इस प्रकार मैंने जाना कि ऋषि प्रजाति के लुप्त होने के बाद से धर्म प्रकृति के विरुद्ध हो गया

यह लेख जो लिखने जा रहा हूँ, कई लोगों की भावनाएँ आहत करेंगी इसलिए कमजोर भावनाओं वाले इस लेख को न पढ़ें |

पिछले कुछ दिनों से मैं लगातार माँसाहार विरोधी पोस्ट देख रहा हूँ और बड़े ही तर्कपूर्ण तरीके से इसे धर्म, पाप-पुण्य, और मानवता से जोड़कर विद्वानों द्वारा रखा जा रहा है | यह सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है कि माँसाहार से बड़ा अपराध कोई नहीं है और इससे बड़ा दुष्कृत्य व अमानवीय कुछ नहीं है |

मैंने आज विभिन्न विद्वानों के लेख भी पढ़े जो तरह तरह से वैज्ञानिक विश्लेषण व प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं कि माँसाहार मन व तन के लिए कितना हानिकारक है | उन लेखों को पढ़ने के बाद हर माँसाहारी स्वयं को दुनिया का सबसे पतित प्राणी मानने लगेगा क्योंकि लिखने वाले कोई मामूली लोग नहीं हैं, उन्होंने बड़ी बड़ी डिग्रियाँ ले रखीं हैं, कई शास्त्रों और धर्म ग्रंथों के विद्वान् हैं | उनके लेख यदि शेर को भी पढ़ा दें तो वह आत्महत्या कर ले कि उसने माँसाहारी कुल में क्यों जन्म लिया | साँप भी चूहों और मेंढकों को खाना छोड़ दे (जो कि उनका स्वाभाविक भोजन है) और केवल दूध फल और मिठाई खाने का ही व्रत ले ले |

अब आइये मैं अपनी अनपढ़ बुद्धि से प्राप्त वह ज्ञान आप लोगों को बताता हूँ, जिसका कोई प्रमाण आपको नहीं दे पाउँगा और न ही कोई भी सच्चा धार्मिक, ब्रह्मज्ञानी, संत-महंत मेरे इस आत्मज्ञान का समर्थन करेगा |

“जीवो जीवस्य भोजनम् !”

यह वाक्य जिसने भी सबसे पहले प्रयोग किया होगा या जिसके भी दिमाग में पहली बार आया होगा, निश्चय ही वह कान्वेंट एजुकेटेड नहीं रहा होगा और न ही उसे अंग्रेजी आती होगी | निश्चय ही वह पंडित या विद्वान नहीं रहा होगा और न ही किसी धर्मगुरु से दीक्षित रहा होगा | उसने यह वाक्य जो प्रयोग किया वह कोई ईश्वरीय ज्ञान भी नहीं रहा होगा जो ईश्वर ने स्वयं उसे दिया हो और उसने लिख लिया हो | जैसे कि वेद, पुराण, क़ुरान आदि लिखे गये ईश्वरीय प्रेरणा व आदेश से |

यह वाक्य वह ब्रम्हज्ञान है जो कई वर्षो तक जंगल में भटकने के बाद ही कोई जान व समझ सकता है, शहरों या गांवों में बैठकर धार्मिक पुस्तकें रटने और भजन-कीर्तन करने से तो यह कई जन्मों में भी नहीं समझ में आने वाला | लेकिन न जाने क्यों मुझे यह वाक्य बचपन में ही समझ में आ गया था… शायद मैं पिछले जन्म में जंगलों में ही भटकते हुए मरा था |

इस वाक्य में वह सार है जो मैंने नहीं देखा कि किसी विद्वान् की समझ में आया कभी | आना भी नहीं था क्योंकि विद्वान का मतलब ही होता है जिसे रट्टा मारकर दोहराने की दक्षता प्राप्त हो | चाहे खुद के समझ में न आया हो, लेकिन घंटों तक उस विषय में लेकचर या प्रवचन दे सकते हों |

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यह वाक्य स्वयं में सम्पूर्ण ब्रम्हज्ञान है क्योंकि यह कहता है ‘जीव ही जीवों का भोजन है’ | जीव का अर्थ है जिसमें जीवन हो, न कि केवल पशु-पक्षी या जलचर आदि | जरा कल्पना कीजिये किसी ऐसे भोज्य पदार्थ का जो जीवन रहित है ?

एक प्रश्न उठाया गया है, “A number of studies have shown that plants feel pain, and vegetables are picked and often eaten while still alive. Animal rights activists are often in the news, but has anyone ever protested for vegetable rights?” -Phil Cohen, Sydney, Australia

माइकेल पोलन का विचार देखें, “They (Plants) have ways of taking all the sensory data they gather in their everyday lives… integrate it and then behave in an appropriate way in response. And they do this without brains, which, in a way, is what’s incredible about it, because we automatically assume you need a brain to process information.” – Michael Pollan author of “The Omnivore’s Dilemma” and “The Botany of Desire” Do Plants Respond To Pain? Scientists Conduct An Experiment

अब ये जो प्रमाण हैं वे मेरे खोजे हुए नहीं हैं, इसलिए ही मैंने कहा था कि मैं कोई प्रमाण नहीं दे सकता | मैंने अनुभव किये हैं मैंने समझा है, जाना है लेकिन भीतरी यात्रा से, स्वयं से ही प्रश्नोत्तर करके न कि किसी विद्वान् से चर्चा करके | मैंने यह भी जाना कि विद्वानों से चर्चा करना मेरे लिए कभी सार्थक नहीं रहा क्योंकि उनका ज्ञान बहुत ही सीमित होता है और मेरी जिज्ञासाओं को वे न समझ पाते हैं और ही सार्थक उत्तर दे पाते हैं | इसलिए मैंने विद्वानों से विचार-विमर्श ही बंद कर दिया था और एक पागल की भाँती स्वयं से ही प्रश्नोत्तर करता रहा और फिर जो सार निकल कर आया वही मैं आपको बता रहा हूँ | आप लोग मुझसे पूरी तरह असहमत हो सकते हैं और यह आपका अधिकार है | क्योंकि आप लोग पढ़े-लिखे हैं, संस्कृत जानते हैं, अंग्रेजी जानते हैं |

तो मैंने प्रश्न रखा था कि किसी ऐसे भोज्य पदार्थ का नाम बताइये जिसमें जीवन न हो | उत्तर मिल जाये तो कमेन्ट में बताइयेगा |

अब यदि हम माँसाहार को समझें तो यह ईश्वर द्वारा बनाई गयी प्राकृतिक व्यवस्था है सृष्टि में संतुलन रखने का | ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि सृष्टि में कुछ भी अनुपयोगी न रहे | जबकि मानवों ने जितना कुछ भी बनाया है एक समय बाद वे प्रयोग करने योग्य नहीं रह जाते | वे कूड़े के ढेर में बदल जाते हैं और केवल पृथ्वी पर बोझ ही बनते हैं | जैसे प्लास्टिक, कंप्यूटर, उपग्रह… ये सभी केवल गंद ही मचाते हैं | मानवों ने तो पृथ्वी को कबाड़घर बना ही दिया, पृथ्वी के बाहर भी कचरों का ढेर लगा दिया |

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लेकिन ईश्वर ने जो रचना की उसने ऐसी व्यवस्था रखी कि एक चक्र बन जाए | जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, बड़ी मछली को पशु-पक्षी खा जाते हैं, पशु-पक्षियों को बड़े पशु-पक्षी खा जाते है….. यदि कोई नहीं भी खाता प्रत्यक्ष रूप में तो शरीर के मरते ही कुछ समय बाद उसमें कुछ कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं और वे ही उस शरीर का भक्षण करने लगते हैं | इस प्रकार वह निर्जीव शरीर कुछ समय बाद स्वतः ही लुप्त हो जाता है और साथ ही लुप्त हो जाते हैं वे कीड़े | तो वहाँ कुछ नहीं बचता सिवाय हड्डियों के | हड्डियाँ भी केल्शियम से निर्मित होती हैं इसलिए वह भी एक समय बाद किसी और रूप में परिवर्तित हो जाती है |

और जिन प्राणियों का भोजन के रूप में सर्वाधिक प्रयोग होता है उनकी प्रजनन क्षमता अधिक होती है | जैसे चूहों का शिकार कई पशु पक्षी करते हैं, मछलियों का शिकार कई पशु पक्षी करते हैं, मुर्गियों का शिकार कई पशु पक्षी करते हैं | वहीँ जो केवल शिकारी या परभक्षी ही हैं, वे कम बच्चे पैदा करते हैं | जैसे कि शेर, गरुड़, चील, बाज आदि | जिनका शिकार कम ही होता है वे भी कम ही बच्चे पैदा करते हैं, जैसे हाथी, अजगर आदि | तो यह एक प्राकृतिक व्यवस्था है |

रही शाकाहारियों की बात तो ये शाकाहारी केवल भारत के उन भागों की देन हैं जो कृषि पर निर्भर रहे | माँसाहार की निंदा इन्होने शुरू की न कि विश्व के किसी अन्य भूभाग में शुरू हुई होगी | इन्होने ही खुद को श्रेष्ठ व बाकियों को अपराधी व राक्षस सिद्ध करने के लिए माँसाहारियों की निंदा शुरू की होगी | माँसाहारी लोग केवल प्रकृति के नियमों के अंतर्गत ही भोजन कर रहे हैं और वह भी स्वाभाविक रूप से, न कि किसी शाकाहरी पंडित पुरोहित की किताब पढ़कर | मानव में भी सभी मांसाहरी नहीं हैं और सभी शाकाहारी नहीं हैं, लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं है कि दूसरे को नीचा दिखाए और खुद को श्रेष्ठ | यह प्राकृतिक गुण हैं और मैंने कई मांसाहारियों के घर में शाकाहरी बच्चे देखें हैं, वहीं कई शाकाहारियों के घर में माँसाहारी बच्चे देखे हैं |

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वास्तव में ये स्वघोषित धार्मिक और पुण्यात्माएं प्रकृति के विरुद्ध ही रहे हमेशा जैसे कि इनका ईश्वर से ही कोई खानदानी बैर रहा हो | जितनी भी प्राकृतिक व स्वाभाविक क्रियाएं, व्यवहार और भोजन हैं, उनपर ये लोग धर्मों की आढ़ लेकर प्रतिबन्ध लगाते चले आये | जैसे कि प्याज-लहसुन अधार्मिक हो गया, सेक्स अधार्मिक हो गया और ब्रम्हचर्य को महान बता दिया | इनकी ब्रम्हचर्य कि परिभाषा भी केवल सेक्स के विरोध में ही है न कि स्वाभाविक व्यव्हार | जबकि ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रम्ह (सृष्टि) के साथ समन्वय रखते हुए जीवन जीना और सेक्स सृष्टि का मूल है | सेक्स अर्थात मूलाधार चक्र की सक्रियता | जिसका मूलाधार चक्र निष्क्रिय या कमजोर होता है, उसकी सेक्स के प्रति अरुचि हो जाती है | यह भी एक शाश्वत सत्य है कि जिसकी सेक्स के प्रति रूचि होगी वे अधिक सक्रिय होंगे और जिनकी रूचि नहीं होगी होगी वे कम सक्रिय होंगे | अधिकाँश हमने देखा है कि जितने भी विश्वविख्यात लोग रहे वे लम्बे समय तक सेक्स में सक्रिय रहे | उदहारण बहुत ही मिल जायेंगे यदि आप लोग खोज करना चाहेंगे | वहीँ भारतीय संत समाज जो ब्रम्हचर्य के नाम पर स्त्रियों से भागते रहे, उन्होंने कोई भी आविष्कार नहीं किया, सिवाय दूसरों के लिखे ग्रंथों और विचारों के अनुवाद व प्रचार प्रसार करने के | हमारे पास जो भी श्रेष्ठ ज्ञान आज हैं वे सभी उन ऋषि मुनियों के हैं जो ब्रह्मचर्य के नाम पर स्त्रियों से भागते नहीं थे, बल्कि स्त्रियों को सहयोगी माना | आज जो गोत्र की बातें करते हैं हम वह भी तभी संभव हुआ है जब ऋषियों ने स्त्रियों से शारीरिक सम्बन्ध बनाये |

इस प्रकार मैंने जाना कि ऋषि प्रजाति के लुप्त होने के बाद से धर्म प्रकृति के विरुद्ध हो गया और ब्रम्ह व सनातन धर्म के विरुद्ध आचरण करना ही पुण्य माना जाने लगा | ब्रह्मचर्य व सनातन धर्म का पालन करना पाप व अधर्म माना जाने लगा |

लेख बहुत ही बड़ा हो गया…. इस बात का खेद है मुझे कि मेरे इतने लम्बे प्रवचन से आप लोगों का सर दुःख गया होगा और गुस्सा भी बहुत आ रहा होगा कि एक अनपढ़ जिसे क ख भी नहीं पता शास्त्रों का, धर्म का, वह इतनी बकवास कर रहा है और वह भी बिना किसी प्रमाण के | इसलिए मैं यही अपनी बकवास समाप्त करता हूँ और आप लोगों से विनम्र निवेदन करता हूँ कि अपनी पढ़ी-लिखी व विद्वान् बुद्धि से अपना पक्ष रखें ताकि मुझ अज्ञानी को भी कुछ ज्ञान प्राप्त हो सके | ~विशुद्ध चैतन्य

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VINOD KUMAR SINGHविशुद्ध चैतन्य Recent comment authors
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विशुद्ध चैतन्य
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Thanx for your prestigious comment !

VINOD KUMAR SINGH
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very positive……….I am agree with you, actually this is natural cycle and ecological balance is important…..religious mind can not understand the ecological balance properly.