महिमामंडित मत करिए नदियों-सरोवरों को

बचपन में एक गीत बहुत पसंद था मुझे, ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ | जब भी गाँव में कोई धार्मिक या वैवाहिक समारोह होता था, तो लाउडस्पीकर मंगवाया जाता और यह गीत अवश्य बजता था और दिन में कई बार बजता था | मैंने कभी गंगा नदी नहीं देखा था पास से, तो मेरे मन यही धारण थी कि यह कोई दैवीय नदी होती होगी, जिसका पानी अमृत होता है | यानि जिसके जल का सेवन करने से व्यक्ति अमर हो जाता है | लेकिन कुछ वर्ष पहले जब मैं हरिद्वार गया, तब मुझे पहली बार गंगा नदी को पास से देखने का अवसर मिला |  उस समय टीवी चैनल के साथ गया था गायत्री परिवार के आश्रम से कोई लाइव दिखाना था | शाम जब अँधेरा हो गया था, तब नदी में नहाने गया, तब तक मुझे गंगा के मैली होने के विषय में कोई विशेष जानकारी नहीं थी |

उसके बाद दोबारा कुछ वर्ष पश्चात् फिर हरिद्वार गया तो उस समय गंगा बहुत ही मैली थी, मैंने साथ गये सज्जन से कारण जानना चाहा, तो उन्होंने बताया कि बारिश हुई थी दो तीन दिन पहले, इसलिए गंगा मैली दिखाई दे रही है | अन्यथा तो बिलकुल निर्मल जल होता है | मैंने वहीँ सीढ़ियों में कूड़ा बिखरा देखा…खैर दर्शन करके वापस आश्रम लौट आया | मेरा उस जल में स्नान का मन नहीं किया | उसके बाद कुम्भ मेला में जाना हुआ इलाहाबाद, तब भी गंगा मैली ही थी | तब तक बहुत जानकारी प्राप्त कर ली थी कि गंगा मैली कैसे हो गयी | मुझे पता था कि शहर का सारा मलबा गंगा में ही बहाया जाता है | इसलिए मेरे लिए गंगा नदी अब कोई पावन पवित्र नहीं रह गयी थी | क्योंकि पापियों ने गंगा मैली कर दी थी अपने पाप धोते धोते और शहर का सारा पाप सीवर लाइन के द्वारा गंगा में उगल कर |

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तो वह गीत जो मेरा प्रिय था कभी, उसके विषय में चिन्तन कर रहा था | वह गीत नीचे दे रहा हूँ, ध्यान से पढ़िए, एक एक पंक्तियों पर ध्यान दीजिये:

(Ganga Tera Pani Amrit -1971)

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गंगा तेरा पानी अमृत, झर-झर बहता जाए
युग-युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए

दूर हिमालय से तू आई गीत सुहाने गाती
बस्ती-बस्ती, जंगल-जंगल सुख-संदेश सुनाती
तेरी चांदी जैसी धारा मीलों तक लहराए

कितने सूरज उभरे डूबे गंगा तेरे द्वारे
युगों-युगों की कथा सुनाएं तेरे बहते धारे
तुझको छोड़ के भारत का इतिहास लिखा न जाए

इस धरती का दुख-सुख तूने अपने बीच समोया
जब-जब देश ग़ुलाम हुआ है तेरा पानी रोया
जब-जब हम आज़ाद हुए हैं तेरे तट मुस्काए

खेतों-खेतों तुझसे जागी धरती पर हरियाली

फसलें तेरा राग अलापें, झूमे बाली बाली

तेरा पानी पी कर मिट्टी, सोने में ढल जाए

तेरे दान की दौलत ऊंचे खलियानों में ढलती

खुशियों के मेले लगते, मेहनत की डाली फलती

लहक लहककर धूम मचाते, तेरी गोद के जाए

गूंज रही है तेरे तट पर नवजीवन की सरगम

तू नदियों का संगम करती, हम खेतों का संगम

यही वो संगम है जो दिल का दिल से मेल कराए

हर हर गंगे कह के दुनिया तेरे आगे झुकती

तुझी से हम सब जीवन पाएं, तुझी से पाएं मुक्ति

तेरी शरण मिले तो मईय्या, जनम सफल जो जाए   

[Lyric : Sahir Ludhiyanvi, Composer : Ravi, Singer ; Md. Rafi, Lata Mangeshkar]

इस गीत को गीतकार ने जिस भाव से लिखा, जो दृश्य दिखाए गंगा के वह अद्भुत है | गीत के बोल ऐसे हैं कि गंगा नदी के प्रति अपार श्रृद्धा उमड़ पड़ती है | ऐसा लगता है कि इससे पावन, पवित्र व जीवनदायी नदी कोई और हो ही नहीं सकती | लेकिन वास्तविकता बिलकुल विपरीत है | हम जिस नदी को माँ कहते हैं, जिसे स्वर्गमयी कहते हैं, पापहरणी, मोक्षदायिनी कहते हैं, उसकी क्या दुर्गत बना दी कभी सोचा है आपने ? क्या यही है हम हिन्दुओं के संस्कार कि जिसे अराध्य व पूजनीय मानते हैं, उसी का सत्यानाश कर दें ?

केवल गंगा ही क्यों, विश्व की सभी नदियाँ जीवनदायिनी हैं, सभी नदियाँ जिस भी क्षेत्र से होकर गुजरती हैं, वहां हरियाली, उत्साह व उमंग भर देती है | लेकिन यह तब तभी, जब नदियाँ अमृत ही रहें, मृत न हो जाएँ | यह सब तभी, जब नदियाँ अमृत ही रहें, विष न बन जाएं |

इसीलिए महिमामंडित मत करिए नदियों-सरोवरों को पवित्र, दैवीय, पूजनीय या राष्ट्रीय बनाकर | क्योंकि हम भारतीयों की मानसिकता कुछ अलग है | हम पवित्र नदियों, सरोवरों में अपने पाप धोते हैं, सारे समाज का, शहर का कूड़ा करकट उसमें फेंकते हैं | हम राष्ट्रीय कहे जाने वाली सभी चीजों को मिटा देना चाहते हैं | हम राष्ट्रीय पशु को लुप्त करने पर तुले हैं, हम राष्ट्रीय पक्षी को लुप्त करने पर तुले हैं, हम राष्ट्रीय पुष्प को लुप्त करने पर तुले हैं…यही है हमारी राष्ट्रभक्ति |

हम पवित्र नदियों में अपने पाप इतनी बुरी तरह धोते हैं कि नदियों का दम घुटने लगता है | नीचे कुछ तस्वीरें दे रहा हूँ | आप देख सकते हैं विदेशी लोग जितना भी पाप करते हैं, वे नदियों में नहीं धोते | इसीलिए उनकी नदियाँ साफ़ सुथरी रहतीं हैं, जबकि हमारी नदियाँ हमारे पाप के बोझ को ढो ही नहीं पा रहीं | नदियों में जगह जगह हमारे पाप बिखरे पड़े हैं और कोई सुध लेने वाला नहीं |

सरकारें हमारे ही पापों को साफ़ करने के नाम पर नदियों की सफाई अभियान चलाकर हमारे ही खून पसीने की करोड़ों रूपये डकार जाती हैं | लेकिन नदियाँ स्वच्छ नहीं हों पातीं | क्योंकि हम भारतीय नदियों में अपने पाप धोने के बाद फिर पाप में लिप्त हो जाते हैं और कुछ ही दिनों में इतने पाप कर लेते हैं कि फिर नदियों में धोने पहुँच जाते हैं |

नदियाँ भी हम पापियों को देखकर अब सिहर उठती हैं | वे भी सोचती होंगी कि दुनिया के बाकी सभी देशों से अधिक पापी भारत में ही क्यों हैं ? क्यों भारतीय इतना पाप करते हैं कि नदियों का ही दम घुटने लगता है पाप के बोझ के तले ?

अतः आप सभी से करबद्ध प्रार्थना है कि अपने पाप अपने ही घर में उपलब्ध जल से धो लें, नदियों में अपने पाप धोने न जाएँ | साथ ही यह भी प्रार्थना है कि जितनी भी पवित्र नदियों की उपाधि प्राप्त नदियाँ हैं, उन्हें पवित्रता से मुक्त करिए | उन्हें अपवित्र ही घोषित कर दीजिये | कम से कम वे अपवित्र रहकर आपके पापों से तो मुक्त रह पायेंगी ?

~विशुद्ध चैतन्य

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