बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो…..

नज़र वो जो दुश्मन पे भी महरबाँ हो -२
ज़ुबाँ वो जो इक प्यार की दास्ताँ हो

किसी ने कहा है मेरे दोस्तो -२
बुरा मत सुनो बुरा मत देखो बुरा मत कहो
किसी ने कहा है मेरे दोस्तो
बुरा मत सुनो बुरा मत देखो बुरा मत कहो
बुरी है बुराई मेरे दोस्तो
बुरा मत सुनो बुरा मत देखो बुरा मत कहो -२

ज़माने में सब ज़िंदगी यूँ गुज़ारें -२
गुलिस्ताँ में रहती हैं जैसे बहारें
ये कहानी यही है ज़िंदगानी यही है -२
जियो आप औरों को भी जीने दो
बुरा मत सुनो बुरा मत देखो बुरा मत कहो -२

१९६९-७०, आया सावन झुमके, लक्ष्मी-प्यारे का संगीत, आनंद बक्शी के बोल और रफ़ी साहब की दिल की गहराई तक उतर जाने वाली आवाज़ | धर्मेन्द्र का अभिनय…. क्या आप नहीं चाहेंगे कि इस गीत के भाव में एक बार फिर से डूब जायें ?

यह पैंतालिस साल पहले की कल्पना थी फिल्म जगत वालों की | स्वप्न था उनका जिन्होंने सोचा था कि स्वतंत्र भारत जल्दी ही वह राष्ट्र बन जाएगा जिसके लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी आहुति | लेकिन क्या आज स्थिति वैसी ही जैसी हमारे बलिदानियों ने कल्पना की थी ?

सौ वर्षों से बोया जा रहा नफ़रत के बीजों ने आज वृक्ष का रूप ले लिया है | कुछ लोग नफरत बोने में लगे रहे, और कुछ लोग पढ़ाते रहे, “बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो…..”

आत्मज्ञानियों, उपदेशकों, साधू-संतों ने आँखें बंद रखने को महानता से जोड़ दिया | खुद भी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर छुपाये बैठे रहे और दूसरों के आँखों में भी मोक्ष और स्वर्ग के रंगीन चश्में पहना दिए | हर किसी ने रट लिया कि यह संसार तो माया है, सार तो संसार छोड़ने वालों ने ही पाया है | हर किसी ने स्वर्ग की बुकिंग करवाने के लिए वर्तमान जीवन को कागज़ के टुकड़े बटोरने वाली मशीन में बदल दिया | हर कोई धार्मिक हो गया और मानवता भूल गया | हर कोई आंख्ने बंद करे घूम रहा है, न कोई गलत देख पा रहा है और न ही कोई सुन पा रहा है | सारी नैतिकता कमर के नीचे ही सिमट कर रह गयी और कोई यही देखने में लगा है कि कौन किस स्त्री या पुरुष से मिल रहा है या सम्बन्ध रख रहा है….बस यही एकमात्र अनैतिकता रह गई और वह जो प्राकृतिक हैं वह अब अनैतिक है | लेकिन जो अप्राकृतिक हैं, वे सब नैतिक हो गये जैसे; भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, घोटालेबाजी, बलात्-भमि अधिग्रहण, दहेज़-हत्या, शिक्षा का व्यवसायीकरण, श्रृद्धा व विश्वास का व्यवसायीकरण राजनीतिकरण धर्म और कर्म-कांडों के नाम |

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बजरंग दल की लड़कियां शस्त्र विद्या का प्रदर्शन करती हुईं

पता चला कि ‘इस्लाम मुक्त भारत’ अभियान चलाएगी हिंदू महासभा का यह फैसला ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से हिंदू धर्म के बढ़ते प्रभाव से निपटने के लिए आंदोलन की तैयारी करने के प्रस्‍ताव के जवाब में आया है। हिंदू महासभा ने २२ जून को लखनऊ में हुई कार्यकारिणी की मीटिंग में अपने इस एजेंडे पर मुहर लगा दी है।

अब वापस चलिए और आजादी से पहले की स्थिति पर एक नजर घुमाइए | आप पाएंगे कि यही सब तब भी चल रहा था | और परिणाम सामने आया लाखों निर्दोषों की हत्या और खंडित भारत के रूप में | ये लोग तब भी देशहित में कोई कार्य नहीं कर रहे थे और आज भी नहीं | ये लोग तब भी अपने अपने दड़बों को देश व नागरिकों से अधिक महत्व दे रहे थे और आज भी | ये लोग तब भी अपने धर्मों के कम्बलों में मुँह छुपाये राष्ट्रभक्ति का ढोंग कर रहे थे और आज भी | लेकिन क्या आम जनता आपस में कोई द्वेष रखती है ?

मुस्लिम लडकियाँ मार्शल आर्ट्स का प्रदर्शन करती हुईं

शायद नहीं ! मैं शायद यह बात इसलिए नहीं मानूंगा क्योंकि मैंने कभी किसी दूसरे मत या सम्प्रदाय के परिवार से कुछ असामान्य अपने लिए नहीं पाया | हम तो साथ ही ईद मनाते, क्रिसमस मनाते, दीवाली और होली मनाते…. कभी कोई भेद दिखा ही नहीं | लेकिन जो भेद-भाव देखने को मिला मुझे वह इस फेसबुकी दुनिया में ही देखने को मिला | दंगे देखे टीवी में, आतंकवादी हमले देखे टीवी में….लेकिन मेरे लिए वह सब देशद्रोहियों द्वारा रचे गये षड्यंत्रों के सिवाय कुछ और नहीं था | लेकिन धीरे धीरे अब समझ में आ रहा है कि ये लोग बहुत हद तक कामयाब हो चुके हैं दूसरे १९४७ के लिए | फिर से देश खंडित होगा, फिर से लाखों लाशें गिरेंगी… और फिर से एक भारत का बचा हुआ टुकड़ा खड़ा होने का प्रयास करेगा |

किसानों ने लालच और गरीबी में अपने अपने खेत बेचकर अपने आप को अपाहिज बना लिया | अब मजदूरी कर रहे हैं कहीं और कल नौकरी भी नहीं रहेगी तब फिर से याकूब जैसे लोग पैदा हो जायेंगे | अपनी भूख मिटाने के लिए निर्दोषों को मारेंगे……. निर्दोष ?

कौन निर्दोष ? क्या जो इन आतंकवादियों, धार्मिक उन्मादियों के हाथों मारे जाते हैं वे निर्दोष हैं ? अरे मैं भी कितना मुर्ख हूँ !

मैं सुखी तो जग सुखी के सिद्धांत पर जीने वालों का यही हश्र होना ही चाहिए | मतलबपरस्त जनसँख्या को ध्वस्त होना ही चाहिए | इनको पिज़्ज़ा खाने से मतलब है, बर्गर खाने से मतलब है, चाइनीज़ सामानों ने मतलब है, अंग्रेजी बोलने और विदेश में सेटल होने से मतलब है…. इनको भारत से क्या लेना देना ? ‪#‎Proud_to_be_Indian‬ कहने वाले ये लोग केवल अपनी चिंता में घुले जाते हैं | इनको चिंता नहीं भविष्य के भारत की | ऐसे लोग निर्दोष कैसे हो सकते हैं ?

प्रकृति का सिद्धांत है, जो स्वयं के लिए जीता है वह भोज्यपदार्थो में गिना जाता है और उनकी संख्या हमेशा अधिक होती है | उनकी प्रजनन क्षमता हमेशा अधिक होती है… जैसे अनाज, मछली, चूहे आदि | ये सभी के लिए मात्र भोज्य पदार्थ है हैं यह प्रकृति ने तय किया है | वहीँ शेर, अजगर हाथी आदि बहुत ही कम बच्चे पैदा करते हैं क्योंकि यदि वे अधिक बच्चे करेंगे तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा | मक्खियाँ, मच्छर आदि भी ढेरों बच्चे देते हैं… लेकिन उनकी आयु बहुत ही सीमित होती है | तो इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रकृति ने स्वयं ही कुछ नियम तय कर दिए |

अब यदि हम देखें कि मारे वही लोग जाते हैं, जो मैं सुखी तो जग सुखी के सिद्धांत पर जीते हैं | जिन्होंने गांधी जी के बंदरों की तरह आँख, कान मुँह बंद कर रखे हैं | जो मरने से डरते हैं | जो कबाड़ इकठ्ठा करने, स्वर्ग और मोक्ष के सपने देखने में जीवन व्यतीत कर देते हैं | ऐसे लोग निर्दोष कैसे कहे जा सकते हैं | जो गलत का साथ दे, जो गलत का समर्थन न करते हुए भी विरोध न व्यक्त करे, वे निर्दोष कैसे हो सकते हैं ? ऐसे लोग ही भेड़-बकरियों का जीवन जीते हैं और भेड़-चाल में चलते हैं | ये लोग ध्यान की बातें करते हैं, ब्रह्म की बातें करते हैं लेकिन सब किताबी…. क्योंकि जिसने ध्यान की गहराई में एक बार भी दुबकी लगा ली, वह सम्पूर्ण सृष्टि को स्वयं के भीतर पाता है | कहीं भी कुछ गलत हो, तुरंत प्रतिकार करता है | उसके भीतर से भय मिट जाता है क्योंकि वह सत्य को समझ चुका होता है |

बजरंग दल

कितने आश्चर्य की बात है कई देश में अराजकता फैलाने वाले लोग निडर व साहसी हैं, लेकिन खुद को आस्तिक व ईश्वर को सत्य बताने वाले शराफत नाम के कम्बल में अपनी कायरता को छुपाये घूम रहे हैं | क्या आप लोगों को ऐसा नहीं लगता कि अब समय आ गया है गांघी जी के तीन बंदर बने रहने का समाया समाप्त हुआ और अब होशपूर्ण होकर जीने का समय आ गया ? क्या आप लोगों को ऐसा नहीं लगता कि अब तक ये धर्मों के ठेकेदार आप लोगों को मुर्ख बना रहे थे धार्मिकता के नाम पर, जबकि ये लोग केवल आपका शोषण ही कर रहे थे मानसिक व आर्थिक रूप से ?

कभी समय मिले तो विचार कीजियेगा आवश्य ! ऐसे विद्यालय की स्थापना होनी चाहिए, जहाँ शस्त्र विद्या प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए और प्रत्येक नागरिक को हथियार रखने का मौलिक अधिकार भी होना चाहिए | ताकि कुछ मुट्ठी-भर लोगों द्वारा पूरे देश को भेड़-बक्ररियों की तरह आतंकित न कर सकें | मरना ही है तो कम से कम लड़ करें | जो ईश्वर भरोसे बैठे हैं कायरता का कम्बल ओढ़े या जो मैं सुखी तो जग सुखी के सिद्धांत पर जी रहे हैं, वे वैसे भी मेरी बातों को महत्व नहीं देंगे | और न ही उनकी वजह से देश में आने वाली आपदा टल जायेगी | अब बुरा मत सुनो गाने का नहीं, बल्कि हर बुराई पर पैनी नजर रखने का समय आ गया है | ~विशुद्ध चैतन्य

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