समलैंगिकता और अप्राकृतिक यौन संबंधों का कारक है समाज

समलैंगिकता का विरोध और समलैंगिकता को अप्राकृतिक मानना सिवाय दिमागी दिवालियापन के और कुछ नहीं है | यह बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे यह मानना कि जो मुझे पसंद नहीं, वह किसी और को भी पसंद नहीं होना चाहिए, जो बहुसंख्यकों को पसंद नहीं, वह अल्पसंख्यकों को भी पसंद नहीं होना चाहिए | यदि अल्पसंख्यक वही पसंद करते हैं जो बहुसंख्यक नापसंद करते हैं, तो वे अप्राकृतिक है | यानि जो बहुसंख्यक पसंद करते हैं, वह प्राकृतिक है ?  लेफ्टी यानि बाएं हाथों का प्रयोग करने वाले अप्राकृतिक माने जायेंगे क्योंकि बहुसंख्यक दायें हाथ का ही प्रयोग करते हैं | आज भी समाज में कई परिवार ऐसे हैं जो खब्बू यानि लेफ्टी बच्चों को मार-पीट कर दायें हाथ का अधिक प्रयोग करने का दबाव बनाते हैं |
 

क्या जो सभ्य समाज को पसंद है वही प्राकृतिक व नैतिक है ?

सभ्य, समाजिक लोग तो शोषण व अत्याचार भी पसंद करते हैं, क्योंकि किसी पर अत्याचार होते, किसी का शोषण होते देखकर भी वे अनदेखा करके निकल जाते हैं | तो क्या इसे प्राकृतिक व नैतिक मान लिया जाये ?
 
सभ्य, समाजिक लोग तो धर्म व जाति के नाम पर लड़ना झगड़ना, दूसरों को नीचा दिखाना पसंद करते हैं, साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वालों को सर माथे पर बैठाना पसंद करते हैं, तो क्या इसे प्राकृतिक व नैतिक मान लिया जाये ?
 
सभ्य, समाजिक लोग तो कभी सतीप्रथा, देवदासी प्रथा के भी कट्टर समर्थक रहे थे, तो क्या इसे प्राकृतिक व नैतिक मान लिया जाये ?
 
सभ्य, समाजिक लोगों को तो रिश्वतखोरों, घोटालेबाजों से भी कोई आपात्ति नहीं, तो क्या इसे प्राकृतिक व नैतिक मान लिया जाये ?
 
सभ्य, समाजिक लोगों को तो बेमौत मरते किसानों, और आदिवासियों की भी कोई चिंता नहीं, तो क्या इसे प्राकृतिक व नैतिक मान लिया जाये ?
 
बहुसंख्यकों को तो देवी, देवताओं के नाम पर पर बने गुंडे-मवालियों की सेना और दलों से भी कोई आपत्ति नहीं, तो क्या इसे प्राकृतिक व नैतिक मान लिया जाये ?
 
बहुसंख्यकों को तो अपने ही समाज में भूख से मरते बेबस और लाचारों की कोई चिंता नहीं, तो क्या इसे प्राकृतिक व नैतिक मान लिया जाये ?
 
अभी एक खबर पढ़ रहा था कि “वैश्य समाज की लड़की से शादी करने की वजह से गर्भवती पत्नी के सामने काट डाला दलित युवक का गला। तो समाज को स्त्री- पुरुष का स्वेक्षा से प्राकृतिक मिलन तो दूर, विवाह तक से ही आपत्ति है, दोनों को मिलने से रोकने के लिए तरह तरह के उपाय किये जाते हैं, यहाँ तक कि प्रेमी-प्रेमिकाओं की हत्या करने से भी परहेज नहीं, पार्कों में, एकांतों में साथ बैठने तक से परेशानी होती है….तो क्या इसे प्राकृतिक व नैतिक मान लिया जाये ?
मैं आगे कुछ लिखूं, उससे पहले समलैंगिकता पर राजीव दीक्षित जी का विचार सुन लीजिये | और मैं जानता हूँ कि अधिकांश लोग विशेषकर वे सभ्य व धार्मिक लोग, जो भ्रष्टाचारियों, घोटालेबाजों, जुमलेबाजों का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में समर्थन करते हैं, वे भी राजीव दीक्षित जी से सहमत होंगे |

तो सुना आपने राजीव जी को ?

ईश्वर की प्राप्ति और वह भी ईश्वर को जाने समझे बगैर ???

राजीव जी बहुत ही ऊँचे लेवल की बातें कर रहे थे, इतने ऊँचे लेवल की, जितने ऊँचे लेवल पर भारत के ऋषि मुनि भी नहीं पहुँचे थे | वे भी अप्सराओं की रूप अदाओं पर फिसल जाते थे, किसी सुन्दर कन्या पर मोहित हो जाते थे, गंधर्व विवाह रचाकर यौनसुख भोगते थे | राजीव जी जितने ऊँचे लेवल पर चिन्तन कर रहे थे, उतने ऊंचे लेवल पर देवता भी नहीं पहुँच पाए थे, वे भी शारीरिक सुख प्राप्त करने के लिए पृथ्वी पर भटकते रहते थे, छल-कपट से शरीरधारी स्त्रियों से सम्भोग करते थे | यह और बात है कि जिस ऊँचाई पर देवी-देवता, ऋषि-मुनि नहीं पहुँच पाए, उस लेवल से ऊपर पहुँच गए कथावाचक, पण्डे-पुरोहित और राजीव जी जैसे विद्वान् |

ये काल्पनिक ईश्वर की प्राप्ति का ख्वाब देखते रहते हैं, उस ईश्वर का, जिसके विषय में इन्हें कोई ज्ञान ही नहीं | बस शास्त्रों में लिखा है, रट लिया और दोहराने लगे | इनका सारा ज्ञान-ध्यान देह पर ही, वह भी कमर से नीचे ही सिमट कर रह गया, ऊपर उठा ही नहीं और बातें करते हैं ईश्वर प्राप्ति की | ये भला समलैंगिता को क्या जानेंगे ?

तो जो लोग ईश्वर प्राप्ति की बात करते हैं और वह भी शरीर की प्राकृतिक, स्वाभाविक आवश्यकताओं व भूख, प्यास को अनदेखा कर, वे मुझे आध्यात्मिक या ज्ञानी नहीं, बल्कि मानसिक रूप से विक्षिप्त ही नजर आते हैं | ईश्वर की प्राप्ति और वह भी ईश्वर को जाने समझे बगैर ??? इससे बड़ी मुर्खता पूर्ण धार्मिकता और आध्यात्मिकता भला और क्या होगी ? यह तो बिलकुल वैसी ही बात हो गयी, जैसे क़ुतुबमीनार के बुर्ज पर पहुँचना और वह भी बिना सीढ़ी या भौतिक संसाधनों का प्रयोग किये | इनकी दलील होगी कि हमारे पूर्वज तो मन की इच्छा शक्ति से ही कहीं भी पहुँच जाते थे | हनुमान जी तो बिना हवाई जहाज, हेलिकॉप्टर के ही एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जाते थे, बिना रोकेट के ही सूरज के पास पहुँच जाते थे और उसे निगल लेते थे | ऐसे ही बिना भौतिक या प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग किये ही ईश्वर की प्राप्ति की कल्पना में खोये रहते हैं |

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समलैंगिता कोई यूरोप की देन नहीं, यह प्रकृति की देन है और मानव समाज जहाँ भी है, हर जगह कुछ प्रतिशत समलैंगिक अवश्य मिलेंगे ही | भारत में यह इतने खुले रूप में व्यक्त नहीं हुई क्योंकि यहाँ का सामाजिक ताना-बाना ही ऐसा था कि खुलकर कभी कोई इस विषय पर चर्चा कर ही नहीं पाया | लेकिन समलैंगिकता को समझने से पहले मैं शरीर व आत्मा को समझाना चाहता हूँ | आगे जो कुछ लिखूंगा वह नास्तिकों, पढ़े-लिखों की समझ में शायद बिलकुल भी न आये क्योंकि वे तो आत्मा के आस्तित्व से ही इनकार करते हैं |

आत्मा और शरीर

भारतीय दर्शन मानता है कि शरीर भौतिक यंत्र है, वाहन है, उद्देश्य व वासना पूर्ति का माध्यम है आत्मा का | इस शरीर को संचालित करने वाला आत्मा ही है | अर्थात शरीर वाहन है जिसके भीतर आत्मा नामक चालक होता है | जब शरीर दुर्घटनाग्रस्त हो जाये या जर्जर हो जाए, तब आत्मा उस शरीर का त्याग कर देती है और दूसरा शरीर धारण कर लेती है | यह माना जाता है कि गर्भ में आत्मा का प्रवेश पहले नहीं होता, पहले शरीर ही तैयार होता है और शरीर तैयार होने के चार हफ्ते के पश्चात ही उस शरीर में आत्मा का प्रवेश होता है | इसलिए गर्भावस्था का पता चलते ही हिन्दू समाज में गर्भवती स्त्री को श्मशान या किसी भी नकारात्मक स्थान पर जाने से रोका जाता है | प्रयास यही रहता है कि उसको शांत, आध्यात्मिक वातावरण मिले, ताकि संतान भी उच्च, सात्विक विचारों का ही हो | यह और बात है कि अब यह सब बातें ध्यान नही देता कोई |

तो भौतिक शरीर का चालक स्त्री या पुरुष हो सकता है | प्रकृति या ईश्वर स्त्री के लिए अलग शरीर तैयार करता है, और पुरुष के लिए अलग | लेकिन कई बार ऐसा भी हो जाता है कि स्त्री को पुरुष का शरीर मिल जाये और पुरुष को स्त्री का शरीर मिल जाए | ऐसी स्थिति में शरीर से पुरुष दिखने वाली आत्मा पुरुष शरीर के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती और वह स्त्रियों जैसा व्यवहार करने लगती है | क्योंकि वह है तो स्त्री ही केवल शरीर पुरुष का है | तो पुरुष शरीरधारी स्त्री आत्मा को पुरुष ही अकार्षित करेंगे न कि स्त्री |

यहाँ यह प्रश्न उठेगा कि आत्मा तो न स्त्री होती है न पुरुष, तो फिर स्त्री आत्मा और पुरुष आत्मा की बात कहाँ से आ गयी ?

आत्मा केवल आत्मा ही होती है लेकिन वह जिस भाव में जन्म लेना चाहती है उस भाव के अनुसार ही वह व्यवहार करती है | यदि किसी आत्मा का कोई कार्य पुरुष रूप में संपन्न होना है, तो वह पुरुष के रूप में ही जन्म लेगी और यदि उसका कार्य या उद्देश्य स्त्रीरूप में पूरा होना है, तो वह स्त्री रूप में ही जन्म लेगी | भौतिक शरीर में परिवर्तन हो जाना गर्भावस्था के समय की परिस्थितियों की अनुकूलता व प्रतिकूलता पर भी निर्भर करता है | उदाहरण के लिए यह देखा गया है कि जिस घर में बच्चे की सुरक्षा व देख-रेख करने वाले अधिक होते हैं, उस घर में लड़के के जन्म लेने की सम्भावना अधिक होती है | लेकिन जिस घर में बच्चे को कठिनाइयों का सामना अधिक करना पड़ेगा, उस घर में लड़की के जन्म लेने की सम्भावना अधिक होती है | क्योंकि लड़कियां पुरुषों से अधिक सहनशील व विपरीत परिस्थितियों के अनुकूल ढल जाने की क्षमता रखती है | यह गुण स्त्रियों को प्राकृतिक रूप से ही प्राप्त है क्योंकि वह जननी है, उसकी धैर्य व सहनशीलता पर ही उसके होने वाले बच्चे का भविष्य टिका होता है |

ये कुछ सामान्य बातें थीं जो समझनी आवश्यक थी | मैंने आपको यहाँ केवल भौतिक शरीर व आत्मा के विषय में ही समझाया है, आगे और भी है समझने के लिए |

क्या समलैंगिता मात्र दैहिक सुख पर आधारित है ?

सोचल मीडिया में समलैंगिकता को गूदा मैथुन (Anal Sex) के प्रति आसक्ति से जोड़ कर देखा गया और दुनिया भर का अश्लील मजाक उड़ाया गया समलैंगिकों का | यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी स्वयं को सभ्य, धार्मिक व नैतिक मानने वाले अधार्मिकों व अनैतिकों की | मैं इन्हें अधार्मिक व अनैतिक इसलिए मानता हूँ क्योंकी इनकी सोच व समझ, इनकी नैतिकता, इनकी शालीनता केवल कमर से नीचे और दो टांगों के बीच ही सिमट कर रह गया | इनका ब्रह्मचर्य हो या सात्विकता, दो टांगों के बीच ही सिमटा मिलेगा | ये आदिकाल से लेकर आज तक कमर से ऊपर उठ ही नहीं पाए | फिर चाहे धार्मिकता, सात्विकता और नैतिकता का कितना ही ढोंग करते फिरें |

दैहिक सुख से ऊपर एक सुख और होता है और वह है अपनेपन, समर्पण व अद्वैत का सुख | यही मूल कारक है प्रेम का | प्रत्येक व्यक्ति की मौलिक व तीव्र वासना व कामना होती है अद्वैत को अनुभव करना | अद्वैत को अनुभव करने के लिए द्वैत को जानना समझना व पाना आवश्यक है | बिना द्वैत को प्राप्त किये अद्वैत की प्राप्ति नहीं हो सकती | तो दूसरा व्यक्ति चाहिए अद्वैत तक पहुँचने के लिए, अद्वैत को प्राप्त करने के लिए | तो व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति की तरफ आकर्षित होता ही है जीवन में एक न एक बार, जिससे उसे भावनात्मक सुख व संतुष्टि प्राप्त हो सकती है | यह आकर्षण सबसे पहले माँ के प्रति होता है, उसके बाद दूसरे संबंधियों, मित्रों के प्रति | यही उसका प्रथम प्रेम होता है और जिसके समक्ष व्यक्ति जितना मुक्त अनुभव करता है, उतना ही उसका प्रेम व आकर्षण बढ़ता है उस व्यक्ति के प्रति | यह मुक्तता का भाव ही उसे अद्वैत का आंशिक सुख देता है | लेकिन वह जानता है कि यहाँ भी कुछ समाजिक मर्यादाएं व दूरी हैं, कोई अनदेखी दीवार है | इसलिए वह किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में रहता है, जो उस दीवार से भी मुक्त कर दे उसे | और ऐसा उसे मिलता है प्रेमी या प्रेमिका के रूप में | यह ध्यान रखें कि यहाँ भी सेक्स प्रथम स्थान पर नहीं है, सेक्स पर प्रेम आधारित नहीं है | यदि सेक्स के बदले प्रेम का भाव होगा, तो यह व्यापारिक सम्बन्ध होगा, बिलकुल वैसा ही जैसे वेश्या और ग्राहक के बीच का सम्बन्ध होता है | प्रेम केवल प्रेम होता है वह भौतिक शरीर से ऊपर का भाव है | अर्थात आत्मा का भाव है इसीलिए प्रेम को ईश्वर भी माना गया |

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अब प्रेम किसी से भी हो सकता है किसी भी उम्र में हो सकता है और किसी भी उम्र के व्यक्ति से हो सकता है और प्रेम का आधार सेक्स ही हो यह आवश्यक नहीं | समाज उनके बाह्य शरीर पर ही टिका रह जाता है क्योंकि उससे आगे वह न देख सकता है न समझ सकता है | तो यदि किसी पुरुष को किसी पुरुष मित्र से इतनी आत्मीयता हो जाए कि उसे उसके अतिरिक्त किसी और की आवश्यकता न हो, तब वह समलैंगिता कहलाने लगती है | यदि किसी पुरुष को पुरुष से या स्त्री को स्त्री से आत्मीयता मिल रही हो, अद्वैत का भाव मिल रहा हो, दो जिस्म एक जान का अनुभव हो रहा हो, तो वह किसी और के प्रति क्यों आकर्षित होगा ? वह तो उसी  के साथ जीना मरना चाहेगा जो उसे मुक्तता का अनुभव करवाता हो, जिसके साथ होने पर वह पूर्णता का अनुभव करता हो | फिर वह जिस्म पुरुष हो या स्त्री क्या अंतर पड़ता है ?

रही सेक्स की बात, तो सेक्स केवल उस सम्बन्ध को पूर्णता प्रदान करने का ही माध्यम है | अर्थात वह दीवार जो सामाजिक कारणों से बाकी संबंधों में खड़ी रहती है, वह भी गिर जाती है जब प्रेम के साथ सेक्स भी शामिल हो जाए | सेक्स उस पूर्णता, अद्वैतता, एक जिस्म दो जान की अनुभूति को बनाये रखने की भौतिक क्रिया मात्र है | और जब दो पूर्ण समर्पित प्रेमियों के बीच सेक्स स्थापित होता है, तब उसमें कोई नियम कानून नहीं रह जाता, वहां केवल प्रेम, समर्पण और सेक्स ही जाता है | सेक्स वास्तव में प्रेम व समर्पण की पूर्णता का ही नाम है | सेक्स में सही और गलत भी कुछ नहीं रह जाता यह समझने के लिए वातस्यायन का कामसूत्र पढना चाहिए | सेक्स में कितनी कलायें हैं वह उस पुस्तक से अच्छी तरह समझ आ जायेगी | तो जहां समर्पण है, वहां मुख मैथुन हो या गूदा मैथुन सब स्वीकार्य हो जाता है |

गूदा मैथुन को आधार बनाकर समलैंगिकों के प्रेम का अपमान करने वालों को आप देखेंगे कि वे गालियों में गूदामैथुन का जिक्र अवश्य करते मिलेंगे | अभी  कहीं पढ़ा था कि गूदा मैथुन को ही आधार बनाकर किसी ने किसी स्त्री के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया था | तो एक स्त्री से गूदामैथुन का स्वप्न संजोये ऐसे ही लोग गूदा मैथुन को आधार बनाकर मजाक उड़ा रहे थे समलैंगिकों के प्रेम का | क्योंकि प्रेम इनके समझ से परे है, इनका दिमाग तो दो टांगों के बीच से बाहर कभी निकल ही नहीं पाया, तो प्रेम को भला क्या समझेंगे ये लोग ?

तो समलैगिता का आधार सेक्स नहीं, प्रेम है | और प्रेम का कोई आधार नहीं होता क्योंकि वह अद्वैत का भाव है, वह पूर्णता का भाव है, वह संतुष्टि का भाव है, व अभिन्नता का भाव है, वह परमानन्द हैं, वह ईश्वर है | प्रेम को समझना सिखाइए समाज को, प्रेम को जीना सिखाइए समाज को तभी समाज दो टाँगों के बीच से बाहर निकल पायेगा, तभी वह कमर से ऊपर उठ पायेगा और तभी वह प्रेम का सम्मान कर पायेगा | तभी प्रेमी जोड़ों की हत्याओं पर लगाम लगेगी, तभी समाज प्रेम संबंधों को सहजता से स्वीकार पायेगा |

समलैंगिता के लिए स्त्री-पुरुषों के प्राकृतिक मिलन में बाधक समाज भी दोषी है

समलैंगिकता प्रेम पर आधारित होता है यह ठीक है, लेकिन कई बार विपरीत लिंग के साथी का ना मिल पाना भी कारक बन जाता है | ये मानसिक या शारीरिक कारणों से समलैंगिक नहीं होते, बल्कि परिस्थिति इन्हें विवश कर देती है | समाज स्त्री और पुरुष के प्राकृतिक व स्वैच्छिक मिलन के विरोध में ही खड़ा रहता है हर समय | ऐसी स्थिति में जो भावनात्मक रूप से कमजोर हैं, खुलकर समाज से टकराने का साहस नहीं कर पाते, वे समलैगिकता की तरफ मुड़ जाते हैं | ऐसा करके वे अपनी शारीरिक आवश्यकताएं भी पूरी कर लेते हैं और समाज के नजर में ब्रह्मचारी, सात्विक भी बने रहते है | कुछ दिनों पहले ही पढ़ा था कि एक बौद्ध धर्मगुरु छात्रों के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार हुआ | ऐसी ही कई और खबरें पढने मिली मुझे पहले भी, कहीं कोई बाबा गिरफ्तार हुआ समलैंगिक शोषण के आरोप में तो कभी कोई महंत तो कभी कोई और | इसके लिए दोषी वे नहीं, यह समाज ही है जो झूठे मान-सम्मान का लालच देकर उन्हें महान बनाने के नाम पर उन्हें विवश करता है नैसर्गिक, प्राकृतिक भूख के दमन के लिए |

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चूँकि समाज बना ही है यौन कुंठित व्यक्तियों, परिवारों से, तो इस समाज की धार्मिकता व नैतिकता भी यौन दमन पर ही आधारित होता है | जो ईश्वरीय है, जो सम्बन्ध सभी संबंधों से सबसे अधिक प्राकृतिक है, जो सम्बन्ध अद्वैत का अनुभव करवाने, परमानन्द का अनुभव करवाने के लिए ईश्वर द्वारा ही प्रदान की गयी है, समाज उसी के विरोध में खड़ा है | समाज स्वयं को ईश्वर से भी ऊपर समझने लगा और स्वयं से भी ऊपर समझ रहा है धर्म व नैतिकता के ठेकेदारों को |

अब तो स्त्री पुरुषों की बीच चलने वाली सहज छेड़छाड़ भी कानून अपराध हो गया | कुछ वर्ष पहले तो यह भी सुनने में आया था की यदि किसी पुरुष ने किसी स्त्री को दस सेकेण्ड से अधिक घूरा तो उसपर यौन उत्पीडन का अपराधिक मुकदमा दर्ज हो सकता है | लेकिन इसके परिणाम घातक हो गये | बलात्कार और वह भी वीभत्स बलात्कार से लेकर सबूत मिटाने के लिए हत्या तक बढ़ गये | लेकिन समाज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्होंने तो कानून बनाकर नैतिकता बचा लिया, फिर चाहे समाज में यौन कुंठित लोगों की जनसँख्या बढ़ गयी |

समाज ने केवल दमन का मार्ग अपनाया न कि मुक्ति का मार्ग | भोगे बिना भोग से मुक्ति नहीं, भोजन बिना भूख से मुक्ति नहीं, जल बिना प्यास से मुक्ति नहीं | इतनी सी बात यदि समाज के नैतिक व धार्मिक ठेकेदारों को समझ में आ जाती, तो कामसूत्र और खजुराहो जैसी यौन कलाकृतियों के जनक देश का धार्मिक व सभ्य समाज यौन कुंठित नहीं होता | आदिवासी यौन कुंठित नहीं होते, पशु-पक्षी यौन कुंठित नहीं होते, यहाँ तक कि कीट पतंगे भी यौन कुंठित नहीं होते, केवल नैतिकता, सभ्यता, धार्मिकता की दुहाई देने वाला, सभ्य कहलाने वाला समाज ही यौन कुंठित होता है | और यौन कुंठित समाज अप्राकृतिक यौन संबंधों का कारक है

परिणाम यह हुआ कि मनुष्य अप्राकृतिक होता चला गया | अब सुनने में आया है की इटली में एक Sex Doll Brothel (वेश्यालय) है | उस वेश्यालय में सेक्स डॉल उपलब्ध हैं और स्त्री या पुरुष कोई भी प्लास्टिक के बने डॉल से सेक्स कर सकता है | सेक्स टोय्ज़ तो पहले ही उपलब्ध थे बाजारों में, अब सेक्स डॉल्स भी उपलब्ध हो गये | और उससे भी आगे बढ़कर सेक्स डॉल्स का वेश्यालय भी खुल गया | और आप आश्चर्य करेंगे कि खुलते ही दो हफ्ते की एडवांस बुकिंग हो गयी |

हम भारतीय प्रकृति के उपासक थे कभी, आधुनिकता की होड़ ने हमें अप्राकृतिक बना दिया | ब्रह्मचर्य जिसका मूल उद्देश्य ही था समाज को यह समझाना कि वह प्राकृतिक जीवन शैली अपनाए | लेकिन समाज, धर्म व नैतिकता के ठेकेदारों ने ब्रह्मचर्य को ही अप्राकृतिक बना दिया

क्यों हुआ ऐसा ? कभी सोचा है आपने ?

निदा रहमान की यह कविता पढ़िए, समझ में आ जाएगा यदि अभी तक समझ में नहीं आया तो:

कभी ज़िंदा
दफ़्न कर दिए जाओगे
कभी तलवारों से
काट दिए जाओगे
कभी गला दबा दिया जाएगा
तो कभी ज़िंदा जला दिया जाएगा,
क़त्ल होने वाले का गुनाह
सिर्फ़ इतना होगा कि उसने मोहब्बत की होगी
उसे सिर्फ़ इसलिए मरना होगा
क्योंकि उसने नफ़रत के बजाए
प्यार को चुना होगा,
क़ातिल कोई ग़ैर नहीं सब अपने होंगे
वो अपने जिनके हाथों में खेले होंगे
बचपन से लेके जवानी के तमाम किस्से होंगे
लेकिन वो सिर्फ़ नफ़रत करना जानते हैं
उनके लिए मोहब्बत, प्यार का कोई मोल नहीं
वो झूठी शान के लिए बेटी को विधवा कर सकते हैं
वो इज़्ज़त के नाम पर बेटों को क़त्ल कर सकते हैं
क़ातिल इस घिनौने समाज का आईना हैं
वो समाज जहां प्यार से बड़ा कोई जुर्म नहीं
कभी धर्म, कभी जाति
कभी अमीरी, कभी गरीबी
कभी ऊँच, कभी नीच
दीवारें इतनी ऊँची बना दी हैं कि
जिसने इसे पार करने की कोशिश की
वो दुश्मन बन गया समाज का
लेकिन तुम्हारा असली चेहरा
यही मोहब्बत के परवाने सामने लाते हैं। ?

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