुर्सी और सत्ता के खेल में देश की जनता का ध्यान नहीं रख पाते और दूसरी ओर वे लोग हैं जो भौतिकता की होड़ में असहाय व पीड़ितों के विषय में नहीं सोच पाते | एक तरफ वे लोग हैं जो सारे धार्मिक ग्रंथो को रट कर बैठे हैं लेकिन समझ में कुछ नहीं आया और दूसरी ओर वे लोग हैं जो दो अक्षर भी नहीं पढ़ पाते लेकिन इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल बन जाते हैं |

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तो मुझे मत पढ़ाइये अपना धर्मग्रन्थ | उन्हें पढ़ाइये जिनपर देश की जिम्मेदारी है, जिनपर न्याय की जिम्मेदारी है, जिनपर शिक्षा की जिम्मेदारी है | या फिर प्राचीन किस्से कहानियों की किताबों की दुनिया से बाहर निकलें और वास्तविकता को स्वीकारें | हज़ारों साल पुरानी किताबों को पढ़ाने से बेहतर है विज्ञान व भूगोल की किताबें पढ़ायें | धार्मिक ग्रन्थ महान तब होते जब देश के नेता और धर्मगुरु महान होते | बच्चो को कैसे विश्वास दिलाएंगे कि धार्मिक ग्रंथो को पढ़ने से चरित्र अच्छा होता है जब देश में घोटालेबाजों के गले में हार पहनाकर सम्मानित किया जाता है, जब देश के धर्मगुरु और नेता जाति और धर्म के नाम पर लोगों को बाँट कर राजनीति की अपनी रोटियाँ सेंकते हैं ? कैसे अश्लीलता को परिभाषित करेंगे आप लोग जब विज्ञापनों और फिल्मों में अश्लीलता परोसी जाती है और खुद को सभ्य कहने वाला समाज अपने खून पसीने की कमाई उन फिल्मों पर लुटा देता है, लेकिन किसी बेबस और लाचार की सहायता करने में स्वयं को असमर्थ पाता है ? ~विशुद्ध चैतन्य

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krishan kumar
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बहुत बढ़िया लिखा है

chaturvedi
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बहुत सुन्दर

विशुद्ध चैतन्य
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जी बिलकुल… मैं अपना धर्म निभा रहा हूँ | आप लोगों का प्रोत्साहन मुझे नई उर्जा दे देता है

Raj Jadhav
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बहुत सही सवाल उठाया है… लेकिन लोग "आस्था" पे सवाल नहि उठाना चाहते… ये लोग सोये नहि बल्की सोने का ढोंग रच रहे है…इन्हे ऐसे प्रबोधन से हि उठाया जा सकता है…

विशुद्ध चैतन्य
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शुक्रिया नकवी साहब 🙂

Rushaid Naqvi
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बोहत ही उम्दा किन लफ्जों में तारीफ करूं समझ नहीं आ रहा
दर्द ही दर्द नज़र आ रहा है इंसानियत के लिए
वह