इस प्रकार सब मिलाकर जो धर्म बनेगा वह कैसा होगा ?

डेलीमेल (UK) के अनुसार नास्तिकों की संख्या विश्व में तीसरे स्थान पर पहुँच गयी | अर्थात इस्लाम और ईसाई के बाद नास्तिक ही आते हैं और उसके बाद बाकि सभी धर्म |

बाकी के विषय में तो नहीं कह सकता कि उनके पिछड़ने के कारण क्या रहे लेकिन हिन्दू धर्म के पिछड़ने का कारण केवल इतना है कि हिन्दुओं ने इस्लाम को आदर्श बना लिया | हिन्दू धर्म तो भारत में ही सिमट कर रह गया था और मुस्लिम व ईसाई देश कई हैं | तो उनकी संख्या अधिक ही होगी वह कोई बड़ी बात नहीं है | बड़ी बात यह है कि हिन्दू धर्म जिसमें सभी के लिए स्थान था, सभी भारत में आये और सहजता से घुल-मिल गये क्योंकि हिन्दू धर्म विभिन्न मान्यताओं और संस्कृति का एक समूह था | लेकिन बौद्ध काल से पहले जैसा कि मेरा मानना है, अचानक कुछ ऐसा हुआ, जिससे लोगों का मोह भंग होना शुरू हुआ हिन्दू धर्म से | शायद एक कारण यह रहा हो कि ब्राह्मणों का वर्चस्व बढ़ा और उन्होंने माँसाहारियों को शाकाहारी बनाने के लिए दबाव बनाना शुरू किया हो ? दूसरी वजह स्त्रियों पर अत्याचार बढ़ा हो जैसा कि एक प्रथा थी कि स्त्रियों को अपने स्तन खुले रखने हैं जब भी ब्राह्मण उनके सामने से गुजरें या कोई उच्चवर्ग का व्यक्ति उनके सामने से गुजरे | दूसरी देवदासी प्रथा… इसके आलावा कई और ऐसी प्रथाएं थीं जो गौतम बुद्ध तो नहीं सुधार सके, लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद उनसे मुक्ति मिली |

आज हम मुस्लिमों और ईसाईयों की बहुलता देखें तो ये दोनों ही माँसाहार समर्थक धर्म हैं | इसीसे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मांसाहारियों की संख्या अधिक है | अब हिन्दू धर्म में ये लोग आते भी हैं तो इनको हीनता का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि वर्तमान हिन्दू धर्म या आर्यसमाजी धर्म के अनुसार माँसाहार पाप है | यह तो निश्चित है कि इसाई और मुस्लिमों में भी बहुत से लोग स्वाभाविक रूप से शाकाहारी होंगे | लेकिन यह उनकी प्रकृति पर निर्भर है, न कि धर्म पर | लेकिन उन शाकाहारियों को उनके बीच कोई असहजता नहीं होती होगी, जैसा कि हिन्दू धर्म में एक मांसाहरी को होती है | इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि जिसकी प्रवृति माँसाहार की होगी, वह ईसाई या मुसलमान होना चाहेगा | यहाँ धर्म केवल प्रकृति से मेल खाता है उस व्यक्ति के जिसे माँसाहार पसंद है | तो इस प्रकार हिन्दू धर्म से लोगों का पलायन शुरू हुआ होगा |

आज लोगों में शिक्षा व जागृति की कमी नहीं है और आत्मनिर्भरता बढ़ी है | इसलिए लोगों को यह भी समझ में आ रहा है कि ये हिन्दू, मुस्लिम नाम के धर्म वास्तव में वहीँ ठहरे रह गये जहाँ से चले थे | कोई प्रगति हुई ही नहीं इनमें | ये आज भी वही प्राचीन किस्से कहानियाँ लेकर बैठे हैं, जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है | इनके पास सिवाय किस्से कहानियो के और कुछ बचा भी नहीं है | न तो ये अपने समुदायों के हितार्थ कोई सार्थक कदम उठा पाए और न ही कभी सहयोगी बन पाए | केवल नियम कानून थोपते चले गये, या फतवे निकालते रहे | कितने मुस्लिम देश हैं जो गरीबी से जूझ रहे हैं और भारत में कितने हिन्दू और मुस्लिम हैं जो भुखमरी में जी रहे हैं | आइसिस और अलकायदा ने तो इस्लाम बुरी तरह कलंकित कर दिया…. | धर्म तो इनकी कोई सहायता नहीं कर पा रहे….. उलटे राजनीति और दंगा-फसाद के माध्यम ही बने हुए हैं | इसलिए लोगों ने इन सब से स्वयं को मुक्त करना चाहा और खुद को नास्तिक घोषित कर दिया |

लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि सनातन और हिन्दू धर्म में जमीन आसमान का अंतर है | हिन्दू धर्म वास्तव में कुछ धर्मों के ठेकेदारों का धर्म मात्र रह गया है ठीक वैसे ही जैसे इस्लाम | इनकी किताबें ही इनका आधार हैं और किताबें न रहीं तो धर्म भी नहीं रहेगा इनका | तिलक न लगायें तो इनका धर्म खतरे में पड़ जाएगा और टोपी न लगाएं तो मुस्लिमों का धर्म खतरे में पड़ जाएगा | फिर कमजोर इतना है कि जरा-जरा सी बात पर आये दिन इनकी भावनाएं आहत होती रहतीं हैं |

जबकि सनातन धर्म तो इतना मजबूत है कि चक्रवात और सुनामी में भी अपना कर्तव्य निभाता है | उस समय भी लोगों को संकीर्णता से मुक्त होकर एक दूसरे की सहायता करते हुए देख सकते हैं | लोग पशुओं तक की सहायता के लिए अपने प्राणों को संकट में डाल देते हैं… अर्थात उस समय हम सनातन धर्म के अंतर्गत स्वतः कार्य करने लगते हैं ठीक वैसे ही जैसे हमारे हृदय की धड़कन कार्य करती है | आ हिन्दू हों या मुस्लिम, हृदय को कोई फर्क नहीं पड़ता वह सनातन धर्म के अंतर्गत है | साथ ही यह सम्पूर्ण स्वतंत्रता देता है जैसे सभी जीवों को मिला है, जैसे सभी ग्रहों व नक्षत्रों को मिला हुआ है | आपको स्वाभाविकता प्रदान करता है एक प्रकार से नास्तिक सनातन धर्म के अनुसार ही चल रहे हैं, बस वे ईश्वर को नकारते हैं और सनातन धर्म में ईश्वर को स्वीकारा जाता है | यहाँ केवल एक ही अंतर आ जाता है आस्तिकता और नास्तिकता का | हम ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास करते हैं लेकिन किसी को बाध्य नहीं करते कि वे ईश्वर को मानें | क्योंकि ईश्वर मानने की चीज नहीं है, जानने की चीज है, अनुभव करने की चीज है | सनातन धर्म के अंतर्गत आप किसी भी तरह की पूजा पद्धति का प्रयोग कर सकते हैं और किसी भी रंग का कपड़ा पहन सकते हैं…. चलिए छोडिये… मैं भी क्या समझाने लगा आप लोगों… आप लोग तो पढ़े-लिखे हैं… बड़ी बड़ी डिग्रियां लिए हुए हैं… अंग्रेजी भी जानते हैं, संस्कृति, उर्दू और फारसी भी जानते हैं….. आइये नई दिशा में सोचें….

मान लीजिये हम एक नया धर्म बनाते हैं सम्पूर्ण मानव समाज को ध्यान में रखकर | सभी धर्मों के श्रेष्ठ विचार और अनुभवों को उसमें शामिल करते हैं ठीक वैसे ही जैसे, हमारा संविधान या भानुमती का कुनबा | उसे विश्वधर्म या इसी प्रकार का कोई नाम देते हैं | फिर क्या होगा ?

मुस्लिम, बुरका और टोपी छोड़ने के पक्ष में नहीं होगा |

हिन्दू तिलक, जनेऊ को रखना चाहेगा और माँसाहार को निषेध करने की मांग करेगा |

ईसाई क्रॉस टांगने की वकालत करेगा

सिख पगड़ी के पक्ष में होगा |

बौद्ध मुंडन को महत्व देगा…..

इस प्रकार सब मिलाकर जो धर्म बनेगा वह कैसा होगा ?

आपमें से कितने ऐसे किसी धर्म के प्रति सहमत होंगे ? ~विशुद्ध चैतन्य

566 total views, 1 views today

The short URL of this article is: https://www.vishuddhablog.com/ILSoV

पोस्ट से सम्बंधित आपके विचार ?

Please Login to comment
avatar
  Subscribe  
Notify of