…तुम लोगों को इस बारे में कुछ करना चाहिए. ये तुम्हारे भविष्य की दुनिया का सवाल है.

डॉक्टर कलाम  व उनके सहयोगी श्रीजन पाल सिंह

हम 12 बजे गुवाहाटी के लिए विमान में सवार हुए. उन्होंने गहरे रंग का ‘कलाम सूट’ पहना हुआ था. हम ढाई घंटे की उड़ान के बाद शिलॉन्ग पहुँचे और एयरपोर्ट से कार से आईआईएम पहुँचने में ढाई घंटे और लगे. पाँच घंटे के इस सफ़र के दौरान हमने कई मुद्दों पर बात की.

मैंने पिछले छह सालों के दौरान डॉक्टर कलाम के साथ सैकड़ों यात्राएं की हैं. हर यात्रा की तरह ये भी विशेष थी. इस दौरान हमने तीन ख़ास मुद्दों पर बात की. पंजाब हमले पर दुखी सबसे पहले वो पंजाब में हुए हमले में निर्दोष लोगों की मौत पर बेहद दुखी थे. आईआईएम शिलॉन्ग में उनके भाषण का विषय था, “जीने लायक धरती का निर्माण”. उन्होंने पंजाब की घटना को विषय से जोड़ते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि मनुष्य निर्मित ताक़ते धरती पर जीवन के लिए उतना ही बड़ा ख़तरा हैं जितना प्रदूषण.”

हमने इस बात पर चर्चा की कि यदि हिंसा, प्रदूषण और मनुष्यों की लापरवाहियां यूं ही चलती रहीं, तो कैसे मानवों को धरती छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. उन्होंने कहा, “यदि ऐसा ही चलता रहा तो संभवतः तीस साल लगेंगे..तुम लोगों को इस बारे में कुछ करना चाहिए. ये तुम्हारे भविष्य की दुनिया का सवाल है.”

बातचीत का दूसरा विषय भी एक राष्ट्रीय मुद्दा था. पिछले दो दिनों से डॉक्टर कलाम इस बात को लेकर चिंतित थे कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा संस्थान संसद एक बार फिर काम नहीं कर पा रहा है. उन्होंने कहा, “मैंने अपने कार्यकाल में दो अलग-अलग सरकारें देखीं और उसके बाद भी कई सरकारें देखीं. काम में ये दखल होता ही रहता है. ये सही नहीं है. मुझे कोई ऐसा रास्ता निकालना ही होगा कि संसद विकास की राजनीति पर काम करे.”

इसके बाद उन्होंने मुझसे आईआईएम शिलॉन्ग के छात्रों के लिए एक प्रश्न तैयार करने के लिए कहा. ये उन्हें लेक्चर के बाद दिया जाना था. वे चाहते थे कि छात्र संसद को अधिक उत्पादक और जीवंत बनाने के विषय में सलाह दें. लेकिन कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “मैं उनसे कोई हल सुझाने के लिए कैसे कह सकता हूँ जब स्वयं मेरे पास कोई हल ना हो.”

उनकी तीसरी याद बेहद मानवीय है. हम 6-7 कारों के काफ़िले में सफ़र कर रहे थे. डॉक्टर कलाम और मैं तीसरी कार में बैठे थे. हमारे आगे एक खुली जीप थी जिसमें तीन जवान थे. दो जवान दोनों सिरों पर बैठे थे और तीसरा अपनी बंदूक तानें ऊपर खड़ा था. एक घंटे के सफ़र के बाद डॉक्टर कलाम ने पूछा- ‘वो खड़ा क्यों हैं. थक जाएगा. ये सज़ा देने जैसा है. क्या तुम वॉयरलैस पर ये संदेश दे सकते हो कि उसे बैठने के लिए कह दिया जाए.’ मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि उसे सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खड़े रहने के निर्देश दिए गए हैं. लेकिन वो नहीं माने. हमने संदेश भिजवाया लेकिन वो जवान फिर भी खड़ा रहा.

अगले डेढ़ घंटे की यात्रा के दौरान उन्होंने मुझे तीन बार याद दिलाया कि मैं हाथ का इशारा करके उससे बैठने के लिए कहूं. लेकिन अंततः उन्हें लग गया कि इस बारे में हम कुछ नहीं कर सकते और उन्होंने कहा कि मैं उससे मिलना चाहता हूँ और शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ. जब हम आईआईएम शिलॉन्ग पहुँचे तो मैंने सुरक्षा अधिकारियों से उस जवान के बारे में पूछा. जब वो मुझे मिल गया तो मैं उसे अंदर ले गया. डॉक्टर कलाम ने उसका हाथ मिलाकर अभिवादन किया और शुक्रिया कहते हुए पूछा कि तुम थक तो नहीं गए हो, क्या तुम कुछ खाना चाहोगे. डॉक्टर कलाम ने उससे कहा, “मैं माफ़ी चाहता हूँ मेरी वजह से तुम्हें इतनी देर खड़ा रहना पड़ा.” उस जवान ने बस इतना ही कहा, “सर आपके लिए तो छह घंटे भी खड़े रहेंगे.”


इसके बाद हम लेक्चर हॉल में पहुँचे. वो लेक्चर के लिए लेट नहीं होना चाहते थे.

उन्होंने कहा, “छात्रों से कभी इंतेज़ार नहीं करवाना चाहिए.” मैंने जल्दी से उनका माइक सेट किया, लेक्चर के अंतिम रूप के बारे में ब्रीफ़ किया और कंप्यूटर पर आ गया. जब मैं उनका माइक लगा रहा था तो उन्होंने हँसकर कहा, “फ़नी गॉय, क्या तुम ठीक हो. मैंने मुस्कराते हुए कहा, “हाँ.” वो उनके अंतिम शब्द थे.

भाषण शुरू होने में दो मिनट थे. मैं उनके पीछे बैठा था. एक लंबी ख़ामोशी के बाद मैंने उन्हें देखा, वो नीचे गिर गए. हमने उन्हें उठाया, जब तक डॉक्टर पहुँचते हमने वो सबकुछ किया जो हम कर सकते थे. मैं उनकी तीन-चौथाई बंद आँखों को कभी नहीं भूल सकता. मैंने एक हाथ से उनका सिर संभाला और उन्हें होश में लाने की हर संभव कोशिश की. उनके हाथ जकड़े और मेरी उंगली में फँस गए. उनका चेहरा स्थिर था और उनकी सुलझी हुई अचल आँखों से ज्ञान का प्रकाश निकल रहा था. उन्होंने एक भी शब्द नहीं कहा. न ही कोई दर्द प्रदर्शित किया. सिर्फ़ उनका मक़सद साफ़ झलक रहा था. पाँच मिनट के भीतर हम नज़दीकी अस्पताल में थे. अगले कुछ मिनटों में उन्होंने बता दिया कि मिसाइलमैन उड़ गया है, हमेशा के लिए. मैंने एक और अंतिम बार उनके पैर छुए.

डॉक्टर कलाम के सहयोगी श्रीजन पाल सिंह ने उनके अंतिम दिन का ब्यौरा अपने फ़ेसबुक पन्ने पर पोस्ट किया है. यह उसका अनुवादित अंश था | इसके अलावा कुछ और महत्वपूर्ण घटनाएँ जो उनके महान व्यक्तित्व व मानवतावादिता को स्पष्ट करती है | कलाम साहब को एक सच्चे सनातनी (सेक्युलर) व राष्ट्रभक्त कहने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए |

जब साल 2005 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ भारत आए तो वो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ-साथ राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से भी मिले. मुलाक़ात से एक दिन पहले कलाम के सचिव पीके नायर उनके पास ब्रीफ़िंग के लिए गए. पीके नायर ने बताया, ”सर कल मुशर्ऱफ़ आपसे मिलने आ रहे हैं.” उन्होंने जवाब दिया, ”हां मुझे पता है.” नायर ने कहा, ”वो ज़रूर कश्मीर का मुद्दा उठाएंगे. आपको इसके लिए तैयार रहना चाहिए.” कलाम एक क्षण के लिए ठिठके, उनकी तरफ़ देखा और कहा, ”उसकी चिंता मत करो. मैं सब संभाल लूंगा.”

तीस मिनट की मुलाक़ात

अगले दिन ठीक सात बज कर तीस मिनट पर परवेज़ मुशर्रफ़ अपने क़ाफ़िले के साथ राष्ट्रपति भवन पहुंचे. उन्हें पहली मंज़िल पर नॉर्थ ड्राइंग रूम में ले जाया गया. कलाम ने उनका स्वागत किया. उनकी कुर्सी तक गए और उनकी बग़ल में बैठे. मुलाक़ात का वक़्त तीस मिनट तय था.

कलाम ने बोलना शुरू किया, ”राष्ट्रपति महोदय, भारत की तरह आपके यहाँ भी बहुत से ग्रामीण इलाक़े होंगे. आपको नहीं लगता कि हमें उनके विकास के लिए जो कुछ संभव हो करना चाहिए?”

जनरल मुशर्रफ़ हाँ के अलावा और क्या कह सकते थे. कलाम ने आगे कहना शुरू किया, ”मैं आपको संक्षेप में ‘पूरा’ के बारे में बताउंगा. पूरा का मतलब है प्रोवाइंडिंग अर्बन फ़ैसेलिटीज़ टू रूरल एरियाज़.” पीछे लगी प्लाज़मा स्क्रीन पर हरकत हुई और कलाम ने अगले 26 मिनट तक मुशर्रफ़ को लेक्चर दिया कि ‘पूरा’ का क्या मतलब है और अगले 20 सालों में दोनों देश इसे किस तरह हासिल कर सकते हैं. तीस मिनट बाद मुशर्रफ़ ने कहा, ”धन्यवाद राष्ट्रपति महोदय. भारत भाग्यशाली है कि उसके पास आप जैसा एक वैज्ञानिक राष्ट्रपति है.” हाथ मिलाए गए और नायर ने अपनी डायरी में लिखा, ”कलाम ने आज दिखाया कि वैज्ञानिक भी कूटनीतिक हो सकते हैं.”

तीन लाख बावन हज़ार रुपए

मई 2006 में राष्ट्रपति कलाम का सारा परिवार उनसे मिलने दिल्ली आया. कुल मिला कर 52 लोग थे. उनके 90 साल के बड़े भाई से ले कर उनकी डेढ़ साल की परपोती भी. ये लोग आठ दिन तक राष्ट्रपति भवन में रुके. अजमेर शरीफ़ भी गए. कलाम ने उनके रुकने का किराया अपनी जेब से दिया. यहाँ तक कि एक प्याली चाय तक का भी हिसाब रखा गया और उनके जाने के बाद कलाम ने अपने अकाउंट से तीन लाख बावन हज़ार रुपए का चेक काट कर राष्ट्रपति कार्यालय को भेजा.

उनके राष्ट्रपति रहते ये बात किसी को पता नहीं चली. बाद में जब उनके सचिव नायर ने उनके साथ बिताए गए दिनों पर किताब लिखी, तो पहली बार इसका ज़िक्र किया. इफ़्तार का पैसा अनाथालय को इसी तरह नवंबर 2002 में रमज़ान के महीने में कलाम ने अपने सचिव को बुला कर पूछा, ”ये बताइए कि हम इफ़्तार भोज का आयोजन क्यों करें? वैसे भी यहां आमंत्रित लोग खाते-पीते लोग होते हैं. आप इफ़्तार पर कितना ख़र्च करते हैं?” राष्ट्रपति भवन के आतिथ्य विभाग के प्रमुख को फ़ोन लगाया गया. उन्होंने बताया कि इफ़्तार भोज पर मोटे तौर पर ढ़ाई लाख रुपए का ख़र्च आता है. कलाम ने कहा, ”हम ये पैसा अनाथालयों को क्यों नहीं दे सकते? आप अनाथालयों को चुनिए और ये सुनिश्चित करिए कि ये पैसा बर्बाद न जाए.” राष्ट्रपति भवन की ओर से इफ़्तार के लिए निर्धारित राशि से आटे, दाल, कंबल और स्वेटर का इंतेज़ाम किया गया और उसे 28 अनाथालयों के बच्चों में बांटा गया.

लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हो गई. कलाम ने नायर से कहा, ”ये सामान तो आपने सरकार के पैसे से ख़रीदवाया है. इसमें मेरा योगदान क्या हुआ? मैं आपको एक लाख रुपए का चेक दे रहा हूँ. उसका भी उसी तरह इस्तेमाल करिए जैसे आपने इफ़्तार के लिए निर्धारित पैसे का किया है, लेकिन किसी को ये मत बताइए कि ये पैसे मैंने दिए हैं.”

बारिश ने भी कलाम का ख़्याल रखा

राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भारत के सबसे सक्रिय राष्ट्रपति थे. अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने 175 दौरे किए. इनमें से सिर्फ़ सात विदेशी दौरे थे. वो लक्ष्यद्वीप को छोड़ कर भारत के हर राज्य में गए. 15 अगस्त 2003 को कलाम ने स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर शाम को राष्ट्रपति भवन के लॉन में हमेशा की तरह एक चाय पार्टी का आयोजन किया. क़रीब 3000 लोगों को आमंत्रित किया गया.

सुबह आठ बजे से जो बारिश शुरू हुई तो रुकने का नाम नहीं लिया. राष्ट्रपति भवन के अधिकारी परेशान हो गए कि इतने सारे लोगों को भवन के अंदर चाय नहीं पिलाई जा सकती. आनन-फ़ानन में 2000 छातों का इंतज़ाम कराया गया. जब दोपहर बारह बजे राष्ट्रपति के सचिव उनसे मिलने गए तो कलाम ने कहा, ”क्या लाजवाब दिन है. ठंडी हवा चल रही है.” सचिव ने कहा, ”आपने 3000 लोगों को चाय पर बुला रखा है. इस मौसम में उनका स्वागत कैसे किया जा सकता है?”

कलाम ने कहा, ”चिंता मत करिए हम राष्ट्रपति भवन के अंदर लोगों को चाय पिलाएंगे.”

ऊपर बात कर ली है’

सचिव ने कहा हम ज़्यादा से ज़्यादा 700 लोगों को अंदर ला सकते हैं. मैंने 2000 छातों का इंतज़ाम तो कर दिया है लेकिन ये भी शायद कम पड़ेंगे. कलाम ने उनकी तरफ़ देखा और बोले, ”हम कर भी क्या सकते हैं. अगर बारिश जारी रही तो ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा… हम भीगेंगे ही न.”

परेशान, बदहाल नायर दरवाज़े तक ही पहुंचे थे कि कलाम ने उन्हें पुकारा और आसमान की ओर देखते हुए कहा, ”आप परेशान मत होइए. मैंने ऊपर बात कर ली है.” उस समय दिन के 12 बज कर 38 मिनट हुए थे. ठीक 2 बजे अचानक बारिश थम गई. सूरज निकल आया. ठीक साढ़े पांच बजे कलाम परंपरागत रूप से लॉन में पधारे. अपने मेहमानों से मिले. उनके साथ चाय पी और सबके साथ तस्वीरें खिंचवाई. सवा छह बजे राष्ट्र गान हुआ. जैसे ही कलाम राष्ट्रपति भवन की छत के नीचे पहुंचे, फिर से झमाझम बारिश शुरू हो गई. अंग्रेज़ी पत्रिका वीक के अगले अंक में एक लेख छपा, क़ुदरत भी कलाम पर मेहरबान.

साभार: बीबीसी न्यूज़

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