अपने जीवन में मैंने समाज को दोगला ही पाया…

यह मेरा वह कमरा है जो शुरू में मुझे दिया गया था जब में आया था | मुझे भी यही कमरा पसंद आया क्योंकि यह बिलकुल बगीचे के सामने पड़ता है और हमेशा पेड़ों की हवा सीधी मिलती है |

नहीं जानता था तब मैं कि इस आश्रम में वह संभव हो जाएगा जो पिछले सौ वर्षों में संभव नहीं हुआ था | ये दोनों टेबल अंग्रेजों के जमाने के हैं जो कबाड़ में पड़े हुए थे | उन्हें निकलवाया गया और मैंने उपयोग में ले लिया | मैं जब आश्रम में आया था तो केवल एक बैग था और उसमें कुछ कपड़े….. छः महीने के अंदर ही यह सब सामान आ गया जो टेबल पर देख रहे हैं और वह भी आश्रम के अध्यक्षों और ट्रस्टियों के विरोध के बावजूद | आश्रम के अध्यक्ष, ट्रस्टियों का इसमें एक रूपये का भी सहयोग नहीं रहा और न ही मेरे खुद के पास फूटी कौड़ी थी | लेकिन सब कुछ संभव हो गया |

लोगों को तो मुझसे पहले ही दिन से आपत्ति थी, और जितना ही वे विरोध करते गये, उतना ही मेरे पैर मजबूत होते चले गये | जिन चीजों का विरोध हुआ वही चीज आ गयी | जब मैं आया था तब मुझे लेपटॉप ही दिया गया गया था… लेकिन बाद में पढ़े-लिखों और विद्वानों नें आपत्ति की कि एक अनपढ़ के हाथ में लेपटॉप दे दिया, यह घोर पाप है… नरक में जाना पड़ेगा.. जो भी अनपढ़ को लेपटॉप देगा, मोबाइल देगा….

तो वह सब वापस ले लिया गया… लेकिन उन सबसे बेहतर मिल गया मुझे | फिर आगे चल कर आश्रम की सत्ता तक मिल गयी मुझे… तो जबर्दस्त तूफ़ान उठ गया.. और फिर वह सत्ता वापस ले ली गयी | मैं फिर बिना सत्ता का नेता बन गया और और फिर जैसा कि होता है, सत्ता छीने जाने के बाद सारी सुविधाएं भी छीन ली जाती हैं.. तो मेरी भी सारी सुविधाएँ छीनने का प्रयास किया गया | मुझसे आश्रम से चले जाने के लिए कहा गया, भोजन बंद कर दिया गया… कहा गया कि हमारी शर्तों पर चलना है तो रहो, नहीं तो दफा हो जाओ | धमकी से कभी डरे नहीं और डर से कभी रिश्ता रहा नहीं तो न जाने के निर्णय लिया और जो होगा देखा जाएगा के सिद्धांत पर टिका रहा | ग्रामीणों को जब पता चला की दस दिन तक मुझे भोजन नहीं मिला तो ग्रामीणों ने खाने की व्यवस्था की और साथ ही आश्रम न छोड़ने का आग्रह किया | तो एक वक्त का भोजन की व्यवस्था ढाबे से होने लगी | क्योंकि जिस ढाबे से भोजन आता था, उसके लिए रात में भोजन पहुँचाना मुश्किल होता था क्योंकि रात का समय सुरक्षित नहीं रहता यहाँ और फिर उसे दूर से आना पड़ता है |

ऐसे समय में हम सभी यह भूल जाते हैं कि यही वह समय होता है जब हम तय कर सकते हैं कि वास्तव में हमारी अपनी आवश्यकता क्या है | मुझे शिकायत रहती थी कि खाना मेरी पसंद का नहीं बनता है, सब्जी भी बनती हैं तो स्वाद नहीं मिलता… .तो वह शिकायत दूर हो गयी अब खाना बनाने का सामान भी एक भक्त दिला गया | भक्त भी वह जिसके खुद के सैकड़ों शिष्य हैं लेकिन मेरा आदर गुरु के रूप में ही करते हैं | तो अब अपनी पसंद से जैसा भी हो, बना लेता हूँ | फिर अपने हाथ का बना तो कच्चा-पक्का भी स्वादिष्ट लगता है 🙂

अब इस पोस्ट से आपको यह समझाना चाहता था, कि यदि आपका अवचेतन मन से सम्बन्ध स्थापित हो गया है, यदि आपने प्रकृति व नियति को समझ लिया है तो आपको जो चाहिए वह मिल जाएगा वह भी बिना किसी से माँगे | अधिक से अधिक आप अपने परिचितों से अपनी आवश्यकता कह सकते हैं, लेकिन मैंने पाया है कि जिनसे भी आपने कोई अपेक्षा की, उन्होंने आपका कोई सहयोग नहीं किया | बल्कि अचानक कोई बाहर से आता है और आते ही कहता है, “अरे महाराज… आपने मुझे बताया नहीं कि आपको यह समस्या थी ? फोन क्यों नहीं किया…….. ?” और फिर देखते ही देखते वह सब चीजें उपलब्ध हो जातीं हैं जो उस समय आवश्यक था |

इसी प्रकार आप किसी जनकल्याण के कार्यों में संलग्न हैं, तो निश्चित है कि सहयोग आ जाता है, लेकिन शर्त यह होती है कि व्यापार नहीं होना चाहिए.. कुछ लोग जनकल्याण के कार्यों को व्यापार बना लेते हैं… उन्हें मैंने जीवन भर दुखी और पीड़ित ही देखा है | पीड़ित होने का कारण केवल यही है कि वे बाहर तो दिखावा करते हैं कि वे सादगी से जीने वाले हैं, लेकिन भीतर कहीं उन्हें यह बात अखरती भी है… इस कारण वे ऊपर नहीं उठ पाते… यदि वे पूरी तरह से स्वयं को स्वीकार लें और कह दें कि हाँ मैं व्यापारी हूँ व्यापार करता हूँ.. तो वे भी ऊपर उठना शुरू हो जायेंगे… ठीक वैसे ही जैसे नेता उपर उठते हैं |

प्रकृति को आपसे कोई विरोध नहीं है, आपको जो चाहिए वही मिलेगा, लेकिन आपकी आवश्यकता आपके भीतर अंतर्मन तक पहुँचनी चाहिए | बाहर मांगने से कुछ नहीं मिलेगा, जो मिलता है भीतर जाकर मांगने से | और मुझे तो माँगने की भी आवश्यकता नहीं पड़ी उस दिन से, जिस दिन मैंने स्वयं को जाना | आज हर तरफ लोग मेरे विरोध में हैं, मेरे आश्रम में ही सभी मेरे विरोध में हैं, क्योंकि मैं उनकी पूजा पाठ और भजन कीर्तन को पाखंड कहता हूँ… उन्होंने कभी यह जानने का प्रयास नहीं किया कि मैं सही कह रहा हूँ या गलत…. लेकिन मुझे गलत सिद्ध करने के लिए हर तरफ मेरी निंदा करते फिर रहे हैं… हमेशा इस प्रयास में घूमते रहते हैं कि कैसे मौका मिले और इसे आश्रम से बाहर करवाएं…. क्योंकि यह जब तक है यहाँ.. आश्रम की भूमि हथियाने नहीं देगा |

शायद आप लोग नहीं जानते होंगे, कि में इतना व्यंग्य या कटाक्ष क्यों करता हूँ समाज और पाखंड के लिए… ? वास्तव में अपने जीवन में मैंने समाज को दोगला ही पाया… आज भी फेसबुक में दो चार लोग लाइक कर देते हैं.. वही मेरे लिए बहुत है… वरना वास्तविक जीवन में शायद ऐसा कोई व्यक्ति न हो, जो निःस्वार्थ मेरी प्रशंसा या उत्साहवर्धन करता हो | एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसपर आँख मूँद कर भरोसा कर सकता हूँ…. सब बिन पेंदी के लोटे हैं.. जहाँ मैं कमजोर दिखा, तुरंत दूसरी ओर लुढ़क गये… मेरी ही बताई बातों से मेरे लिए ही कब्र खोदने की तैयारी करनी शुरू कर देते हैं | और फिर जैसे ही मेरा पलड़ा भारी होता दीखता है, फिर लुढ़क कर आ जाते हैं मेरे पास | इसलिए बाहरी दुनिया मेरे लिए वैसी नहीं है जैसी कि बचपन में कल्पना किया करता था | ~विशुद्ध चैतन्य

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