धर्म का आविष्कार आप लोग ने किया है . क्या आपके नजर में हम अधर्मी हैं ?

एक मित्र ने प्रश्न किया, विशुद्ध चैतन्य जी मै एक आदिवासी हुँ और हमारे पूर्वजों ने कोई धर्म नहीं बनाया है . हम बचपन में जानते ही नहीं थे कि हमारा धर्म क्या है . लेकिन सरकारी व्यस्था माँगता है आपका धर्म . जब स्कूल जाना शुरू किया स्कूल में धर्म जरुरी था और हमलोग दूसरों का देखा देखी कभी हिंदू लिखते कभी सारना लिखते. लेकिन आज हमे समझ नहीं आ रहा है धर्म का मर्म. हमारे पूर्वज प्रकृति के सानिध्य रहकर प्रकृति के अनुकूल आदिवासी सभ्यता संस्कृति का विकास किया है और हमारा ये ही सब कुछ है . धर्म का आविष्कार आप लोग ने किया है . क्या आपके नजर में हम अधर्मी हैं ? कृपया मार्गदर्शन करें. मैं आपका हर पोस्ट को पढता हुँ और आपको थोडा बहुत समझ पाया हूँ..” –भुजंग टुडू

Root Bridge:
आदिवासियों ने पेड़ों की जड़ों से को ही इस प्रकार दिशा दी कि एक पुल का निर्माण हो गया |
न पेड़ों को क्षति पहुँचाई गयी और न ही प्राकृतिक संपदा को | यही है सनातन धर्म |

यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि जहाँ खुद को सभ्य व उन्नत कहने वाला पढ़ा लिखा समाज भेड़ बुद्धि से भेड़चाल में जी रहे हैं, वहीँ आपने इन भेड़ों के बीच एक जागृत व्यक्ति के रूप में परिचय दिया | आपका प्रश्न ही यह दर्शा रहा है कि आप पूर्वजन्म में ही अध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर चुके थे | आपने अपने पूरे समाज की असमंजसता को बहुत ही संजीदगी से अनुभव किया और इस ओर प्रयासरत हुए कि यह समझा जाए कि वास्तव में धर्म क्या है | मुझे प्रसन्नता हुई कि आपने मुझे इस योग्य समझा कि अपनी उलझन मुझसे शेयर कर सकें |

थोड़ी देर के लिए धर्मशास्त्रों, पंडितों पुरोहितों को अलग कर दीजिये और बिलकुल प्रकृति के स्वतंत्र वातावरण की कल्पना कीजिये | थोड़ी देर के लिए आप भूल जाइए कि आप पढ़े-लिखे हैं, अंग्रेजी बोलते हैं, नौकरी करते हैं…. आदि इत्यादि | कल्पना कीजिये कि किसीने आपको एक बहुत ही बड़ी जमीन दी है, जिसमें नदी-नाले, पहाड़, जंगल, तालाब, झील, फूल पौधे, फलदार वृक्ष हैं | इस जमीन में और भी प्राणी हैं और आपको इस जमीन पर व्यवस्था बनाए रखनी है | देने वाले ने आपको इस योग्य समझा कि आप इस जमीन को और अधिक सुंदर बनायेंगे और नहीं तो कम से कम जैसी है वैसी तो रहने ही देंगे | आपसे यह अपेक्षा रही कि आप केवल अपनी आवश्यकतानुसार ही जमीन का उपयोग करोगे, न कि दूसरों के अधिकारों का हनन करोगे | आपने जंगल से लकड़ी ली, घर बनाया, चूल्हा जलाया, शिकार किया भोजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए क्योंकि फल और शिकार ही आपके पास था भोजन के लिए | केवल फल ही खायेंगे, या हरी सब्जियां ही खायेंगे तो यह भोजन उनके लिए भी है जो शाकाहारी हैं | एक समय ऐसा आ जाएगा कि व्यवस्था बिगड़ जायेगी इसलिए मानव सर्वभक्षी होने का गुण मिला | जहाँ बर्फ ही बर्फ हैं, खेती नहीं हो सकती, वहां शिकार ही मुख्य आधार है जीवन का | पहाड़ों में रहने वाले, समुद्री तटों में रहने वालों के लिए समुद्री जीव ही जीवनदाई हैं | इस प्रकार ईश्वर ने एक व्यवस्था स्वतः ही बना दिया कि पृथ्वी की जनसंख्या नियंत्रित भी रहे और जीवन चक्र भी चलता रहे |

The Khasi tribe in India builds living bridges

वहीँ मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले मानव शाकाहारी हुए क्योंकि उनके लिए खेती करना आसान व सहज था | उनके लिए जीवन उतना कठिन नहीं था, जितना कि पहाड़ों, समुद्री तटों, और हिम आच्छादित क्षेत्रों के प्राणियों के लिए होता है | उन्होंने व्यवस्था बनाये रखने के लिए कुछ नियम बनाए, जिसके अंतर्गत दुधारू व कृषि योग्य पशुओं की हत्या को रोकने का प्रयास किया गया | चूँकि कृषि योग्य क्षेत्र अधिक था, तो शाकाहार पर अधिक बल दिया गया | धीरे धीरे वह उनके जीवन में स्थाई व्यवस्था के रूप में बैठ गया और उनके लिए माँसाहार अब असहज हो गया | वे मांसाहर करना तो दूर, कल्पना मात्र से विचलित होने लगे | फिर अवागमन की सुविधा का विकास हुआ और लोग दूर दूर तक भ्रमण करने लगे | इन मैदानी क्षेत्रों के लोगों का सामना जब पहाड़ी, आदिवासियों से हुआ तब इन्हें आश्चर्य हुआ कि ये लोग माँसाहार करते हैं, जीवों की हत्या करते हैं भोजन के लिए | यहाँ दो समाज भिन्न परिवेश और जलवायु के लोगों का आमना-सामना हो रहा था | उन्होंने जब निर्दयता से जीवों की हत्या करते हुए आदिवासियों को देखा तो उनको ये पशु समान लगे, क्योंकि उनकी दृष्टि में जो जीव हत्या नहीं करते भोजन के लिए, वे श्रेष्ठ हैं और जो करते हैं, वे निकृष्ट हैं | ये अभिमान में यह भी भूल गये कि जीव हत्या तो ये भी कर रहे हैं, बस उनका कष्ट इनको दिखता नहीं | इन्हें कभी यह समझ में नहीं आया कि जीवन चक्र को सुचारू रखने के लिए जीवन ही चाहिए | एक आलू और एक अंडे में कोई भेद नहीं है, यदि हम जीवन की बात करें | दोनों में जीवन छिपा होता है, दोनों का उद्देश्य वंशवृद्धि होता है | दोनों ही उपयुक्त वातावरण मिलने पर नए जीवन को आस्तित्व में आने का अवसर प्रदान करते हैं | लेकिन एक शाकाहार में आता है और शुभ माना जाता है, वहीँ दूसरा मांसाहर और जीव हत्या की श्रेणी में आता है |

आदिवासी चूँकि ईश्वरीय सत्ता व नियमों के अनुकूल जीवन यापन कर रहे थे यानि सनातन धर्म के अंतर्गत चल रहे थे, इसलिए उनको किसी की भूमि हथियाने या अधिग्रहण की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी | वे प्राकृतिक संतुलन बनाये हुए नृत्य-संगीत का आनंद लेते हुए जी रहे थे | वहीं मैदानी क्षेत्रों के लोगों के पास जगह की कमी पड़ने लगी क्योंकि उन्होंने प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ना शुरू कर दिया था | शाकाहार के नाम पर अधिक खेती होने लगी | पशुओं और मानवों की बढ़ती जनसँख्या के कारण अधिक अनाज व वनस्पतियों की आवश्यकता पड़ने लगी | वनों को, वृक्षों को चूँकि ये लोग निर्जीव पदार्थों में गिनते थे, इसलिए निःसंकोच वृक्षों की हत्या की जाने लगी…… और इस प्रकार आज ये लोग विकसित व सभ्य कहलाने लगे क्योंकि इन्होने जंगलों, वृक्षों से जीने का अधिकार छीनकर अपने लिए कंक्रीट के जंगल खड़े कर लिए | जिस प्रकार वन्य जीवों के जीने का अधिकार छीन लिया वृक्षों को काटकर, वैसे ही अब आदिवासियों के जीवन व प्राकृतिक निवास छीन रहे हैं…. क्योंकि ये लोग खुद को श्रेष्ठ व सभ्य मानते हैं |

लेकिन आदिवासी इनकी तरह उन्नत नहीं हो पाए, वे जंगलों को खोकर जी नहीं सकते थे | वे वृक्षों की पूजा करते थे, वे नदियों की पूजा करते थे, वे पहाड़ों की पूजा करते थे, वे सूर्य और चन्द्र की पूजा करते थे, क्योंकि इनसे आदिवासियों को जीवन में मिलता था | जब तक ये सब हैं, आदिवासियों का आस्तित्व है | जिस दिन ये जंगल मिट जायेंगे, ये पहाड़ खो जायेंगे, मानव जाति ही मिट जायेगी | लेकिन आदिवासियों को समझाया जाने लगा कि धार्मिक बनो, नौकरी करो, किसी धनि व्यक्ति की दया पर जीना ही पुण्य है, ईश्वर या प्रकृति की गोद में जीना अधर्म है | इस प्रकार धर्म और अधर्म की उलझन खड़ी हो गयी | अब जीव हत्या अधर्म हो गया और पैसे लेकर मानव हत्या करना पुण्य हो गया | अब आदिवासियों की भूमि हथियाना पुण्य हो गया और आदिवासियों को न्याय देना पाप हो गया | क्योंकि आदिवासी अधर्मी थे, वे भोजन के लिए जीव हत्या करते थे, जबकि चमड़े और हड्डियों के लिए व्यवसाय करने वाले सभ्य व सम्मानित वर्गों में गिने जाने लगे, वे महान धार्मिक हो गये | आयुर्वेद जो कि प्राकृतिक चिकित्सा विधि है उसे ही हमने खो दिया और जीवों की हड्डियों, मानव भ्रूणों, हृदय, गुर्दा आदि से बनी विदेशी औषधियाँ लेना आधुनिकता की पहचान हो गयी |

मैं जानता हूँ कि यह लेख बहुत ही लम्बा हो गया, लेकिन आवश्यक था आपके प्रश्न के उत्तर देने के लिए | क्योंकि जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि धर्म क्या है, सामाजिक नियम व आचरण को ही धर्म मानेंगे | और हर समाज का अपना ही नियम व आचरण होता है उस स्थान, जलवायु व प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर | एस्कीमों व अन्य बर्फीले, समुद्री, व पहाड़ी प्रदेशों के समाजिक नियम मैदानी प्रदेशों के नियमों से भिन्न होंगे | उनके पाप और पुण्य मैदानी क्षेत्रों के पाप और पुण्य से भिन्न होंगे |

आपका प्रश्न कि सरकार पूछती है धर्म क्या है और आप कभी हिन्दू लिखते हो, कभी सरना लिखते हो… तो दोनों ही धर्म नहीं हैं | ये दोनों ही सम्प्रदाय हैं और हर सम्प्रदाय के अपने सामजिक नियम व आचरण होते हैं | धर्म वास्तव में एक ही है और वह है सनातन धर्म | सनातन अर्थात जो सदा से है और सदा रहेगा |

सनातन का अर्थ श्रीमदभागवत के अध्याय २, श्लोक २४ से भी समझ सकते हैं | यहाँ आत्मा को सनातन बताया गया है;

अच्छेद्योऽयमदाह्रोऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।

नित्य: सर्वगत स्थाणुरचलोऽयं सनातन: ।।24।।

क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्रा, अक्लेद्य और नि:सन्देह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है ।।24।। 

For this soul is incapable of being cut; it is proof against fire, impervious to water and undriable as well. This soul is eternal, omnipresent, immovable, constant and everlasting.(24)

इस धर्म के अंतर्गत कुछ प्रमुख व्यव्हार व गुण आते हैं जो प्रकृति प्रदत्त है न कि मानव निर्मित | जैसे, दया, क्षमा, प्रेम, सहयोगिता, विनिमयता, प्रकृति से जो लिया उसे वापस करने की योग्यता विकसित करना अर्थात जीवन चक्र का संतुलन बनाये रखना | ये सभी सनातन धर्म के अंतर्गत आते हैं और आदिवासी शुद्ध सनातनी हैं क्योंकि वे इन सभी नियमों का पालन स्वविवेकानुसार आदिकाल से ही करते आ रहे हैं | सनातन धर्म आत्मा से जुड़ा हुआ है या कहें कि शरीर के साथ भी है और शरीर के बाद भी | बाकी सभी स्वघोषित धर्म जैसे, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध…. आदि को हम धर्म भी मान लें तो ये केवल भौतिक जगत तक ही सीमित हैं अर्थात सनातन नहीं हैं | ये सत्ता, धन व सुरक्षा पर आधारित हैं | इनके धर्म में जो सबल है वह हर पाप करने के लिए स्वतंत्र है और जो दुर्बल हैं, वे अपने जीवन रक्षा के लिए चोरी भी करे तो सजा दे देंगे | सबल करोड़ों अरबों के घोटाले कर लें, राष्ट्र की संपत्ति को क्षति पहुँचायें, कोई पाप नहीं लगेगा, बल्कि अगले चुनाव में बेशर्मी से खड़े भी हो जायेंगे हाथ जोड़कर और जीत भी जायेंगे | इसलिए यदि आप इनको धर्म मानेंगे तो आपको धनी या समृद्ध होना आवश्यक है | इनके धर्म में आने से आप समृद्ध नहीं हो जायेंगे और न ही इनका ईश्वर आपकी कोई सहायता करेगा | क्योंकि इनके ईश्वर जो सोने चांदी और गहनों के शौक़ीन हैं… उनको खुश करने लायक चढ़ावा आप नहीं चढ़ा पायेंगे | इसलिए अच्छा है कि सनातन धर्म को ही अपनाएँ | सनातन धर्म ही है जो सभी पशु-पक्षी, तारे नक्षत्र अपनाए हुए हैं | वे हिन्दू या मुसलमान नहीं बने फिरते और न ही धर्मों के नाम पर आपस में लड़ते झगड़ते हैं | आदिवासियों की भी लड़ाई कभी धर्मों के नाम पर नहीं होती, होती भी है तो भूमि, स्त्री, या आपसी मतभेदों से होते हैं और वह स्वाभाविक है | फिर जैसा कि मैंने कहा कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख इसाई आदि देश, काल वे परिवेश पर आधारित हैं, तो आप हिन्दू होंगे तो हिन्दुओं में ब्राह्मणों के अधीन रहना पड़ेगा | वे शाकाहारी हैं तो आपको भी शाकाहारी होना पड़ेगा वरना दुनिया भर का पाप लगेगा और निंदा होगी सो अलग | यदि आप मुस्लिम सम्प्रदाय को चुनेंगे तो आपको अरबी रीतिरिवाज मानना पड़ेगा, अरबियों को पसंद है वही आपको भी अपनी पसंद बनानी होगी, किसी मौलवी के आदेश पर अपने ही बचपन के काफ़िर दोस्त की हत्या करनी होगी, उनके घर जलाने होंगे | सिख हुए या इसाई हुए तो उनके अपने नियम और कानून हैं…… चूँकि आप स्कूल में पढ़ाते हैं तो आप जानते ही होंगे कि हर स्कूल के अपने अपने नियम, ड्रेस आदि होती है | ठीक वैसे ही सभी सम्प्रदायों के अपने अपने ड्रेस हैं तिलक है टोपी हैं | फिर इन सभी सम्प्रदायों में ही इतनी उंच नीच व तौर तरीके हैं कि आप का जीना मुश्किल हो जाएगा |

इसलिए ही सनातन धर्म ही मानव ही नहीं सभी जगत के सभी प्राणियों के लिए अनुकूल है ठीक वैसे ही जैसे जल और वायु | यहाँ हिरन और शेर एक ही जंगल में आराम से जी सकते हैं लेकिन मानव निर्मित धर्म में आप चैन से नहीं जी सकते | कभी दंगा, कभी बलात्कार, कभी आगजनी…. बस यही सब देखते सुनते और झेलते हुए जीना पड़ेगा | आपसी सद्भाव जो आदिवासियों में रहता है वह इन सामाजिक रूप से उन्नत कहे जाने वालों में नहीं देखने मिलेगा |

इसलिए आप गर्व से कह सकते हैं कि आप सनातनी हैं अर्थात ईश्वरीय नियमों के अंतर्गत जीवनयापन करने वाले | हिन्दू हैं, मुस्लिम हैं, सिख इसाई या और जितने भी मानव निर्मित धर्मों वाले सम्प्रदाय हैं, उनमें से किसी को भी आप अपनी सुरक्षा या उपयोगिता के अनुसार चुन सकते हैं | आप इनमें से किसी भी सम्प्रदाय को चुनें, लेकिन जिस दिन भी आप सनातन नियमों के विरुद्ध हो जायेंगे, जीवन कष्टमय होने लगेगा | उदाहरण के लिए आप किसी भी सम्प्रदायों के अंतर्गत लोगों को देखें तो पायेंगे कि सभी सम्प्रदाय अंपने से कमजोरों की सहायता कर पाने में असमर्थ हो चुके हैं | आप देखेंगे कि चाहे हिन्दू हों, चाहे मुस्लिम हों, चाहे इसाई, हों…. सभी सम्प्रदायों में भुखमरी, दरिद्रता धूर्तता मिल जाएगी | लेकिन आप कभी किसी ऐसे क्षेत्र में जाएँ जहां ये तथाकथित धार्मिक सभ्य समाज के पैर नहीं पड़े हैं, आप पायेंगे कि वहाँ कोई गरीबी नहीं है | वे सुखी हैं, शाम को पूरा कबीला साथ बैठकर नृत्य संगीत का आनंद लेते हैं | वे न जंगलो को बर्बाद करते हैं और न ही पशुओं की प्रजाति लुप्त करते हैं |

आशा करता हूँ कि मेरे इतने लम्बे उत्तर से आपको कुछ लाभ अवश्य हुआ होगा | फिर भी कोई उलझन हो, या असहमति हो मेरे उत्तर से तो निःसंकोच फेसबुक पर मैसेज करके या कमेन्ट करके अपना पक्ष अवश्य रखें | ~विशुद्ध चैतन्य

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