राष्ट्रहित और जनप्रतिनिधि

हम भारतीय जिस दिन राष्ट्र व राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने, समझने लगेंगे, उस दिन हम देश की 70% समस्याओं से स्वतः ही मुक्त हो जायेंगे | लेकिन भारतीय समाज में बचपन से राष्ट्र के प्रति निष्ठा, समर्पण को महत्व देना नहीं सिखाया जाता, बल्कि इस विषय को एक सप्लीमेंट्री के रूप में रखा जाता है | बच्चों को बचपन से अपनी जाति, अपने मजहब/पंथ/सम्प्रदायों पर गर्व करना और उसके लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देना सिखाया या समझाया जाता है | बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि राष्ट्रिय संपत्ति को क्षति पहुँचाना स्वयं की संपत्ति को ही क्षति पहुँचाना होता है, बल्कि यह सिखाया जाता है कि जब माँगे पूरी न हों तो रेल की पटरियाँ उखाड़ दो, बसों में तोड़ फोड़ करो, वाहनों को आग लगा दो…क्योंकि ये सब अपनी नहीं हैं किसी और की हैं |
ऐसा नहीं है कि ये साम्प्रदायिक, कबीलाई गुणधर्म को अभी हाल ही की है, ये तो हमारे जींस में, हमारे संस्कारों में ही समाहित है | हमारे खून में ही यह बात बैठ गयी है कि देश रहे न रहे, देश समृद्ध हो न हो, जातिवाद बनी रहनी चाहिए, धर्म व जाति के नाम पर घृणा व वैमनस्यता बनी रहनी चाहिए | आप संविधान व कानून की किताबें चाहें देखें भी नहीं, लेकिन आसमानी और ईश्वरीय किताबों के दर्शन दिन में दो बार तो अवश्य करने चाहिए |
मैंने जानता हूँ कि अब समाज को यह समझा पाना कठिन है कि हम सनातनी हैं और हमारे लिए राष्ट्र व उसकी एकता-अखंडता व समृद्धि हमारे लिए सर्वोपरि है | हमें संकीर्ण मानसिकता से मुक्त होकर सनातनी होना ही होगा तभी हम विश्वरूप को समझ पाएंगे, तभी हम अपने भीतर वह विराटता का अनुभव कर पाएंगे जो हम प्राकृतिक रूप से हैं | ये संकीर्णता तो थोपी हुई है, कोई हमारा स्वाभाविक गुणधर्म तो है नहीं, तो हम ये थोपी हुई मानसिकता से स्वयं को मुक्त क्यों नहीं कर लेते ? हम और हमारा राष्ट्र समृद्ध होगा, तभी तो हम पड़ोसी राज्यों को समृध्द होने में सहयोग कर पाएंगे ? लेकिन हम तो बास्केट में रखे केकड़े बन चुके हैं | न खुद ऊपर उठना चाहते हैं और न ही किसी और को ऊपर उठता देख सकते हैं | जो समाज को जगाने का प्रयास कर रहे हैं, उसका सहयोग करने की बजाय, उसे ताने मारेंगे उसकी टांग खिचेंगे और गर्व से कहेंगे हम तो धार्मिक हैं राजनीती से भला हमें क्या लेना देना ?
जब भी कभी बात राजनीती की होती है, तो सबसे पहले धर्म, जाति व राजनीती के ठेकेदार ही सामने आकर खड़े हो जाते हैं हम जैसे भगवाधारियों के, कि आप तो भजन कीर्तन करिए, ईश्वर को खोजिये, काहे राजनीति में अपनी टांग अड़ा रहे हैं ? कई लोगों को देखा है मैंने जो यह कहते फिरते हैं कि हमें राजनीती से क्या लेना देना, हम तो अपने में मस्त रहते हैं | इमरान खान की नजरों से देखा जाए तो ऐसे लोग वे गैर सियासी हिरन है, जब कोई चीता उनमें से किसी एक का शिकार करता है, तब हजारों की संख्या में या अपनी जान बचाकर भाग रहे होते हैं, बजाय अपने साथी की सहायता करने के | वहीँ यदि आप देखें तो अफ्रीका में लंगूरों की एक जाति पायी जाती है, तो गैर सियासी नहीं होते | वे न केवल अपनी स्वयं की रक्षा करते हैं हिंसक पशुओं से, बल्कि उनकी भी जान बचाते हैं जो उनकी अपनी प्रजाति के नहीं होते |
कल्पना करिये कि आप किसी कम्पनी के मालिक हैं | आपकी कम्पनी घाटे में जा रही है और दुनिया भर का कर्ज आपको परेशान कर रखा है | आपको ज्ञात हो जाता है कि वर्तमान मैनेजर ही नालायक है और उसी के कारण ही कम्पनी को यह दिन देखना पड़ रहा है | तब आप क्या करेंगे ?
 
स्वाभाविक ही है कि आप अखबार में विज्ञापन देंगे कि एक योग्य अनुभवी मैनेजर की आवश्यकता है | आप के पास कई प्रत्याशी आयेंगे | आप उनका साक्षात्कार लेंगे और किसी एक को चुनकर उसे मैनेजर की पोस्ट दे देंगे और पुराने मैनेजर को ससम्मान विदा कर देंगे | जैसे कि भारतीय जनता चुनाव करती ही अपने गाँव, राज्य या देश के मैनेजर का और पुराने मैनेजर को उनके सहयोगियों के साथ विदा करे देती है |
 
अब सोचिये कि आपका मैनेजर चार्ज संभालते ही घोषणा करता है कि मुझे केवल पचास दिन दीजिये, यदि मैं आपकी उम्मीदों पर खरा न उतरा तो मुझे चौराहे पर फाँसी दे देना, जूतों से पीटना…..आदि इत्यादि | पचास दिन बाद बाद वह कहता है कि कम्पनी को नीलाम कर देना चाहिए तभी कम्पनी की भलाई है और वह एक एक कर कम्पनी की सभी इकाइयों की बोलियाँ लगाकर नीलाम करना शुरू कर देता है…जैसे कि जनता की चुनी हुई सरकारें करती हैं |
 
आपके खून पसीने की मेहनत से खड़ी की कम्पनी कुछ ही दिनों बाद आपकी नहीं रह जाती, बल्कि आप खुद उस कम्पनी के नौकर बनकर रह जाते हैं…..क्या आप इसे कम्पनी और स्वयं का उत्थान कहेंगे ? क्या आप ऐसे मैनेजर को योग्य मैनेजर मानेंगे ?
 
आपकी राय क्या है वह तो नहीं जानता, लेकिन मैं यदि किसी कंपनी का मालिक होता और गलती से ऐसा मैनेजर चुन लेता, तो कम्पनी की एक ईंट भी नीलाम होने नहीं देता, बल्कि मेनेजर को ही लात मारकर बाहर निकाल देता | खुद ही चलाता कम्पनी अपनी फिर चाहे घाटे में ही क्यों न चलानी पड़े | और एक दिन वापस अपनी कम्पनी को घाटे से उबार भी लेता |
 
~विशुद्ध चैतन्य
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