ईश्वर से भक्ति किसी की नहीं है


जिस प्रकार आज हिन्दू राष्ट्र का निर्माण हो रहा है, उसी प्रकार गौतमबुद्ध के समय भी हुआ होगा और उस समय भी आदिवासियों की जमीनें हड़पी जा रही होंगी | तब गौतमबुद्ध ने निडरता से जनहित में आवाज उठाया होगा क्योंकि वे सत्य को समझ चुके थे | उनके भीतर से भय मिट गया होगा क्योंकि वे स्वयं को जान चुके थे | उन्होंने गीता के अध्याय २, श्लोक १२ को स्वयं अनुभव किया;

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा:।

न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् ।।12।।

न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था या तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे ।।12।।

In fact, there was never a time when I was not, or when you or these kings were not. Nor is it a fact that hereafter we shall all cease to be.(12)

यह सत्य उन्होंने जाना समझा ध्यान से, न कि घंटे मंजीरे बजाकर मंदिरों के धक्के खाकर | तो जो उस समय के भूमाफियाओं, शोषकों व प्रजा की पीड़ा से अनजान शासकों के विरोध में थे या जिनकी जमीनें छीनी जा चुकी थीं, वे सब गौतम बुद्ध की शरण में चले आये | आगे चलकर गौतम बुद्ध उनके लिए भगवान् हो गये | 

इसी प्रकार ठाकुर दयानंद देव जी का नाम आज भी देवघर, झारखण्ड में विशिष्ठ स्थान रखता है | वे ही पहले संत थे जिन्होंने अंग्रेजो के अत्याचार से क्षुब्ध होकर ३० जून १९१२ में एक सभा में निम्न घोषणा की और लिखित रूप में गवर्नर से भी ज्ञापन दिया;

“From the consideration of Dharma alone, we dissolve the relation of Ruler and Ruled.”

केवल धर्म (राष्ट्र के प्रति कर्तव्य) को आधार मानकर, हम प्रजा-शासक के सम्बन्ध को समाप्त करते हैं |

परिणाम यह निकला कि अंग्रेज सरकार नाराज हो गई और एक दिन आश्रम में संकीर्तन कर रहे उनके शिष्यों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दी | इस घटना में उनके एक शिष्य की मृत्यु हो गई और कई घायल हो गए |

इनका जन्म १९ मई १८८१ में सिलहट जिले के हबीबगंज सबडिविजन के बामई में हुआ था जो कि इस समय बांग्लादेश में पड़ता है |

उनकी निडरता व स्पष्टवादिता के कारण ही उन्होंने यह स्थान पाया | उन्होंने पर्दा प्रथा का विरोध किया स्त्रियों को आश्रम में रहने की अनुमति दी, सन्यासियों का विवाह करवाया…….. ऐसे ही कई कार्य जो पण्डे-पुरोहितों की नजर में उस समय गलत थे या धर्मविरुद्ध थे उन्होंने किये | लेकिन दुर्भाग्य से उनका कोई उत्तराधिकारी उनकी राह पर नहीं चल सका | जो भी आये घंटी-मंजीरे वाले ही आये और जय जय दयानंद करके मर गये | न ग्रामीणों के लिए कुछ किया और न ही आश्रम के विकास के लिए कोई कदम उठाये, बस भोजन-भजन-शयन के सिद्धांत पर ही जीते रहे | इस प्रकार के अनुयायियों के लिए ठाकुर जी भगवान् हो गये | अब ठाकुर जी की प्रतिमा के आगे बैठकर भजन करते हैं और उनको सजाते संवारते हैं और भोजन करके सो जाते हैं | न ग्रामीणों को प्रवचन करना, न ग्रामीणों के स्वास्थ्य के लिए कोई योगदान देना….. ऐसा कोई भी कार्य जिसे हम परोपकार या मानवता कहते हैं उन सबसे इनको परहेज है | क्योंकि इनका मानना है कि दूसरों के दुःख दूर करने से ईश्वर नाराज हो जायेंगे और हमें उनके दुःख झेलने पड़ेंगे |
 
ठाकुर दयानंद देव जी के दिखाए मार्ग पर चला तो कोई नहीं, लेकिन उन्हें ईश्वर बनाकर बैठा दिया | अब जय जय दयानंद के उद्घोष होते हैं जैसे जय श्री राम, जय भीम आदि के उद्घोष होते हैं | भीमराव आंबेडकर भी अब दलितों के भगवान् हो गये अब वे जय भीम का उद्घोष करते हैं जय श्री राम को टक्कर देने के लिए |

इस प्रकार सूर्य और चन्द्र की उपासना करने वाले लोग अब भीमराव अम्बेडकर, ठाकुर दयानंद देव, गौतम बुद्ध, महावीर, आदि के दिखाए मार्ग में न चलकर उनके नाम जपना शुरू कर दिया | अब मोदी, सोनिया, रजनीकांत, सचिन, अमिताभ, के मंदिर और मूर्तियाँ भी स्थापित होने लगीं हैं | आगे आगे राखी सावंत, मल्लिका सहरावत, सनी लियोन की प्रतिमाएं भी स्थापित हो जायेंगी उन लोगों के द्वारा, जो उपरोक्त हिन्दू देवी देवताओं के विरोध में होंगे |

आदिवासियों ने सूर्य, चन्द्र, नदी, पहाड़, वृक्षों को ईश्वर माना क्योंकि उनसे इनको जीवन मिलता था | आदिवासियों के ईश्वर अधिक प्रमाणिक हैं बनिस्बत आसमान से टपके मानव जातियों के ईश्वरों के | इनके ईश्वर या तो दीखते ही नहीं और दीखते भी हैं तो किसी की सहायता भी नहीं कर पाते जब तक मंदिरों में दक्षिणा या रिश्वत न चढ़ाई जाए | उस पर भी नेताओं, पूंजीपतियों, अपराधियों की भूख ही मिटाने में इनके ईश्वर इतने व्यस्त होते हैं कि किसी गरीब की पुकार सुनाई ही नहीं देती | जबकि सूर्य-चन्द्र आज भी अपनी उर्जा देते हैं बिना किसी भेदभाव के |

सारांश यह कि ईश्वर से भक्ति किसी की नहीं है | भक्ति केवल व्यक्तिगत स्वार्थो से है | जो स्वार्थों की पूर्ति कर दे, वही ईश्वर | फिर आजकल ईश्वर के नामों का उपयोग नफरत फैलाने, दंगा-भड़काने, दूसरों को नीचा दिखाने में ही अधिक होता है, भक्ति या प्रेम का कोई लेना देना नहीं होता |

भगवानों की उत्पत्ति कैसे हुई उसपर मैं काफी समय से रिसर्च कर रहा था | अब तक की खोज में जो तथ्य सामने आये उससे मैं इस निष्कर्ष में निकला हूँ कि ईश्वर स्वार्थ की भूमि पर, श्रृद्धा और विश्वास से उगा एक बटवृक्ष है | यहाँ मैं उस सर्वशक्तिमान की बात नहीं कर रहा, जिसके बनाये नियमों के अंतर्गत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गई करती है, बल्कि उस ईश्वर की बात कर रहा हूँ जो मानव निर्मित हैं | ये ईश्वर उन मानवों ने बनाए जो जीवविकास या डार्विन के सिद्धांत से विपरीत सीधे आसमान से टपके जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र या आदम और हौव्वा या ईव की संताने | ये अपने साथ आसमानी किताबें भी लेकर आये जिसमें सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है और आजतक लगा रहा है | ज्योतिष शास्त्र उठाकर देख लीजिये उसके अनुसार पृथ्वी स्थिर है बाकी सारे गृह नक्षत्र, तारे पृथ्वी के चक्कर लगा रहे हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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