आधुनिक परिभाषायें कर्म, नैतिकता, धार्मिकता और राष्ट्रभक्ति की

कर्मण्येवाधिकारस्ते……..कर्म किये जाओ फल की चिंता मत करो…

लोग अपना कर्म करते, मस्ती से रहते, नाचते गाते, चैन से सोते….न कोई चिंता न कोई भय | फिर कुछ लोग बाहर से आते हैं, वे बताते हैं कि तुम लोग बहुत ही पिछड़े हुए हो, तुम्हारा विकास करना होगा, इसीलिए तुम्हें अपना सुख त्याग कर हमारी गुलामी करनी होगी | अपने खेत हमें दे दो, अपनी जमीनें हमें दे दो और करो नौकरी हमारी | जिन्होंने इनकार किया, उन्हें कोड़े मारे गये, गोलियों से छलनी कर दिया गया, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार किया गया….क्योंकि हर हाल में पिछड़ों का विकास करना जरुरी था नहीं तो उनका ईश्वर उन्हें माफ़ नहीं करता |

तो विकास हो गया एक दिन और वह सुख चैन, आराम सब गायब हो गया…अब हर कोई डरा हुआ है कि न जाने कब नौकरी चली जाए, न जाने कब गैर मजहब का कोई हमला कर दें, न जाने कब सरकार नोट्बंदी कर दे….हर तरफ डरा सहमा इंसान लेकिन भ्रम में जी रहा है सभ्य, धार्मिक, उन्नत, आधुनिक होने के | आजीवन केवल पैसे कमाने की मशीन बनकर जीने वाला यह इंसान यही भूल गया कि जीना किसे कहते है | जीते जी वह कभी नहीं जान पाता कि वह जिसे इकठ्ठा करने की दौड़ में दौड़ रहा है, वह छूट जाना है एक दिन, और जो जीवन के लिए महत्वूर्ण था, जिसके लिए हम इस दुनिया में आये थे, उसे ही हम आजीवन नहीं पहचान पाते | बस मृत्यु जब निकट आती है, तभी समझ आती है कि दौड़ ही गलत ट्रेक पर रहे थे, जैसे कि पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पारिरकर को समझ में आ गयी |

कर्म किये जाओ फल की चिंता मत करो

 सारी दुनिया ही दौड़ पड़ी कर्म करने बिना परिणाम की चिंता किये….कोई लूट रहा है किसी को, तो कोई हत्या कर रहा, कोई हेराफेरी कर रहा है, कोई घोटाले कर रहा है कोई झूठ बोलने विश्वरिकॉर्ड बनाना चाहता है तो कोई अपने ही देश की जनता के साथ विश्वासघात करने में…..लेकिन हर कोई कर्म में लगा है बिना यह सोचे कि परिणाम क्या होगा आगे चलकर | और ये ही कर्मवादी, मेहनती लोग, अट्ठारह अट्ठारह घंटे काम करने वाले लोग दुनिया को सिखा रहे हैं धार्मिकता, नैतिकता और राष्ट्रभक्ति | और वह भी बेईमानों, मक्कारों, अपराधियों, माफियाओं का साथ देकर, उनको सुरक्षा व संरक्षण देकर |

लेकिन जो लोग गाँवों, देहातों, दुर्गम वनों में चैन से जी रहे थे, उनसे उनका चैन छीन लिया इन्होंने विकास के नाम पर | उनसे उनकी स्वतंत्रता छीन ली विकास के नाम पर, उनसे उनका प्राकृतिक आवास और जीवन शैली छीन ली विकास के नाम पर | शिक्षा के नाम पर उन्हें अशिक्षित बना दिया कागजी डिप्लोमा, डिग्रियाँ और धार्मिक, आसमानी, हवाई किताबें पकड़ाकर |

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कर्म तो आदिवासी, किसान भी कर ही रहे थे, लेकिन किसी का अहित नहीं कर रहे थे | चैन से जी रहे थे, वनों खेतों की सुरक्षा कर रहे थे, समाज को अन्न व जल उपलब्ध करवा रहे थे | लेकिन सभ्य, नैतिक व धार्मिक समाज को वे असभ्य और जंगली नजर आते हैं | इन्हें लगता है कि ये ही सही हैं और बाकी सब गलत और जो गलत हैं इनकी नजर में, उन्हें दुनिया से ही विदा कर दिया जाना चाहिए, उनकी संपत्ति छीन ली जानी चाहिए |

अधिकांश धार्मिक व नैतिकता के ठेकेदारों का मानना है कि पुस्तकों में जो कुछ भी लिखा है, विशेषकर आसमानी, हवाई, ईश्वरीय पुस्तकों में, वे अकाट्य सत्य हैं | यह और बात है कि उन पुस्तकों में जो कुछ लिखा है उनकी परिभाषायें इतनी सारी हैं कि उनके लिए अलग से ही कई और ग्रन्थ लिखने पड़ गये | और उन ग्रंथो में भी आपस में विरोधाभास है, इसलिए हर सम्प्रदाय की ही कई और शाखायें और पंथ बन गयीं और वे अपने ही धर्म के दूसरे पंथों को गलत बताते हैं और खुद को सही |

इससे यह तो सिद्ध हो जाता है कि जो कुछ भी पुस्तकों में लिखा होता है, वे अकाट्य सत्य नहीं होतीं और हर पढ़ने वाले की मानसिक स्थिति व योग्यता के अनुसार उसमें जो कुछ भी लिखा होता है, उसके अर्थ या परिभाषायें बदल जाती हैं | फिर काल, स्थान व आवश्यकतानुसार भी अर्थ और परिभाषायें बदल जाती हैं | तो आइये आज मैं ऐसे शब्दों के आधुनिक अर्थ व परिभाषाएं बताता हूँ, जो भारतीय जनमानस के हृदय में बसता है, जिनके बिना भारतीय समाज का आस्तित्व नहीं |

धर्म और धार्मिकता

भारतीयों की रीढ़ की हड्डी है धर्म और धार्मिकता | यदि धर्म हटा दिया जाये तो भारतीयों का आस्तित्व ही मिट जाएगा क्योंकि बिना धार्मिक हुए भारतीय जी नहीं सकते | धार्मिकता इनके लिए उतनी ही अनिवार्य चीज है, जितनी कि किसी के लिए बुर्का तो किसी के लिए घूँघट, तो किसी के लिए जींस तो किसी के लिए खाकी निक्कर | यदि कोई इनके धर्म और धार्मिकता के साथ छेड़छाड़ करे, यानि कोई बुर्का फाड़ दे, निक्कर खींच दे, जींस में कीचड़ फेंक दो इनको बहुत क्रोध आ जाता है और ये जान के दुश्मन बन जाते हैं | यह और बात है कि जिस धर्म और धार्मिकता में भारतीयों के प्राण अटके हुए हैं, उस धर्म और धार्मिकता का वास्तविक धर्म व धार्मिकता से कोई लेना देना है ही नहीं | पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं, परम्पराओं, कर्मकाण्डों को ढोने और दूसरों पर थोपने का नाम ही इन्होने धर्म रख दिया और वास्तविक धर्म से कोसों दूर हो गये |

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नैतिकता पर टिका भारतीय समाज

नैतिक का अर्थ होता है नीतिगत अर्थात नीति के अनुरूप | अब नीति क्या है यह प्रश्न उठेगा ?

नीति का अर्थ होता है; लोक–व्यवहार हेतु नियत किया गया आचार या आचरण | उदाहरण के लिए झूठ न बोलना, चोरी न करना, रिश्वत न लेना, पराई स्त्री, संपत्ति या भूमि पर कुदृष्टि न डालना, दूसरों से बिना पूछे या बलात कोई वस्तु न लेना, अपने दायित्वों, कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान रहना, किसी से छल-कपट न करना, किसी से विश्वासघात न करना, किसी को झूठे आश्वासन या वचन न देना, आयु में अपने से बड़ों का सम्मान करना, कभी भी किसी से अशोभनीय या अभद्र भाषा न बोलना, सदैव शालीनता व मर्यादा का पालन करना….आदि वे नीति हैं जो लोकव्यहार के लिए अनुभवी विप्रजनों ने बनाए ताकि समाज में सुव्यवस्था बनी रहे और सभी परस्पर मिलजुल कर रहें |

तो जो भी उपरोक्त नियमों या नीति का पालन करता है, उसे नैतिक कहा जाता है और ऐसी सभी शिक्षाओं को नैतिक शिक्षा कहा जाता है | किन्तु जैसे जैसे हम आधुनिक होते गये, नैतिकता की परिभाषा बदलती चली गयी |

हम जब छोटे थे, तब किसी को गाली देना भी अनैतिक माना जाता था | हम किसी से कोई अपशब्द नहीं कह सकते थे और यदि कह भी दिए कभी, तो स्कूल में भी मार पड़ती थी और घर पर भी, क्योंकि कोई न कोई मुखबिर घर पहले ही मुखबिरी कर आता था | किन्तु आज गाली देना आधुनिक, पढ़े-लिखे होने की पहचान बन गयी | यदि कोई गालियाँ देकर बात नहीं करता, तो कोई उसे सीरियसली लेता ही नहीं |

रिश्वतखोरी आज नैतिक रूप से अतिरिक्त आय का माध्यम बन चुका है और समाज इसे बिलकुल भी गलत नहीं मानता, बल्कि स्वयं ही चपरासी से लेकर ईश्वर तक को चढ़ावा, चायपानी, सेवा के नाम पर रिश्वत देता है | बिना रिश्वत दिए आज कोई भी सरकारी काम करवाना लगभग असंभव हो गया है | क्योंकि रिश्वतखोरी आज भारतीयों की नैतिकता में शामिल हो चुका है |

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नैतिक शिक्षा यह भी है कि कभी किसी अधर्मी, अपराधी, लुटेरों का साथ मत दो | लेकिन आज ऐसा करना गर्व व सम्मान की बात मानी जाती है | जो जितना बड़ा अपराधी होगा, जो जितना बड़ा लुटेरा होगा, जिस पर जितने बड़े बड़े अपराधिक मुक़दमे दर्ज हुए पड़े होंगे, जनता उनका उतना ही अधिक सम्मान करती है | क्योंकि अपराध, लूट-पाट, घोटाले, रिश्वतखोरी आदि सभी नैतिकता में शामिल हो चुके हैं | अब ये सभी नैतिक कर्म हैं |

अर्थात नैतिकता की परिभाषा समय, आवश्यकताओं के अनुरूप बदल जाती है |

राष्ट्रभक्ति की आधुनिक परिभाषा

प्राचीन काल में राष्ट्रभक्ति या देशभक्ति राष्ट्र या देश के प्रति निष्ठा को माना जाता था | और राष्ट्रभक्त होना या देशभक्त होना गौरव की बात थी | राष्ट्रभक्ति या देशभक्ति तो आज भी गौरव की बात है, लेकिन राष्ट्रभक्ति की परिभाषा बदल गयी | अब देश या राष्ट्र के प्रति निष्ठा को राष्ट्रभक्ति नहीं माना जाता, बल्कि किसी नेता या पार्टी के प्रति निष्ठा को राष्ट्रभक्ति माना जाता है | अब देश लुटता है तो लुट जाये, देश बिकता है बिक जाये, देश के नागरिक मरते हों तो मर जाएँ…किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता | लेकिन नेता या पार्टी चाहे ठग हों, बदमाश हों, झूठे हों, मक्कार हों, देशद्रोही हों…..उनके प्रति निष्ठा में आँच नहीं आनी चाहिए | यही राष्ट्रभक्ति है क्योंकि अब देश या राष्ट्र महत्वपूर्ण नहीं, नेता और पार्टी महत्वपूर्ण हो गये | इसीलिए अब जो नेता व पार्टी भक्त होता है वह गर्व से स्वयं को राष्ट्रभक्त  या देशभक्त कहता है और जो उनके नेता या पार्टी का विरोधी होता है उन्हें देशद्रोही कहता है |

इस प्रकार हमने जाना कि भारतीयों ने बहुत ही विकास कर लिया और प्राचीन रुढ़िवादी मान्यताओं को त्याग कर नवीन आधुनिक मान्यताओं को अपना लिया | यह और बात है कि हम जैसे कुछ ढीठ लोगों को ये नवीन नैतिकता, धार्मिकता व राष्ट्रभक्ति रास नहीं आ रही, लेकिन हम विवश हैं यह देखने और सहने के लिए | क्योंकि दुनिया बहुत तेजी से विकास कर रही है और हम उस विकास के साथ ताल-मेल नहीं बैठा पा रहे |

~विशुद्ध चैतन्य

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