ईश्वर तो मिला नहीं और अब शरीर भी किसी काम का नहीं रहा

आजकल आये दिन किसी न किसी साधू-संत या ब्रह्मचारी को व्याभिचार या बलात्कार के आरोप में घिरा देखने को मिलता है | कारण है धन के लोभ में ब्रह्मचर्य लिया और फिर एक समय बाद जब शरीर की नैसर्गिक आवश्यकताओं ने जोर मारा तो काण्ड कर दिया | क्योंकि सब ब्रह्मचर्य थोपा हुआ था, शास्त्रों में लिखा है, विद्वानों ने कहा है….. इसलिए ब्रह्मचारी होकर महान बनने निकले थे | प्रकृति के विरुद्ध लड़ने चले थे |
हमारे आश्रम के संस्थापक ठाकुर दयानंद देव जी ने देवघर जैसी जगह पर जब आये, जहाँ पंडों का वर्चस्व था और उन्हीं की जमींदारी थी, तब वे स्वयं विवाहित थे और आश्रम में भी स्त्रियों को सन्यासिनों के रूप में रहने की अनुमति प्रदान की थी | इस आश्रम में सत्तर से अधिक स्त्री व पुरुष सन्यासी साथ ही रहते थे | पंडों ने खूब विरोध किया तथा बहुत ही भला बुरा कहा, लेकिन जल्दी उनका व्यक्तित्व व निडरता ने सभी को शांत कर दिया | उन्होंने सन्यासियों का विवाह भी स्वयं करवाया अपने हाथों से……. उनका विचार उस समय भी इतना उन्नत था जितना कि बाद में ओशो में देखने को मिला | उनका मानना था कि सन्यास लेने के बाद जिस दिन भी स्वयं से परिचय हो जाए और पता चले कि उनके जीवन का उद्देश्य समाज में रहकर समाज के लिए कुछ महत्वपूर्ण
करना है तो तुरंत वे समाज में लौट जाएँ | आश्रम में ही रहते हुए किसी को किसी से प्रेम हो जाए और वे विवाह करना चाहें तो वे तुरंत विवाह करें और अपनी गृहस्थी बसायें…. लेकिन व्यभिचार व बलात्कार जैसे कार्यों में लिप्त होने का अर्थ है कि आप सन्यासी हुए ही नहीं कभी | आपने तो केवल सन्यासी होने का ढोंग किया है |
दमन मत करो, दिशा दो | अगर आप दिशा नहीं खोज पाते और न ही खोजना चाहते हैं, अगर आपको लगता है कि अपनी उर्जा आप अकेले नहीं संभाल पा रहे, तो विवाह कर लो | स्त्री और पुरुष दो शक्तियाँ हैं केवल शरीर नहीं हैं | दोनों शक्तियों का मिलन न केवल सृजन करता है, बल्कि सम्पूर्णता देता है | दोनों शक्तियाँ यदि एक दूसरे के प्रति समर्पित हैं, तो वे ब्रह्म को किसी एकल शक्ति से अधिक शीघ्रता से प्राप्त कर सकते हैं | लेकिन दमन करने से विकार व मानसिक अस्थिरता उत्पन्न होता है…..
मेरा स्वयं का अनुभव है कि जिन साधुओं ने विवाह नहीं किया सम्मान व जयकारा के लोभ में, वे अधिक अस्थिर व उग्र हैं या फिर निराशा व हताशा से बुझे हुए दिखे | संन्यास का मुख्य उद्देश्य है स्वयं से परिचय | जितने नियम व संयम सन्यास में हैं, उनका यही उद्देश्य है कि आप अपनी इन्द्रियों व शक्तियों को सही रूप से समझ व जान सकें और समझ सकें कि उनका जीवन में कितना महत्व है | ईश्वर ने जो भी कुछ हमें जन्म के साथ भेंट दिया है, वह व्यर्थ नहीं है और न ही तिरस्कार योग्य हैं | हम जिन चीजों से दूर हो जाते हैं, उन्हीं चीजों का महत्व समझ में आता है जीवन के अंतिम पड़ाव में | जैसे कि साधू-सन्यासियों को जीवन के अंतिम पड़ाव में यह दुःख रहता है कि वे अपने जीवन को व्यर्थ कर गये…. ईश्वर तो मिला नहीं और अब शरीर भी किसी काम का नहीं रहा |
श्रीमद्भागवत अध्याय 3 का श्लोक 6 यही सपष्ट रूप से कह रहा है;

कर्मेन्द्रियाणि, संयम्य, यः, आस्ते, मनसा, स्मरन्,

इन्द्रियार्थान्, विमूढात्मा, मिथ्याचारः, सः, उच्यते।।6।।

अनुवाद: (यः) जो (विमूढात्मा) महामूर्ख मनुष्य (कर्मेन्द्रियाणि) समस्त कर्म इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे (संयम्य) रोककर (मनसा) मनसे उन (इन्द्रियार्थान्) ज्ञान इन्द्रियोंके विषयोंका (स्मरन्) चिन्तन करता (आस्ते) रहता है, (सः) वह (मिथ्याचारः) मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी (उच्यते) कहा जाता है(6)(इसी का विस्तृत वर्णन गीता अध्याय 17 श्लोक 19 में है।)
इस श्लोक को और अधिक विस्तार से समझने के लिए स्वामी रामसुख दास जी द्वारा अनुवादित श्रीमद्भागवत गीता अवश्य पढ़ें |
सारांश यह कि हर मनुष्य एक समान नहीं है | प्रकृति ने सभी को विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाया है | कोई पूरी उम्र सेक्स के विषय में नहीं सोचता और कोई एक क्षण भी सेक्स की कल्पना किये बिना नहीं रह पाता | उनकी नकल मत कीजिये जिन्होंने विवाह नहीं किया और महान योगी या सिद्ध कहलाये, स्वयं को जानिये और पहचानिए | दूसरों के जूतों में पैर डालने की आदत छोड़ दीजिये | ये झूठे वाह-वाही, ये सम्मान इन सबका मोह त्याग दीजिये… यदि आपको लगता है कि आपके योग्य कोई मिल गया है तो विवाह आवश्य कीजिये | विवाह करना बलात्कार करने से लाख गुना अच्छा व प्राकृतिक है | ~विशुद्ध चैतन्य

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