सनातन धर्म में साँस लेना अनिवार्य शर्त है…

मैंने कलाम साहब को सनातनी इसलिए नहीं कहा कि वे मंदिरों में जाकर फूल चढ़ाते हैं या साधू संतों से आशीर्वाद लेते हैं… बल्कि इलसिए कहा, क्योंकि उनको व्यवहारिक रूप में सनातन में जीते देखा | वे किसी धर्म या सम्प्रदाय के दड़बे में कैद व्यक्ति नहीं थे | उन्होंने जो कुछ भी किया दिखाने के लिए नहीं किया जैसे राजनेता करते हैं चुनावी मौसम में | यदि वे गीता पढ़ते हैं, क़ुरान पढ़ते हैं तो वह उनका व्यक्तिगत विषय था, वोट लेने के लिए नहीं पढ़ते थे | वे मंदिर भी जाते थे, मस्जिद भी जाते थे, बौद्ध मठों में भी जाते थे, साधू-संतों का सम्मान भी करते थे… तो यह सब वे सत्ता के लोभ से नहीं करते थे…. वह उनका व्यक्तित्व था | जो भी था वह भीतर से था, नेताओं की तरह ओढ़ा हुआ या थोपा हुआ नहीं था |

सनातन धर्म वह धर्म है जो सम्पूर्ण सृष्टि निभाती है और वह भी अपना व्यक्तिगत धर्म को खोये बिना | सनातन धर्म में स्त्री को पुरुष होने की आवश्यकता नहीं होती और न ही पुरुष को पुरुष धर्म छोड़ने की आवश्यता है | सनातन में मांसाहारी को शाकाहारी होने की आवश्यकता नहीं होती और न ही शाकाहारी को माँसाहारी होने की आवश्यकता है | शिकारी को खेती करने की आवश्यकता नहीं और किसान को शिकार करने की आवश्यकता नहीं… सभी के अपने अपने धर्म हैं और अपनी अपनी प्रकृति | जबकि मानव निर्मित धर्मों में जिसे वे ईश्वरीय बताते हैं, उसमें आपको ब्रांडेड होना पड़ता है | जैसा किताब में लिखा है, वैसा होना पड़ता है, आप जो हैं, जैसे हैं उसे मान्यता नहीं दी जाती बल्कि आपको हमेशा दूसरों की तरह होना ही सिखाया जाता है | न आपका समाज और न ही आपके धर्मों के ठेकेदारों को आपके व्यक्तिगत मौलिक गुणों में कोई रूचि होती है | जबकि ईश्वर ने शेर भी बनाया है, सांप भी बनाया, खरगोश भी बनाया है… और सभी उसके प्रिय हैं | सभी का महत्व है इस सृष्टि में और सभी अपना अपना योगदान दे रहे हैं, बिना स्वयं को बदले |

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सनातन धर्म हिन्दू धर्म भी नहीं हैं क्योंकि हिन्दू धर्म भी दूसरों पर थोपा जानेवाला धर्म है | और एक बात यह कि जिस धर्म में लोग सुखी न हों, जिस धर्म में दरिद्रता व शोषण हों, जिस धर्म में कुछ मुट्ठी भर लोग मालिक बनें हों और बाकी सभी गुलाम… वह धर्म सनातन हो ही नहीं सकता |

सौमंडल पर नजर डालें…. सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं, अपनी अपनी मूल गुणधर्म के साथ | कोई किसी पर कोई दबाव नहीं बना रहा कि वह उसकी तरह हो जाए…. सभी के अपने अपने दिन और रात हैं | कहीं भीषण ठण्ड हैं तो कहीं गर्मी… कहीं ज्वालामुखी हैं तो कहीं बर्फ का समंदर……. लेकिन सभी एक दूसरे से आपस में बंधे हुए हैं | इसी प्रकार हम एक गैलेक्सी में हैं और सौ अरब से अधिक गैलेक्सी हैं… सभी आपस में किसी न किसी रूप में बंधे हुए हैं और सभी एक निश्चित दूरी रखते हुए अपनी व्यक्तिगत जीवन जी रहे हैं….. यही सनातन धर्म है |

जब कोई धर्म दूसरे के व्यक्तित्व को मिटाने के सपने देखने लग जाये, जब कोई कहे कि तुम मेरी तरह हो जाओ या फलाने की तरह हो जाओ और अपना मौलिक व्यक्तित्व को खो दो….वह सांप्रदायिक धर्म है, सनातन नहीं | जो धर्म पुस्तकों पर निर्भर हो, व्यवहार में न उभरें… वह धर्म सनातन नहीं हो सकता | जिस धर्म में सर्वाधिक उपद्रव हों, वह सनातन नहीं हो सकता, जिस धर्म में ईश निंदा के नाम पर भी हत्याएं हो जाती हों, वह सनातन नहीं हो सकता | जो धर्म दूसरों की स्वतंत्रता छीनता हो, जो धर्म दूसरों की मौलिकता छीनता हो, वह सनातन धर्म नहीं है | सनातन धर्म में प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों के फल खुद ही भोगने पड़ते हैं…. जैसे सनातन धर्म में साँस लेना अनिवार्य शर्त है…वह आप को न तो सीखने की आवश्यकता है और न ही किताबें पढ़ने या धर्मगुरुओं से दीक्षा लेकर समझने की आवश्यकता है  | अब आप खुद ही बगावत कर दें और कहें कि मुझे साँस नहीं लेना… मैं धर्म परिवर्तन करना चाहता हूँ… .तो परिणाम के आप स्वयं जिम्मेवार होंगे… कोई सजा देने नहीं आएगा आपको |

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आशा है मेरे उत्तर से आप को सनातन धर्म का सही अर्थ पता चल गया होगा | इस्लामिक समाज यदि आईसीस, अलकायदा और आतंकवाद को इस्लाम विरुद्ध मानता है और मानता है कि वे इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं… तो उसका विरोध उतनी ही तीव्रता से होना चाहिए था, जितनी तीव्रता से किसी फिल्म का विरोध होता है, जितनी कट्टरता से किसी ब्लॉगर का विरोध होता है…. बल्कि उससे भी अधिक…. क्योंकि इस्लाम में ईश-निंदा के लिए भी सजाये मौत है, क़ुरान फाड़ने पर भी सजाये मौत है… तो पूरा इस्लाम ही जो चीड़-फाड़ रहे हैं, उनके लिए हमदर्दी क्यों ? ~विशुद्ध चैतन्य

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