कैसे हम सुनिश्चित करें कि क्या सही और क्या गलत ?

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प्रश्न उठता है मन में कई बार कि सही और गलत की सामाजिक, धार्मिक परिभाषा क्या है ? कैसे हम सुनिश्चित करें कि क्या सही और क्या गलत ?

मैं तो अपनी अंतरात्मा की ही सुनता हूँ, इसलिए मुझे सही और गलत को पहचानने में तनिक भी दुविधा नहीं रहती | यह और बात है कि जिसे मैं सही मानता हूँ, समाज व धार्मिक लोग उसे गलत मानें ऐसी सम्भावना अधिक है | लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं गलत नहीं हूँ | लेकिन समाज नहीं जानता कि वे गलत हैं | क्योंकि समाज अपनी अंतरात्मा की नहीं बल्कि दूसरों की हाँ या न पर निर्भर है | क्योंकि समाज नेताओं, धर्म व जाति के ठेकेदारों पर निर्भर है | क्योंकि आसमानी, हवाई किताबों पर निर्भर हैं आप और आपका तथाकथित सभ्य धार्मिक सामाज | समाज के पास अपना विवेक नहीं होता, अपनी खुद की कोई अंतरात्मा नहीं होती | इसलिए समाज में हमेशा दो पक्ष रहते हैं एक ही विषय पर | एक हाँ कहता है और दूसरा न कहता है | एक गलत के पक्ष में पूर्ण निष्ठा व विश्वास से खड़ा रहता है और दूसरा सही के पक्ष में | और दोनों ही यह मानते हैं कि वे सही हैं और दूसरा गलत | दोनों ही एक ही धार्मिक ग्रन्थ को आधार बनाकर कहते हैं कि सामने वाला धर्मग्रन्थ का गलत अर्थ निकाल रहा है, हमने सही अर्थ निकाला है |

अब प्रश्न उठता है कि क्या सही और क्या गलत यह कौन तय करेगा ?

आपसे कहा जाता है कि जो पूर्वजों ने अपने अनुभवों से लिखा या कहा वही सही है और आप अपने अनुभवों से जो कुछ भी जानते समझते हैं वह गलत | इसका अर्थ तो यह हुआ कि प्राचीन काल के लोग हमसे अधिक बुद्धिमान व विद्वान थे ? इसका अर्थ तो यह हुआ कि उन्होंने जितना जाना, समझा, उससे आगे की यात्रा हमने की ही नहीं, उन प्राचीनकालीन विद्वानों के लेवल तक भी नहीं उठ पाए, बल्कि उस लेवल पर ही टिके रह गये, जिस लेवल के लोगों को वे विद्वान समझा रहे थे ?

क्या यह स्थिति कुछ वैसी ही नहीं हो गयी, जैसे प्राइमरी स्कूल को पढ़ाने वाला शिक्षक मेडिकल कॉलेज के डीन से अधिक बुद्धिमान था, इसलिए मेडिकल कॉलेज के डीन को प्राइमरी स्कूल के शिक्षक से प्रमाण्पत्र लेना चाहिए कि वह सही बोल रहा है या गलत ? यह कुछ वैसी ही बात नहीं हो गयी, कि आज से सौ वर्ष पहले के इंजीनयर अधिक विद्वान थे बनिस्बत आज के इंजीनियर्स से ?

हमारे पास ऐसे कई उदाहरण हैं जिनके आधार पर हम यह तो कह सकते हैं कि प्राचीन काल के लोग हमसे अधिक बुद्धिमान थे, जैसे पिरामिड, ममी, अशोक स्तम्भ….आदि | लेकिन फिर प्रश्न उठता है कि हम उनसे आगे की यात्रा क्यों नहीं कर पाए ? हम उनसे अधिक विद्वान, समझदार क्यों नहीं हो पाए कि आज भी हमें प्राचीनकालीन धार्मिक पुस्तकों के आधार पर ही सही और गलत का निर्णय  लेना पड़ता है ?

क्या प्राचीन पुस्तकों में जो लिखा है वह सही ही है ?

यदि प्राचीन पुस्तकों में लिखा है वह सही ही होता, तो आज पृथ्वी सूर्य के चक्कर न लगा रही होती, बल्कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगा रहा होता | पृथ्वी गोल न होती, बल्कि चपटी होती | कोई इंसान चाँद के दो दुकड़े कर रहा होता तो कोई वानर सूरज को निगल रहा होता | लेकिन ये सब गलत सिद्ध हो गये क्यों ?

तो फिर प्रश्न वहीँ का वहीँ कि क्या सही और क्या गलत ?

क्या धर्मगुरु सही होते हैं ?

धार्मिक ग्रंथों पर टिके धर्मगुरु भी सही हों, यह भी हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते | क्योंकि धार्मिक गुरु कभी सती-प्रथा को सही मानते थे, कभी देवदासी प्रथा को सही मानते थे | लेकिन कालान्तर में उन्हें गलत सिद्ध कर दिया गया और वे प्रथाएं अब लुप्त हो गयीं | कहीं धार्मिक गुरु मानते थे कि बुर्का प्रथा सही है लेकिन कहीं माना जाता है कि यह गलत है | कहीं माना जाता है धर्मगुरुओं द्वारा कि शाकाहार ही सही है और कहीं माना जाता है, माँसाहार सही है |

तो फिर सही क्या है और गलत क्या है ?

धर्मगुरु कहते हैं कि शास्त्रों में लिखा है, आसमानी, हवाई किताबों में लिखा है कि कभी भी अन्यायी, अत्याचारी, धूर्त, मक्कार, लुटेरे, ठगों का साथ मत दो, अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध निर्भीकता से खड़े हो जाओ, चाहे अपने प्राण ही क्यों न गँवानी पड़े | तभी ईश्वर प्रसन्न होता है | लेकिन मैं देखता हूँ कि धर्मगुरु और उनके अनुयाई स्वयं ही अधर्मियों, अत्याचारियों के पक्ष में खड़े मिलते हैं, उनकी हाँ में हाँ मिला रहे होते हैं, उनके तलुए चाट रहे होते हैं |

तो फिर क्या सही है और क्या गलत ?

क्या बड़े बड़े राजनेता और आईएएस, आइपीएस सही होते हैं ?

मैंने पाया है कि ये भी सही नहीं होते, क्योंकि ये जो भी आँकड़ें प्रस्तुत करते हैं विकास या उन्नति के, वे गलत सिद्ध हो जाते हैं | उदाहरण के लिए जीडीपी या राफेल डील को ही ले लीजिये | महँगाई एफडीआई को यही नेता कभी डायन बताते हैं और कभी विकास बताते हैं | इन्हीं नेताओं के लिए गाय कहीं माँ होती है तो कहीं गोश्त होती है | ये कहते हैं कि वे गरीबों, देश के किसानों के हित के लिए सत्ता में आये हैं और भला कर रहे होते हैं अमीरों का | किसानों को चालीस पैसे, साठ पैसे की कर्ज माफ़ी देकर दुनिया भर से वाहवाही बटोरते हैं लेकिन अमीरों को करोड़ों अरबों रूपये की कर्ज व टैक्स माफ़ी भी बड़ी ख़ामोशी से दे देते हैं | गरीबों की भूमि, सम्पत्ति नीलाम करवाकर भी कर्ज वसूल कर ली जाती है, लेकिन अमीरों को ससम्मान विदेश में सेटल करवा दिया जाता है कर्ज न चुका पाने पर |

और ये आईएएस, आईपीएस उनके सामने नतमस्तक खड़े रहते हैं एक विवेकहीन गुलामों की तरह | तो मैं कैसे मान लूं कि ये लोग सही ही होते हैं ?

तो फिर प्रश्न वहीं का वहीं कि सही क्या है और गलत क्या ?

क्या समाज सही होता है ?

समाज कई व्यक्तियों, परिवारों का एक समूह होता है और यह धारणा है कि समाज सही ही होता है क्योंकि उसमें कई लोगों की बुद्धि, अनुभव व चिंतन सम्मिलित होता है | और जब कई लोग मिलकर कोई निर्णय लेते हैं, तो वह सही ही होता है |

लेकिन मैं पाता हूँ कि समाज भी सही नहीं होता | क्योंकि समाज हमेशा दो भागों में विभक्त रहता है और अपने पक्ष को सही और दूसरे पक्ष को गलत बताता है | उदाहरण के लिए हिन्दू और मुस्लिम समाज को लिया जाए, तो दोनों एक दूसरे को गलत सिद्ध करने में व्यस्त रहते आये हैं आदिकाल से और आज तक वे इस निर्णय पर नहीं पहुँच पाए कि दोनों में से कौन सही है और कौन गलत | एक कहता है पश्चिम की तरफ मुँह करके आराधना करो, तो दूसरा कहता है पूरब की तरफ मुँह करके अराधना करो | एक मानता है कि टोपी लगाना, खतना करवाना ही सही है और दूसरा मानता है कि तिलक लगाना, मुंडन करवाना, जनेऊ धारण करना ही सही है | एक मानता है कि निराकार की उपासना ही सही और दूसरा मनाता है कि साकार की उपासना भी सही |

दोनों ही समाज यह तो मानते हैं कि अधर्मी का विरोध होना चाहिए, अत्याचारियों का विरोध होना चाहिए, भ्रष्टाचारियों का विरोध होना चाहिए | लेकिन दोनों ही समाज में भी दो भाग हैं यानी एक भाग अधर्मियों, अत्य्चारियों, भ्रष्टाचारियों के पक्ष में मिलेगा और एक विरोध में | कोई नेता कितने ही झूठ बोले, कितने ही घोटाले करे, चाहे देश ही बेच खाए….आधे से अधिक लोग उसके ही समर्थन में रहेंगे और कुछ लोग विरोध में |

यानी अधिकांश लोग अधर्मियों, अत्याचारियों, भ्रष्टाचारियों के ही पक्ष में मिलेंगे और विरोध में बहुत ही कम लोग |

तो फिर क्या हम यह मान लें कि अधर्म, अत्याचार, भ्रष्टाचार ही सही है क्योंकि अधिकाँश लोग उनके समर्थन में हैं ?

लेकिन मेरी अंतरात्मा इसे स्वीकारने में संकोच करती है | वह कहती है कि मेरी सुनो मैं जो कहती हूँ वही सही है, बहुमत जो कह रहा है वह गलत है |

मुझे मेरी अंतरात्मा ही सही दिखाई देती है क्योंकि यह मुझे दुविधा में नहीं डालती | जबकि नेता, धर्मगुरु और समाज मुझे दुविधा में डाल देते हैं अपनी कथनी और करनी के अंतर से | वे जिनका विरोध करते हैं मौखिक रूप से, उसी का समर्थन करते हैं व्यावहारिक रूप से | और मेरे जैसा कोई सरफिरा यह दावा करे कि मैं ही सही हूँ क्योंकि मैं अपनी अंतरात्मा की ही सुनता हूँ, तो सारा समाज ही विरोध में खडा हो जाता है | क्योंकि उन्हें लगता है वे सही हैं और मैं गलत |

तो फिर यह कौन तय करेगा कि सही क्या है और गलत क्या ?

मेरे विचार से सही और गलत जैसा कुछ नहीं होता, जिसके पक्ष में वोट अधिक पड़े, जिसके समर्थक अधिक हों, वह सही है, फिर वह डकैती करे, फिर वह बलात्कार करे, फिर वह जनता को लुटे, फिर वह देश बेचे….कोई फर्क नहीं पड़ता | बस चूँकि उसके पास समर्थन अधिक है, भक्त अधिक हैं, इसीलिए वह सही | और मैं तो सही कभी हो ही नहीं सकता समाज की नजर में क्योंकि मेरे पास तो न समर्थक हैं, न भक्त हैं, न ही कोई बड़ा धन्ना सेठ बैकअप दे रहा है मेरे खाने-पीने, घुमने फिरने, महँगे पेन और मोबाइल फ़ोन खरीदने में | तो समाज देखता है कि कौन आर्थिक व राजनैतिक रूप से समृध्द है किसके सपोर्ट में कितने बड़े बड़े उद्योगपति और व्यापारी हैं…उसी आधार पर तय करता है सही और गलत |

तो निष्कर्ष यही निकलता है कि बहुमत होना चाहिए आपके पास, आर्थिक रूप से समृद्ध होना चाहिए आपको, तो फिर आप जो कुछ करें वह सही है, अन्यथा गलत | और मैं जानता हूँ कि समाज की नजर में कभी भी मैं तो सही हो ही नहीं सकता क्योंकि मेरे समर्थन में दो चार कंगले आ भी गए तो समाज मुझे सही नहीं मानेगा |

बरसों तक इस सही और गलत की दुविधा में उलझा रहने के बाद, आज से लगभग तीस वर्ष पहले मैंने स्वयं से कहा था कि अब मुझे ही तय करना है कि मुझे भेड़चाल को सही मानकर उसका अनुसरण करना है या फिर अपनी अंतरात्मा को सही मानकर उसका अनुसरण करना है | और मैंने तब तय किया कि मैं केवल अपनी अंतरात्मा की ही सुनूंगा और किसी की नहीं, फिर चाहे भगवान् स्वयं आकार कहें कि मैं उसकी सुनूं | मेरी अंतरात्मा ही मुझे बताती है कि सामने वाला सही कह रहा है या गलत और मुझे उसे मानना चाहिए या नहीं |

तो मुझे सुधारने के चक्कर में न पड़ें, खुद सुधर जाएँ, अपने समाज को सुधार लें वही बहुत है | साथ ही अंत में यह भी कहना चाहता हूँ कि मैं आपको नहीं बता सकता कि क्या सही और क्या गलत क्योंकि जो मेरे लिए सही हो, वह आपके लिए भी सही होगा इस बात की कोई गारन्टी नहीं, क्योंकि समझ का अंतर आ जाएगा | हाँ मैं उसे अवश्य बता सकता हूँ, समझा सकता हूँ सही और गलत भविष्य में कभी उसे, जो मेरे प्रति विश्वास व समर्पण रखेगा…..क्योंकि उसे मेरी बातें समझ में आ पाएंगी, औरों को नहीं |

मैं जो कह रहा हूँ, उसे आप उसी प्रकार समझ पायें यह आवश्यक नहीं, क्योंकि उसके लिए आपका उस मानसिक, आध्यात्मिक स्थिति तक पहुँचना अनिवार्य है, जिस स्थिति में हूँ मैं इस समय | खैर छोड़िये इन सब बातों को…बस आप लोग तो अपने प्राचीन विद्वानों के ही चरण पकड़े रहिये वही सही है | लेकिन मैं आप लोगों की तरह एक ही स्टेशन में खम्बा पकड़े नहीं बैठा रह सकता, मैं तो यात्री हूँ और मेरी यात्रा तो अनन्त की है | मुझे तो आगे बढ़ना ही पड़ेगा, ठहरा नहीं रह सकता आजीवन गौतम बुद्ध या महावीर की तरह | मुझे तो हर दिन, हर पल कुछ नए की खोज रहती है, कुछ अनजाने की खोज रहती है….क्योंकि मैं ठहरा हुआ नहीं हूँ किताबी धार्मिकों आध्यात्मिकों व सभ्य सामाजिक नागरिकों, राजनेताओं, धर्मगुरुओं, धर्म व जाति के ठेकेदारों की तरह |

यदि आपने यहाँ तक पढ़ ही लिया है तो इस मुझे और मेरे लेख को भूल जायें और स्वयं से प्रश्न करें कि क्या सही है और क्या गलत | समाज से प्रश्न करें, अपने धर्मगुरुओं से प्रश्न करें, अपने अपने दडबों, पार्टियों, संगठनों के नेताओं और ठेकेदारों से प्रश्न करें |

~विशुद्ध चैतन्य

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