अब आप सोच रहे होंगे कि यह सब मैंने क्यों लिखा ?

बचपन में श्रीकृष्ण की कहानियाँ सुनता था तो श्रीकृष्ण से प्रभावित रहा | सात आठ साल की उम्र में श्रीकृष्ण बनकर लड़की छेड़ने के चक्कर में पिटा, तभी समझ में आ गया था कि श्रीकृष्ण व्यवहारिक नहीं हैं | मोहे पनघट में नन्द लाल छेड़ गयो रे…. कोई लड़की मेरे लिए नहीं गाने वाली, उलटे पिटवाएगी ही | कृष्ण का दूसरा रूप माखनचोर का… तो माखन में अपनी कोई रूचि थी नहीं, लेकिन आमों में बड़ी रूचि थी | तो आम चुराने निकल पड़ते थे जय श्रीकृष्ण करके | लेकिन यहाँ भी जाना कि श्रीकृष्ण व्यावहारिक नहीं हैं, क्योंकि माली पीटते पीटते घर तक छोड़ जाता था और घर में पिटाई होती ही थी, दूसरे दिन स्कूल में भी मुर्गा बनना पड़ता था अगर किसीने मास्टर जी को बता दिया |

फिर गुणीजनों ने समझाया कि श्रीकृष्ण आदर्श हैं, भगवान हैं, अवतार हैं उन्हें आचरण में उतारना नहीं है, बल्कि उनसे अच्छी सीख लेनी है…. अच्छी सीख तो ली नहीं….लड़की छेड़ने की सूझ गयी ?

अपने बस का तो है नहीं गोवर्धन उठाना, चक्र घुमाना, कल्कि वध करना आदि….तो हमने पुराने टायर ही सड़कों पर दौड़ाना शुरू कर दिया.. उसी में श्रीकृष्ण के प्रति श्रृद्धा भाव बनी रही क्योंकि अब पिटाई नहीं होती थी |

इसी प्रकार धीरे धीरे समझ में आया कि दुनिया कितनी दोगली है | श्रीकृष्ण लड़कियां छेड़ते हैं तो उसे रस ले ले कर सुनाते हैं, हम छेड़ें तो पिटाई मिलती है और आजकल तो सीधे श्रीकृष्ण की जन्म स्थली अर्थात कारागार की व्यवस्था कर दी गयी है | लेकिन लोग हैं कि गाये जा रहे हैं… मोहे पनघट में नंदलाल छेड़ गयो रे..

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मैं दुनिया को जितनी सहज समझ रहा था, उतनी थी नहीं.. हर कोई मुखौटा लगाए मिला इसलिए हमेशा धोखा खाया | जिसे मैंने प्रेम किया उसने मुझे भाई बना लिया और जिसने मुझे प्रेम किया उसे मैंने बहन बना लिया… तो इस भाई-बहन के रिश्ते से आगे कहानी कभी बढ़ी ही नहीं | जीवन धीरे धीरे कब एकांकी हो गया पता ही नहीं चला | और फिर एक दिन रहस्य खुला कि मुझे समझने वाला इस दुनिया में आया ही नहीं और अब मुझे अकेले ही इस दुनिया में वह करना है जिसे करने के लिए इस दुनिया में आया था | लोग मिलेंगे लेकिन मतलब से मिलेंगे इसलिए ईश्वर ने व्यवस्था की एकांतवास की | और तब से लेकर आज तक एकांतवास चल रहा है…

अब आप सोच रहे होंगे कि यह सब मैंने क्यों लिखा ? 🙂

केवल इसलिए कि मेरी ही तरह कितने और लोग होंगे जो इस बात से दुखी होंगे कि वे अकेले हैं | उन्हें बताना चाहता हूँ कि आप अकेले केवल इसलिए हैं क्योंकि कुछ महत्वपूर्ण करना है इस जीवन में | स्वयं को खोजिये, दुनिया की नकल मत करिए | नकल करने वालों की कोई कमी नहीं है इस दुनिया में | हर कोई दूसरों देखकर ही जी रहा है…बहुत कम लोग हैं इस दुनिया में जिन्हें ऐसा सुनहरा अवसर मिलता है स्वयं को खोजने का | बस जीवन में यह ध्यान रखें कि आप किसी का शोषण न करें, किसी पर अत्याचार न करें, किसी की मजबूरी का लाभ न उठायें, किसी को आर्थिक शारीरिक, या मानसिक कष्ट न पहुँचायें | क्योंकि ये सारे काम स्वयं को खोजने वालों के लिए नहीं हैं | उन्हें तो अपनी ही खूबियों, अपनी ही छुपी हुई प्रतिभाओं को खोजना है | आप स्वयं को पाने से अधिक दूसरों को पाने में रूचि लेंगे तो वह प्रेम नहीं, वस्तु ही होगी और जिससे आपको जल्दी ही ऊब हो जायेगी जैसे कि अधिकांश शादी-शुदा के साथ होता है | लेकिन जिस दिन आप स्वयं को खोज लेंगे उस दिन हो सकता है कि आपको बिना दिखावे के ही वास्तविक प्रेम से भेंट हो जाय | तब आपको कोई जतन करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | तब वह प्रेम आपके उद्देश्यों को पूरा करने में सहयोगी ही होगा | क्योंकि प्रकृति ने स्वतः ही ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि आप जिस मार्ग पर चलना चाहें, अच्छा हो या बुरा, आपको सहयोगी मिल ही जायेंगे | एक अत्याचारी को भी सहयोगी मिल जाते हैं और एक संत को भी सहयोगी मिल जाते हैं | अत्याचारी को भी प्रेम करने वाले मिल जाते हैं और संत को भी प्रेम करने वाले मिल जाते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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