वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था के पतन का कारण

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वैधानिक चेतावनी: यह पूरा लेख मेरी व्यक्तिगत कल्पनाओं व धारणाओं पर आधारित है | अतः हो सकता है कि आपके शास्त्रीय व ऐतिहासिक ज्ञान व मान्यताओं के विरुद्ध हो और आपकी कोमल भावनाएं आहत हो जाएँ | अतः आगे पढने से पहले अपनी कोमल भावनाओं को मजबूत कर लें |

वंश-परम्परा:

प्राचीन काल में जब राष्ट्र या देश स्थापित नहीं हुए थे, तब छोटे छोटे कबीले हुआ करते थे | उन कबीलों का मुखिया ही उनका राजा हुआ करता था | पड़ोसी कबीलों से प्रायः युद्ध हुआ करता था इसलिए मुखिया का बुद्धिमान व बलशाली होना अनिवार्य शर्त थी | उस युग में विवाह के लिए पुरुषों का बलशाली व बुद्धिमान होना अनिवार्य हुआ करता था | क्योंकि यदि पुरुष निर्बल हुआ तो वह अपनी स्त्री व बच्चों की रक्षा शत्रुओं से नहीं कर पायेगा |

तो कबीले के मुखिया को प्रायः चुनौती मिलती रहती थी अपने ही कबीले के युवाओं से | और इसके लिए मल्लयुद्ध या शस्त्रयुद्ध की चुनौती रखी जाती थी, जिसका आयोजन किया जाता था | कबीले के सभी सदस्य एक जगह पर एकत्रित होते थे और प्रतियोगिता देखते थे | जो विजेता होता था, वह मुखिया चुन लिया जाता था | तो उस युग में योग्यता को महत्व दिया जाता था और उस काल में व्यावहारिक बल व बुद्धि ही योग्यता का मानदंड हुआ करता था, आज की तरह कागजी डिप्लोमा, डिग्रियां नहीं |

धीरे धीर लोग आर्थिक व समाजिक रूप से समृद्ध हुए, सोचने समझने का सामर्थ्य भी बढ़ा और साथ ही बढ़ा लालच, सत्ता का मोह | एक ही परिवार के लोग निरंतर अपनी सत्ता बनाये रखना चाहते थे | लेकिन यह आवश्यक नहीं था कि एक ही परिवार के सभी सदस्य हमेशा ही विजेता रहें | चुनौती देने वाला भी कई बार विजेता हो जाता था | और कई बार ऐसा भी होता था कि कोई उत्पाती मानसिकता का व्यक्ति मुखिया बन जाता था और वह अपने ही कबीले के लोगों पर अत्याचार करने लगता था | इसलिए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता पड़ी कि कोई उत्पाती व्यक्ति मुखिया को चुनौती न दे पाए | तो कुछ नियम बनाये गये होंगे कि कौन मुखिया को चुनौती दे सकता है | ऐसे परिवार के सदस्यों को निषेध किया गया होगा, जो असामाजिक गतिविधियों में लिप्त रहते हों या जो सहयोगी स्वभाव के न हों या लड़ते झगड़ते रहते हों | ऐसी व्यवस्था कबीले के हितों को ही ध्यान में रखकर किया था |

धीरे धीरे समाज की समझ और बढ़ी और उन्हें यह ज्ञात हुआ कि माता-पिता के गुणधर्म उनकी संतानों में भी लक्षित होते हैं | फिर संतान अपनी माता पिता से अधिक प्रभावित रहते हैं, तो वे उन्हीं की तरह होना चाहते हैं | चूँकि माता पिता जो भी कार्य कर रहे हैं उन्हें वह बचपन से देखता, सीखता बढ़ता है, इसलिए उसके लिए वह कार्य सहज होता जाता है | उसे बस थोड़ी दिशा देने और तराशने की आवश्यकता होती है | और वह अपने माता-पिता की तरह ही या उनसे अधिक बुद्धिमान व बलशाली हो जाता है | तो यह तय किया गया कि राजघराने के बच्चों के लिए शिक्षा की अलग व्यवस्था की जाए | ताकि उनका समय व्यर्थ न हो और वे अपनी योग्यताओं को और निखार सकें | इस तरह वंश परम्परा चल पड़ी और राजघरानो में राजुमारों को युद्ध व राजनीती के विषय में ही पारंगत होने के लिए प्रेरित किया जाने लगा |

राजघरानों की देखा-देखी सभी ने अपने अपने पारंपरिक कौशल अपने समुदाय या परिवार तक ही सीमित रखने लगे | क्योंकि अनुवांशिक योग्यताओं का ज्ञान बढ़ गया था समाज में तब तक | लोगों को समझ में आने लगा था कि माता-पिता की योग्यताएं उनके बच्चों में पायी जाती हैं | उदाहरण के लिए एक शिल्पकार की संतान में एक श्रेष्ठ शिल्पकार होने का गुण व योग्यता विद्यमान रहती है | एक योद्धा के संतान में एक श्रेष्ठ योद्धा होने का गुण व योग्यता विद्यमान होती है | इसी प्रकार विभिन्न कला व कर्म क्षेत्र के दम्पत्तियों की संतानों में माता-पिता के कौशल व योग्यताएं विद्यमान रहतीं है | बस उन्हें दिशा देने की आवश्यकता होती है कई बार यदि वे भटक जाएँ |

तो इस प्रकार जब एक ही व्यवसाय या कर्म को पारम्परिक रूप से अपना चुके परिवारों का एक समूह बन जाता है, तो उसे ‘जात‘ कहते हैं | जात का अर्थ होता है वह संतान जिसमें उसके माता-पिता के गुणधर्म हों | जात के कई अर्थ होते हैं, लेकिन मूल अर्थ यही है कि वंशानुगत गुणधर्म प्राप्त संतान | जात ही आगे चलकर जाति कहलाने लगी |

जाति-व्यवस्था:

जैसा कि मैंने पहले बताया कि समान पारंपरिक गुणधर्म वाले परिवारों के समूह को जाति कहने का चलन शुरू हुआ | यह सामान्य सामाजिक संबोधन या परिचय था | जैसे दर्जी जिस मोहल्ले में अधिक होंगे, उस मोहल्ले को दर्जी-मोहल्ला कहने लगेंगे | जिस गली में सुनार अधिक होंगे उसे सुनार-गली कहने लगेंगे | इसमें कोई भेदभाव वाली भावना नहीं होती, केवल सरल पहचान मात्र होती है |  और सुनार जाति बन गयी क्योंकि वे वंशानुगत प्राप्त ज्ञान को ही अपनी आजीविका का साधन बना चुके थे |

अब अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान को बनाये रखने के लिए अपने ही समूह में विवाह का चलन शुरू हुआ, ताकि पूर्वजों से प्राप्त कौशल का विस्तार हो सके | इस प्रकार जाति का विस्तार हुआ | यहाँ भी कोई भेदभाव वाली बात नहीं थी केवल अपने पारंपरिक योग्यता व कौशल का विस्तार मात्र ही था | और जो पुश्तैनी विद्या है वह किसी अयोग्य व्यक्ति के हाथ न पहुँच जाए, इसीलिए यह व्यवस्था बनायी गयी | यह व्यवस्था गलत नहीं थी क्योंकि इससे कला का विकास ही होता था, पिछली पीढ़ी से अधिक गुणवत्ता लेकर आती थी अगली पीढ़ी | नयी पीढ़ी अपने ही अनुवांशिक योग्यताओं व कलाओं में नये प्रयोग करके उसे और उन्नत बनाती थी |

यह सामान्य मनोविज्ञान है कि कोई भी गुरु, माता या पिता अपनी लगन, परिश्रम व समर्पण से प्राप्त विद्या या पूंजी को किसी अपने प्रिय को ही सौंपना चाहते हैं | और योग्य व्यक्तियों के प्रिय कोई योग्य ही होता है, चाटुकार या चापलूस नहीं हो सकता | योग्य व्यक्तियों का दिल भी वही जीत सकता है, जिसमें समर्पण का भाव हो, आदर का भाव हो, सेवा का भाव हो, निष्ठा का भाव हो और साथ ही विनम्रता का भाव हो | ये सभी गुण एक साथ उसके अपने ही किसी संतान में मिल सकते हैं | यह आवश्यक नहीं कि बाहर से आया कोई व्यक्ति गुरु के प्रति समर्पित ही हो, निष्ठावान ही हो | वह केवल दिखावा कर सकता है, अभिनय कर सकता है, छल कर सकता है | लेकिन अपने ही पिता या माता से विश्वासघात करने वाले संतानों की संख्या बहुत ही कम होती है |

ऐसा भी देखने में आया है कि कई गुरु जो अविवाहित रहे, उन्हें कोई योग्य शिष्य नहीं मिल पाया और वे अपना सारा ज्ञान अपने ही साथ लेकर चले गये | क्योंकि भारतीय शिक्षा पद्धति का नियम था कि अयोग्य के हाथ में यदि शस्त्र या शास्त्र पकड़ा दी जाए, तो वह न केवल अपना अहित करेगा, बल्कि दूसरों का भी अहित कर सकता है | जैसे वैदिक या धार्मिक ग्रन्थ आज हर जगह उपलब्ध हैं | लेकिन हर कोई उसे वैसा ही समझने के योग्य नहीं होता, बल्कि उसका गलत अर्थ निकालकर समाज में उपद्रव करता फिरता है | जैसे देवी देवताओं के विषय में ज्ञान नहीं है जिन्हें, वे उनका मजाक उड़ाते फिरते हैं, खुद को नास्तिक कहते हैं, अम्बेडकरवादी कहते हैं, पेरियारवादी कहते हैं और विद्वान होने के भ्रम में जीते हैं | तो ज्ञान विद्या शास्त्र का हो या शस्त्र का, विद्यार्थी की योग्यता सुनिश्चित करना गुरु का ही दायित्व होता है |

यहाँ एक उदारहण और देता हूँ | भारत में हस्तशिल्प व हथकरघा उद्योग अपने चरम पर था | देश-विदेश में भारतीय शिल्पकला व हथकरघे से बने कपड़ों का व्यापार होता था | भारत के शिल्पकला और वस्त्रउद्योग में और निखार आया जब मध्यएशिया से आने वाले यात्रियों व्यापारियों ने भी अपना योगदान दिया  और उनकी कला कौशल भी इसमें शामिल हो गया | भारत का वस्त्र व शिल्पकला विश्वभर में प्रसिद्ध हो चुका था | लेकिन फिरंगियों ने आकर उस कला को ध्वस्त कर दिया और उसके बाद आये उनके आदर्शों पर चलने वाले भारतीय शासकों ने फिरंगियों की ही नीति को बनाये रखा और भारतीय हाथकरघा उद्योग पूरी तरह ध्वस्त कर दिया | कई शिल्पकार व बुनकर परिवार भूख व दरिद्रता में जीने के लिए विवश हो गये और अपने पुशतैनी विद्या को तिलांजलि देकर नौकरियों के लिए भटकने लगे |

तो जातिव्यवस्था अभिशाप नहीं, वरदान थी भारत के लिए | जातिव्यवस्था भेदभाव पर आधारित नहीं, गुणवत्ता और योग्यता पर आधारित थी |

लेकिन जैसा कि हमेशा होता है, हर क्षेत्र व समाज में अराजक तत्व पाए जाते हैं | इनका कार्य होता है समाज में अराजकता फैलाना, अपने ही समाज व राष्ट्र को क्षति पहुँचाना | ये भी प्रकृति द्वारा ही दी गयी वह बीमारियाँ हैं, वे जीवाणु या बैक्टीरिया हैं, जो समाज को अधिक सशक्त होने के लिए प्रेरित करती है | जैसे स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में ज्वर होना अर्थात उसके शरीर के भीतरी सुरक्षा तंत्र को अधिक मजबूत करने के लिए प्रकृति द्वारा भेजे गये शत्रु जीवाणुओं से सुरक्षा कोशिकाओं का युद्ध है | इस युद्ध में सुरक्षा तंत्र की जाँच हो जाती है, कमजोर कोशिकाएं मारी जाती हैं और केवल शक्तिशाली कोशिकाएं ही बची रह जाती हैं | समान्यतः ज्वर दो से तीन दिनों में स्वतः ही उतर जाता है | लेकिन कई बार शत्रु पक्ष अधिक बलशाली होता है, तब डॉक्टर या अस्पताल की आवश्यकता पड़ती है | मुझे ज्वर होता है तो सामान्यतः मैं कोई दवा नहीं लेता, केवल गर्म पानी या तुलसी अदरक की बिना दूध वाली चाय लेना पसंद करता हूँ | मुझे न डॉक्टर की आवश्यकता पड़ती है न अस्पताल जाने की | दो तीन दिन में स्वतः ही ठीक हो जाता हूँ |

इसी प्रकार जाति व्यवस्था को कलंकित करने वाले विषाक्त जीवाणु भी पाए जाते हैं | ये वे जीवाणु होते हैं, जिनका जन्म तो उस जाति विशेष में होता अवश्य है, लेकिन गुणधर्म बिलकुल विपरीत होते हैं | न तो ये अपने माता-पिता से आनुवंशिक गुणधर्म प्राप्त कर पाते हैं और न ही उनकी तरह ही योग्य व आत्मनिर्भर हो पाते हैं | ऐसे अयोग्य संताने ऊँच-नीच, भेदभाव आदि का सूत्रपात करते हैं | और इसका भी मनोवैज्ञानिक कारण है | चूँकि वे स्वयं पुश्तैनी योग्यताएं जैसे कला, शौर्य, धैर्य, विनम्रता, सहयोगिता, सेवा आदि नहीं प्राप्त कर पाए, इसलिए वे हीनभावना से ग्रस्त हो जाते हैं | और अपनी हीनता को छुपाने के लिए दूसरों को दबाने या तिरस्कृत करने का कार्य करने लगते हैं | और ऐसे ही कुसंतानो के कारण जातिव्यवस्था में छुआ-छूत, उंच-नीच का समावेश हो गया | आगे चलकर यह भेदभाव और छुआ-छूत अधिक विकृत व वीभत्स होता चला गया | क्योंकि उन अयोग्य संतानों से उत्पन्न संताने अपने ही माता-पिता के विकृत मानसिकता को अनुवांशिक रूप से प्राप्त कर अधिक विकृत मानसिकता के साथ जन्म लेने लगे |

जब यह विकृति समाज को दूषित करने लगी और समाज व राष्ट्र के लिए हानिकारक सिद्ध होने लगी | तब ऋषियों को चिंता होने लगी | उन्हें लगने लगा कि यदि ऐसे ही लोग आपस में भेदभाव करते रहे, तो यह राष्ट्र के लिए घातक होगा, शत्रु देश इस आपसी मनमुटाव का लाभ उठाने का प्रयास करेंगे | इनकी आपसी शत्रुत्ता का लाभ उठाकर राष्ट्र को कमजोर करेंगे | और यह एक गंभीर विनाशक परिणामों को जन्म देगा | इसलिए उन्होंने सामाजिक अनुसंधान व शोध करने आरम्भ किये | आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि ऋषि कोई पंडित-पुरोहित नहीं होते, वे अपने समय के वैज्ञानिक हुआ करते थे | वे प्रयोग करते थे, नए नए ज्ञान प्राप्त करने के लिए देश-विदेश का भ्रमण करते थे | तप करते थे, योग करते थे…यानि प्रत्येक ऋषि अपनी अपनी जगह मौलिक हुआ करते थे, न कि दूसरे की कार्बन कॉपी |

तो अपने शोध व अनुसंधान से उन्होंने जाना कि मनुष्य किसी भी जाति या योनी का हो, प्रत्येक मनुष्य अपनी मौलिकता के साथ जन्म लेता है | उसकी मौलिकता में अनुवांशिक गुणों का समावेश होता है | यदि उसे सही परवरिश व शिक्षा मिले, तो वह निखर सकता है, समाज व राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है | सभी को एक ही बाड़े में रखना गलत है, अपितु व्यक्ति विशेष की मौलिक रुचियों व स्वभावों को ध्यान में रखकर ही उसे शिक्षा व दिशा दी जानी चाहिए |

उन्होंने जाना कि एक ही परिवार में जन्में चार संतानों में एक ही गुणधर्म हो यह आवश्यक नहीं | उन्होंने जाना कि जातियों व राशियों के आधार पर मनुष्यों का वर्गीकरण किया जाता रहा | लेकिन इनमें भी कुछ त्रुटियाँ हैं | यह आवश्यक नहीं कि क्षत्रिय समाज में जन्मा प्रत्येक व्यक्ति युद्ध व शस्त्र में ही रूचि ले | यह आवश्यक नहीं कि मेष राशी में जन्मा व्यक्ति कुशल योद्धा ही बने | ये व्यापार में अधिक रूचि ले सकते हैं, ये पठन-पाठन में अधिक रूचि ले सकते हैं | ये युद्ध संचालन की जगह अच्छे मैनेजर हो सकते हैं, ये अच्छे सेवक हो सकते हैं | अर्थात जाति या राशी के आधार पर सभी को निश्चित बाड़े में नहीं रखा जा सकता और सभी को विवश नहीं किया जा सकता वह कार्य करने के लिए, जिसे वे करना नहीं चाहते | यदि उनकी रूचि के अनुरूप कार्य उन्हें नहीं मिलता, तो वे न केवल अपना अहित करेंगे, बल्कि जहाँ वे नियुक्त किये गये हैं, उसपर भी अपनी पूरी निष्ठा व  सामर्थ्यानुसार कार्य नहीं कर पायेंगे | वे केवल विवशता में कार्य करेंगे और इसका परिणाम होगा कार्य की गुणवता में कमी | यदि ऐसे लोगों को क्षेत्र रक्षा का दायित्व सौंपा गया, तो ये विश्वाघात कर सकते हैं क्योंकि उनकी रूचि ही नहीं है उस कार्य में जो वे कर रहे हैं |

अतः उन्होंने मानवों के मौलिक रूचि व गुणधर्मों को आधार बनाकर नया वर्गीकरण किया जिसे नाम दिया गया वर्ण-व्यवस्था |

वर्ण-व्यवस्था:

गुरुकुल में छात्र जब पहली बार पहुँचता था, तब छात्र से उसके माता-पिता का नाम पूछा जाता है | केवल यह जान लेने मात्र से कि बच्चे का माता-पिता कौन है, उसके लिए उपयुक्त विद्या का चयन किया जा सकता है |

कई बार ऐसा भी होता है कि किसी गुरु के पास ऐसा छात्र विद्याध्यन के लिए पहुँचता है, जिसे अपने माता-पिता का नाम नहीं पता होता था | तब गुरु उसके आचरण, व्यवहार आदि को परखता था कुछ दिनों, उस छात्र को गुरु की सेवा में रहना होता था | गुरु विभिन्न प्रकार से उसके धैर्य, लगन व निष्ठा के साथ बुद्धि व विनम्रता की परीक्षा लेता था | उसके बाद वह जिस योग्य होता था उसी के अनुरूप उसे शिक्षा दी जाती थी और उसका वर्ण निर्धारित किया जाता था | मनुस्मृति 10/64 के अनुसार:

“शूद्रो ब्राह्मणतां एति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।

क्षत्रियाज्जातं एवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ।।”

अर्थात् शूद्र कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय के समान गुण, कर्म स्वभाव वाला हो, तो वह शूद्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। वैसे ही जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कुल में उत्पन्न हुआ हो, उसके गुण व कर्म शूद्र के समान हो, तो वह शूद्र हो जाता है, वैसे ही क्षत्रिय या वैश्य कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण व शूद्र के समान होने पर, ब्राह्मण व शूद्र हो जाता है।

ऋग्वेद में भी वर्ण विभाजन का आधार कर्म ही है। निःसन्देह गुणों और कर्मो का प्रभाव इतना प्रबल होता है कि वह सहज ही वर्ण परिवर्तन कर देता है; यथा विश्वामित्र जन्मना क्षत्रिय थे, लेकिन उनके कर्मो और गुणों ने उन्हें ब्राह्मण की पदवी दी। राजा युधिष्ठिर ने नहुष से ब्राह्मण के गुण – यथा, दान, क्षमा, दया, शील चरित्र आदि बताए। उनके अनुसार यदि कोई शूद्र वर्ण का व्यक्ति इन उत्कृष्ट गुणों से युक्त हो तो वह ब्राह्मण माना जाएगा।

उपरोक्त उदारहण यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं कि मात्र किसी जाति विशेष में जन्म लेने से ही कोई ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं हो जाता | और मेरी मान्यता यह है कि वर्णव्यवस्था में कोई श्रेष्ठ या निकृष्ट नहीं माना गया | ये केवल मानव जाति में व्यक्तियों के रूचि व गुणधर्मानुसार वर्गीकरण मात्र है | वर्णव्यवस्था न तो कर्म पर आधारित थी और न ही जन्म पर, अपितु योग्यता पर आधारित थी | इस व्यवस्था की आवश्यकता क्यों पड़ी यह समझना आवश्यक है |

वर्ण-व्यवस्था कर्म या जन्म पर आधारित नहीं थी

मैं ऐसा क्यों मानता हूँ कि वर्ण-व्यवस्था कर्म या जन्म पर आधारित नहीं थी वह भी यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ | जाति-व्यवस्था अवश्य आनुवांशिकता पर आधारित हो गयी थी | अर्थात यदि कुम्हार की संतान तो वह कुम्हार ही कहलाता था और उसका कारण भी था कि कुम्हार की संतान अपने पिता द्वारा अपनए गये जीविकोपार्जन की विद्या आसानी से सीख लेता था और उसे ही अपनी आजीविका बनाता था | लेकिन वर्ण-व्यवस्था में ऐसा नहीं होता था |

पिता द्वारा अपनाये गये जीविकोपार्जन की विद्या से पृथक कोई दूसरी विद्या के प्रति किसी संतान की रूचि हो सकती थी | और वह दूसरी विद्या से प्राप्त ज्ञान से अपना कर्म क्षेत्र निर्धारित करता था | आगे चलकर वह उसी कर्मक्षेत्र से जीविकोपार्जन करने लगता था | जैसे कोई पुरोहित समाज में जन्म लिया, वह संगीतकार बन गया | लेकिन एक संगीतकार होना उसकी रूचि है, उससे उसे सुख व संतुष्टि मिलती है | उसमें उसे आय कम हो तब भी वह सुखी व संतुष्ट रहेगा | और जब उसे अपनी रूचि के कार्य से आय होने लगती है, तब वह धन के लोभ में नहीं पड़ता, केवल अपनी संगीत साधना को महत्व देता है | उसकी सुबह और शाम संगीत के चिन्तन में ही रहता है | वह दूसरों के धन वैभव से न तो आकर्षित होता है और न ही ईर्ष्या करता है | वह संतुष्ट रहता है अपने जीवन से, चाहे लोग उसे दरिद्र समझें | लेकिन वह वास्तव में धनपशुओं से अधिक समृद्ध व सुखी होता है |

इसीलिए मैं कर्म पर आधारित नहीं मानता वर्ण व्यवस्था को अपितु यह मानता हूँ कि जन्मजात स्वभाव व रूचि पर आधारित जिस भाव में वह जी रहा है, वही उसका वर्ण है | और वही रूचि उसकी आजीविका भी बन सकती है और केवल आत्मसंतुष्टि देने वाली रूचि भी | वह कोई अन्य कार्य अपना सकता है आजीविका के लिए, लेकिन एकांत में अपने मौलिक गुण व स्वभाव में ही जीना चाहेगा | और ऋषियों ने इसी को प्रमुखता दी वर्ण भेद करने में | क्योंकि यह व्यक्ति का वह मौलिक गुण है, जो वह अपने साथ ही लेकर आया है | यदि इसको आधार बनाकर उसे कार्य सौंपा जाए तो वह लोभ में नहीं फंसेगा, वह राष्ट्र के साथ विश्वासघात नहीं करेगा | क्योंकि वह भीतर से ही समर्पित होगा अपने कार्य व दायित्व के प्रति |

तो जन्म को प्राथमिकता नहीं दी गयी वर्ण-व्यवस्था में, बल्कि व्यक्ति के मौलिकता को महत्व दिया गया | गुरुकुल में ऋषि अपने अनुभवों व तपोबल से यह जान लेते थे कि किस विद्यार्थी की मौलिकता क्या है | वे विद्यार्थी के भीतर ही छुपे गुण-धर्म को खोजते, उन्हें निखारते और फिर समाज को एक योग्य व्यक्ति प्रदान करते थे | इसीलिए ही गुरुओं का महत्व रहा, गुरु वन्दनीय हो गये क्योंकि वह बच्चों के भीतर छुपी प्रतिभा खोज निकालते थे | उन्हें सोना और पीतल का अंतर पता होता था | वे पीतल में सोने का पानी नहीं चढ़ाते थे आधुनिक शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों की तरह | बल्कि सोना को कुंदन बना देते थे अपनी ताप से | वे कोयले की खान से हीरा खोज निकालते थे…जैसे आचार्य चाणक्य ने खोज निकाला था महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को एक दरिद्र गाँव से |

तो वर्ण-व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य था राष्ट्र व समाज को सुव्यस्थित करना और जो जिस योग्य है, जिसमें उसकी रूचि है, उसी रूचि व योग्यतानुसार उसे कार्य या दायित्व सौंपना | इससे व्यक्ति को अपना कार्य या दायित्व बोझ भी नहीं लगेगा और वह अपनी पूरी निष्ठा व समर्पण भाव से उसे निभाएगा भी | वह अपने दायित्व को बोझ की तरह नहीं ढोयेगा, केवल वेतन प्राप्त करने के उद्देश्य से शारीरिक उपस्थिति नहीं दिखाएगा, बल्कि मानसिक रूप से भी वह वहीं उपस्थित होगा |

वर्ण-व्यवस्था के अभाव में विकृत होता वर्तमान समाज

आज भी अन्तराष्ट्रीय संस्थानों व सेवाप्रदाता कार्यालयों में मनोचिकित्सक नियुक्त किये जाते हैं | जिनका कार्य होता है कर्मचारियों पर नजर रखना | यदि कोई अपने कार्य के प्रति अरुचि दिखा रहा है, या बहुत अधिक थका हुआ सा दिख रहा है, बेचैन दिख रहा है…उसे अपने केबिन में बुलाकर उसकी समस्याएँ सुनता है | यह जानने का प्रयास किया जाता है कि कहीं अधिकारी ने उसे उसकी रूचि के अनुसार कार्य सौंप दिया हो, जिससे वह असंतुष्ट है | उसे सही सलाह दी जाती है और आवश्यक हुआ तो उसका स्थानान्तरण करवा दिया जाता है | यही कारण है कि आपको निजी संस्थाओं में चहकते, उछलते कूदते कर्मचारी मिलते हैं | जबकि सरकारी कार्यालयों में ऊँघते, मुरझाये हुए चेहरे नजर आते हैं |

सरकारी कार्यालयों में योग्यता व रूचि को प्राथमिकता नहीं दी जाती, अपितु केवल डिग्री व आरक्षण को महत्व दिया जाता है | न तो डिप्लोमा या डिग्री किसी की मौलिक गुणवत्ता व रूचि का कोई ठोस प्रमाण है और न ही आरक्षण प्रमाण है व्यावहारिक गुणवत्ता या रूचि का | और चूँकि सरकारी संस्थानों में दोनों ही पक्ष केवल धन व आजीविका को महत्व दिया जाता है, न कि मौलिक रूचि व गुणों को, इसलिए सरकारी संस्थानों में रिश्वतखोरों व विश्वासघातियों की भरमार है | स्थिति इतनी बिगड़ चुकी ही आज कि जज, अधिकारी व मंत्री तक बिक जाते हैं चंद रुपयों में | क्योंकि वे वहां धन कमाने पहुंचे हैं राष्ट्र या समाज के हित के लिए नहीं | उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि राष्ट्र का बेड़ागर्क हो रहा है या समाज का | उन्हें कोई फर्क नहीं पता कि किसी को न्याय मिल रहा है या नहीं…उन्हें तो केवल धन बटोरना होता है | और धनवर्षा करने वाले पद को प्राप्त करने के लिए ही उसने डिग्रियाँ प्राप्त की थी | डिग्री प्राप्त करने के लिए उसके परिवार को अपनी जमीन भी बेचनी पड़ी तो बेचीं होगी, गहने गिरवी रखने होंगे तो रखे होंगे, नेताओं, अधिकारीयों के पैर पकड़ने होंगे तो पकड़े होंगे | और इतना सब करने के बाद वे धन न कमायें यह तो मूर्खता ही होगी | फिर धन कमाने के लिए अपना जमीर भी बेचना पड़े तो बेचेंगे |

आज जो ब्राहमण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र कहते हैं स्वयं, क्या वे वास्तव में वर्ण व्यवस्था पर ही आधारित हैं ?

बिलकुल नहीं ! ये वर्णव्यवस्था पर नहीं, जाति-व्यवस्था पर आधारित हैं | चूँकि वर्ण व्यवस्था को श्रेष्ठ माना गया और राजकीय कर्मचारियों के चुनाव में वर्णव्यवस्था को अधिकारिक रूप से प्रमुखता दी गयी, इसलिए समाज का रुझान जातियों से हटकर, वर्णव्यवस्था के चार वर्णों पर टिक गया | वर्ण व्यवस्था द्वारा चुने गये लोग सम्मानित माने जाने लगे क्योंकि उन्हें राजदरबार से लेकर समाज तक में विशेष सम्मान प्राप्त होने लगा था | वह सम्मान उनके कर्तव्यनिष्ठा व समर्पण भाव के कारण था | वे अपने वचनों के प्रति बहुत सचेत रहते थे, न किसी को मिथ्या आश्वासन देते थे न किसी का अहित सोचते थे | इसलिए उनके वचन या शपथ पर लोग आँख मूंदकर विश्वास करते थे | और वे अपने वचनों व कर्तव्यों के प्रति इतने निष्ठावान थे कि चाहे प्राण चली जाए, वे न अपने वचन से मुकरते थे और न ही अपने दायित्वों से विश्वासघात करते थे | फिर चाहे वे ब्राहमण हों या क्षत्रिय या वैश्य या शूद्र (सेवक) |

तो उनको प्राप्त मान-सम्मान सभी को आकर्षित करता था और स्वाभाविक रूप से आस-पड़ोस के लोग ब्राह्मण के पुत्र को ब्राह्मण ही पुकारते थे क्योंकि वह पुत्र भी अपने माता-पिता की तरह ही विश्वसनीय व कर्त्तव्यनिष्ठ होगा यही धारणा होती थी | लेकिन यही मान्यता आगे चलकर घातक सिद्ध हुई | अब परम्परा चल पड़ी कि ब्राह्मण का बेटा चाहे मिथ्यावादी हो, चाहे व्यभिचारी हो, चाहे चोरी-चकारी करता हो, चाहे दूसरों की भूमि हड़पता हो, दूसरों की संपत्ति, स्त्री हड़पता हो, वह अपने आपको ब्राह्मण कहने लगा | अपने नाम के आगे पिता को प्राप्त उपाधि लगाने लगा | जैसे जिसने एक ही वेद का अध्ययन किया, उसकी व्याख्या में दक्षता प्राप्त की उसे वेदी की उपाधि मिली | जिसने दो वेदों में दक्षता प्राप्त की उसे द्विवेदी इसी प्रकार क्रमशः…त्रिवेदी, चतुर्वेदी की उपाधि बनी | अब पिता का मोह व और संतानों का स्वार्थ अपने पिता को मिली उपाधि अपने साथ लगाने लगे | फिर चाहे उनमें ब्राहमणों वाले कोई गुणधर्म न हों, वे ब्राहमण कहलाने लगे और स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ घोषित करने लगे |

इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था पुनः जातिव्यवस्था में रूपांतरित हो गयी | अब जो ब्राहमण आपको दिखाई देते हैं वे वास्तविक ब्राहमण नहीं, जातिगत ब्राह्मण हैं अर्थात जन्मना ब्राहमण | इनके स्वभाव, गुणधर्म व कर्म ब्राह्मणों से बिलकुल भिन्न मिलेंगे | ये दुनिया भर का झूठ बोलते मिलेंगे, अभद्र व अश्लील भाषा का प्रयोग करते मिलेंगे, माँ-बहनों का मौखिक बलात्कार करते मिलेंगे | आप यदि सोशल मिडिया में एक्टिव हैं तो आप पाएंगे कि जितने भी ब्राह्मण बने फिर रहे हैं, उनमें कोई इक्का दुक्का ही मिलेगा जो अभद्र भाषा का प्रयोग न करता हो | अधिकांश तो सामान्य भाषा में, सामान्य विरोध व्यक्त करने के लिए माँ-बहनों का मौखिक बलात्कार करने से नहीं चूकते |

अतः वर्ण और जाति का अंतर पर अवश्य ध्यान दें | जाती से कोई भी कुछ भी हो सकता है, लेकिन वर्ण से कोई भी कुछ भी नहीं हो सकता | उसके लिए उसका अपना आचरण, अपना व्यवहार, दूसरों के प्रति सहयोगिता का भाव…बहुत कुछ ध्यान में रखना होता है | पूर्वजों के नाम या उपाधि पर श्रेष्ठ बने लोगों की स्थिति मनुस्मृति के अनुसार उस पशु के समान है, जो दूसरों का उगला (उलटी किया हुआ) जूठन खाकर पलता है |

~विशुद्ध चैतन्य

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