सजा का उद्देश्य क्या है ?

मैं देखता हूँ कि लोग क्रूर से क्रूरतम मृत्युदंड के पक्ष में अधिक होते जा रहे हैं | यदि इतिहास उठाकर देखें तो पहले जितनी क्रूरता थी मानवों में वह अब कम ही हुई है | पहले मृत्युदंड के आरोपी को ऐसी यातनाएं झेलनी पड़ती थीं कि सोचकर ही रूह कांप जाती है | लेकिन क्या अपराध कम हुए ?

लोग उदाहरण देते है कि साउदी जैसी सजा यहाँ भी होनी चाहिए क्योंकि वहां अपराध नहीं होते | बलात्कार की कोई घटना कभी कभार ही सुनने को मिलती है | अब उस तरह के कानून को यहाँ भी लागू कर दिया जाए तो कोई लड़की शिकायत करने जा ही नहीं सकती | ईरान की ही घटना को ले लिया जाए, कैसे एक स्त्री ने अपनी आबरू बचाने के लिए एक शैतान का कत्ल किया, लेकिन सजा उसे ही मिली | जहाँ उसकी बहादुरी की प्रशंसा होनी चाहिए थी उसकी जगह उसे मृत्युदंड मिला | बलात्कार के लिए चार गवाह चाहिए होते हैं एक महिला को शरिया कानून के तहत | यदि चारों ही बलात्कारी हों तो गवाही कौन देगा ? यदि महिला बलात्कार का आरोप सिद्ध नहीं कर पाती तो उसे ही सजा भुगतनी पड़ती है, ऐसे में कोई औरत कैसे न्याय की आशा कर सकती है ?

मृत्युदंड का उद्देश्य क्या है, क्यों दिया जाता है ?

वास्तव में कोई भी मृत्युदंड या आजीवन कारावास, किसी को सुधारने के लिए नहीं दिया जाता, बल्कि समाज को डराने के लिए दिया जाता है | लेकिन इसका असर शायद ही होता है | आपने जो सजा बताई वह भी कारगार नहीं है किसी को सुधारने में या किसी को डराने में | क्योंकि जिस समय क्रोध हो, बदले की भावना हो या हवस में कोई अँधा हो चुका हो, वह सारे बुरे से बुरे परिणामों को कम मानता है | हाल ही मैं कुछ महीनों में महिलाओं के साथ हुई क्रूरतापूर्ण बलात्कर इस बात की पुष्टि करता है कि बलात्कारी को फाँसी की सजा से किसी को कोई डर नहीं था, बल्कि अब वे और अधिक उग्र हो गये | अब वे यह मानकर चलते है कि पकड़े गये तो मरना तो है ही, तो क्यों न पूरी तरह से शैतान ही बन जाएँ.. आखरी बार ही सही |

फिर वर्तमान में कानून स्वयं एक व्यावसायिक संसथान हैं, न तो वहां शुद्ध आत्माएं बैठती हैं और न ही देवताओं का वास होता है | न ही वहां चन्द्रगुप्त न्यायाधीश हैं और न ही विक्रमादित्य | हर कोई बिकता है आज गवाह से लेकर जज तक | प्रमाण के रूप में आप घोटालेबाजों को ही ले लीजिये… एक से बढकर एक वकील बैठे हैं अपराधियों को छुड़ाने व निर्दोष को सजा दिलवाने के लिए | बस जेब में मोटा पैसा होना चाहिए | कई वकील तो लाखों रूपये लेते हैं एक एक पेशी के… ऐसे में किसी आम व्यक्ति को न्याय मिल पाए असंभव है | और अमीर आदमी के साथ अन्याय हो पाए वह असंभव है | यदि वास्तव में न्याय हो रहा होता तो जिसने बीस वर्ष कैद की सजा काट ली हो, उसे मृत्युदंड कैसे दिया जा सकता है ? दो सजा एक ही अपराध के लिए कैसे दी जा सकती ? किसी जघन्य अपराध के लिए बीस बाईस साल तक केस को न्याय के नाम पर खींचना वास्तव में न्याय नहीं, अपराधी के साथ अन्याय ही है | वकीलों और जजों की तो कमाई होती रहती है, लेकिन बेचारा वह अपराधी न इस पार रहता है उस पार… और ऐसे में बीस बाईस साल बाद भी मृत्युदंड पाए अपराधी के मन में या बात रहती है कि उसके साथ नाइंसाफी हुई तो फिर मृत्युदंड ही व्यर्थ हो गया | अगला जन्म वह लेगा बदले की भावना से, न कि अपराधबोध से मुक्त होकर | वह सबसे पहले कानून की ही धज्जियाँ उडाएगा और फिर नचाएगा जजों और वकीलों को अपनी उँगलियों पर | यदि उसने जन्म तुरंत लिया तो उसे वह जज और वकील भी याद रहेंगे जिन्होंने उसके साथ नाइंसाफी की और परिणाम कुछ ऐसे आएंगे कि बिना कारण ही वे मरे जायेंगे किसी ऐसे व्यक्ति के हाथों जिन्हें न तो वे जानते थे, और नहीं मारने वाला जानता था |

क्योंकि सब्कांशियास माइंड अपने ही अंदाज में अपने ही तरीके से काम करता है | उसे समझने में अभी कई हज़ार वर्ष और लगेंगे | इसलिए मृत्युदंड देने से पहले नियत साफ़ होनी चाहिए | अपराधी को मृत्युदंड स्वीकार होना चाहिए… तभी वह मुक्ति हो सकती है उसकी | वरना उसका तो अगला जन्म भी बदला लेने में बीत जाएगा, उन्नत होगा कब वह ? ~विशुद्ध चैतन्य

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