क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपने देश के लिए सनातनी नेता चुनें ?

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भारत के बंटवारे के बाद हिंदुत्व के ठेकेदार चाहते थे भारत को हिन्दूराष्ट्र घोषित किया जाए क्योंकि पाकिस्तान इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर चुका था खुद को | लेकिन गांधीजी व अन्य स्वतंत्रता सेनानी नहीं चाहते थे कि भारत कोई दड़बा बन जाए | वे भारत को सनातनी राष्ट्र के रूप में ही देखना चाहते थे और भारत था भी सनातनी क्योंकि यह विश्व की सभी संस्कृतियों, मान्यताओं व भाषाओँ का संगम है |

तो दायित्व सौंपा गया नेहरु को और नेहरु ने दायित्व सौंपा आंबेडकर को | नेहरु और आंबेडकर में कई बातों पर मतभेद थे और बाद में आंबेडकर ने त्यागपत्र भी दिया | लेकिन सभी के प्रयासों से भारत हिन्दूराष्ट्र न बनकर सनातनी राष्ट्र बन गया | ऐसा राष्ट्र जो धर्मनिरपेक्ष था क्योंकि राजनीती न्याय व शासन के लिए धार्मिक मत-मान्यताओं, संकीर्ण मानसिकता व अंधविश्वासों से ऊपर उठना पड़ता है | क्योंकि जातिगत व सांप्रदायिक भेदभाव से ऊपर उठना पड़ता है | यही कारण रहा कि आज तक भारत में सभी तरह के सांप्रदायिक कट्टरपंथियों ने उत्पात मचाया लेकिन फिर भी भारत की एकता व अखंडता को अधिक क्षति नहीं हो पायी |

मेरी अपनी व्यक्तिगत मान्यता है कि नेहरु, गाँधी, पटेल जैसे सनातनी विद्वान न होते तो भारत भी आज पाकिस्तान बंगलादेश की नकल मात्र ही होता, न कि अपनी ही एक अलग पहचान रखने वाला इकलौता देश | यदि वे लोग न होते, भारत आज इतनी उन्नत न हो पाता और आर्थिक रूप से इतने कमजोर होते कि इतने बड़े घोटाले की कोई सोच भी नहीं सकता था |

एक और अनुभव मिला मुझे कि चार वर्णों में जो विभाजन करके मानव प्रवृति को सहजता से समझने में सहयोगी उपाय खोजा ऋषि-मुनियों ने वह अद्भुत है | कोई चूक ही नहीं हुई उनसे |

जातिगत ब्राहमणों के हाथ में यदि सत्ता आएगी, तो वे ब्राह्मणवाद थोपेंगे, अन्य मत-मान्यताओं के लोगों डरायेंगे धमकाएंगे और यह सब हिंदुत्व के ठेकेदारों के वर्तमान वक्तव्यों और आचरणों से देख ही रहे हैं | ये लोग गोडसे को पूजते हैं, शम्भू रैगर को पूजते हैं, मोबलिंचिंग करने वालों को हार पहनाकर सम्मानित करते हैं |

भारत में अब वास्तविक ब्राह्मण और क्षत्रिय तो कम ही देखने मिलते हैं, लेकिन वैश्य हर जगह देखने मिल जाते हैं | अब कोई भी व्यक्ति बिना स्वार्थ के किसी की सहायता नहीं करता, बिना कुछ पाने की इच्छा किये तो ईश्वर को प्रणाम भी नहीं करता | और इन चार वर्षों के अनुभवों में यह भी पता चल गया कि वैश्य केवल वैश्य होते हैं, उनका काम है व्यापार करना, फिर चाहे देश ही क्यों न बेचना पड़े | वैश्य जब मुनाफे के लालच में अपने होश खो देते हैं, तब उन्हें मुनाफा दिखेगा तो देश ही बेच देंगे, मुनाफा दिखेगा तो अपनी माँ-बहन बेटी देंगे देश की जनता क्या चीज है…राफेल घोटाला इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है |

एक बात इतिहास की घटनाओं से यह भी समझ में आया कि पहले राजा-महाराजा क्षत्रिय हुआ करते थे तो वे अधिकांशतः दूसरे राज्यों से लड़ने झगड़ने में ही व्यस्त रहते थे | अब वैश्य होते हैं शासक इसलिए व्यापार में व्यस्त रहते हैं | इनका व्यापार इतना व्यापक है कि नेता तक खरीदे बेचे जाते हैं, वोट खरीदे बेचे जाते हैं | ये व्यापारी अपने ही देश के व्यपारियो को बर्बाद करके विदेशी व्यापारियों को लाभ पहुंचाते हैं ताकि मुनाफा अधिक मिले |

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपने देश के लिए निष्पक्ष, धर्मनिरपेक्ष सनातनी नेता चुनें ?

जानता हूँ कि यह असंभव है क्योंकि हर किसी को अपने अपने दडबे से प्रेम है और हर कोई चाहता है कि उसी के दड़बे का नेता देश के लिए चुना जाए | लेकिन फिर भी मेरी अपनी इच्छा है कि भारत जैसे विराट धर्मनिरपेक्ष सनातनी राष्ट्र के लिए राष्ट्राध्यक्ष भी सनातनी ही होना चाहिए और मंत्रीमंडल भी |

लेकिन यह भी जानता हूँ कि निकट भविष्य में ऐसा हो पाना लगभग असंभव है |

~विशुद्ध चैतन्य

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