जब भी बातें करते हो, बेसर-पैर की ही करते हो…..

बचपन से दुनिया मेरे लिए अजनबी रही क्योंकि जैसी होनी चाहिए थी, वैसी नहीं है | हर किसी को मैं देखता हूँ बहुत ही सीमित सोच और दायरे में जी रहा है | इनके झगड़े भी इतनी छोटी छोटी चीजों पर होते हैं, कि कभी-कभी आश्चर्य होता है | अपनी ही गलतियों के कारण भोग रहे दुखों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने वाले ये लोग न जाने किस बात की अकड़ में रहते हैं ?

चलिए माना कि मुझे सबकुछ गलत ही दिखाई देता है, कुछ भी सही नहीं दिखाई देता ! चलिए माना कि मुझे मानसिक रोग हो गया है और बीमारी लाइलाज हो चुकी है ! चलिए माना कि दुनिया तो जैसी है वैसी ही है, केवल मेरे देखने का नजरिया ही गलत है ! चलिए माना कि यहाँ आत्मज्ञानी लोग भी हैं जो सुख से जीते हैं, और उद्योगपति और व्यापारी भी हैं जो सुख से जीते हैं | यहाँ किसान भी हैं जो सुख से जीते हैं और मजदूर भी हैं जो सुख से जीते हैं ! बस मुझे ही बुराई देखने की आदत है….. लेकिन क्या जिसे आप लोग सुख कह रहे हैं, वास्तव में वह सुख है ?

यहाँ लोग लड़-मर रहे हैं उस चीज के लिए जिसका ब्रह्माण्ड में कोई मूल्य ही नहीं हैं | न तो नोट अंतरिक्ष में चलेंगे और न ही उसे वहाँ कोई भाव देने वाला होगा | न तो ये धर्म, सम्प्रदाय नाम के दड़बे वहां होंगे और न ही कोई इन सब के लिए लड़ने वाला होगा…. लेकिन लोग लड़-मर रहे हैं….

चलिए छोडिये मेरी बातें आपकी समझ में नहीं आएँगी…. मेरे पिताजी भी यही कहते थे कि तुम न जाने किस दुनिया से आये हो कि तुम्हारी कोई बात समझ में नहीं आती | जब भी बातें करते हो, बेसर-पैर की ही करते हो….. और फिर मैं दस वर्ष की उम्र में ही घर से भाग गया | क्योंकि मुझे विश्वास हो गया था कि मैंने जिस घर में जन्म लिया वहाँ मेरी माँ के मरने के बाद कोई और नहीं है मुझे समझने वाला | लेकिन फिर लोगों ने मुझे वापस घर छोड़ दिया |

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जैसे तैसे कुछ साल और काटे और फिर अट्ठारह उन्नीस की उम्र में फिर घर छोड़ दिया…. इस बीच मैंने आत्मनिर्भर होने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी | हर काम किया जो मिला | बाद में फिर भी यह प्रयास रहा कि घर पर बेशक न रहूँ लेकिन सम्बन्ध बना रहे, लेकिन वह भी नहीं रह पाया… .क्योंकि मैं वैसा नहीं था जैसी दुनिया मुझे देखना चाहती थी |

मैंने दस वर्ष की उम्र से लेकर तीस वर्ष की उम्र तक अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि मैं भी नकली जीवन और खुशियों का आदि हो जाऊं | मैंने कोशिश की कि जैसी दुनिया है वैसा ही हो जाऊं…. लेकिन नहीं हो पाया और फिर तय कर लिया कि अब जो हूँ जैसा हूँ वैसा ही हूँ | अब कुछ नहीं बदलना | यह दोगलों की दुनिया है, यहाँ मतलब से लोग मिलते हैं और मतलब के लिए ही जीते हैं | शास्त्रों को रटते हैं, श्लोक उगलते हैं…. लेकिन व्यव्हार में कोई लाता नहीं है.;… शास्त्रों से एक बात जो समझ में आई वह यह कि उनको लिखने वाले भी इस दुनिया के नहीं रहे होंगे | वे भी मेरी ही तरह उसी दुनिया से आये होंगे जहाँ वास्तविक प्रेम और सुख है | जहाँ लोग दोगले नहीं होते हैं जहां धर्म और सम्प्रदायों के नाम पर लड़ते-मरते नहीं होंगे… क्योंकि जिस सनातन धर्म का जिक्र शास्त्रों में आता है वह तो इस दुनिया में कोई भी नहीं अपनाता | धर्म के नाम पर सभी ने अपने अपने कुनबे बना रखे हैं, धार्मिक टैक्स वसूलने के लिए मंदिर बना रखे हैं… जबकि मदिर तो आध्यात्मिक चिंतन मनन का स्थल होता है | लेकिन यहाँ मंदिर व्यावसायिक व औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल है | धर्म के नाम पर अरबों का कारोबार हो रहा है. लेकिन धर्म की समझ बड़े से बड़े कारोबारियों, ब्रह्मज्ञानियों, साधू-संतों को भी नहीं है | घूम फिर कर सभी किसी न किसी कुनबे में जाकर सिमट जाते हैं….

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अब ऐसे मैं बहुत समस्या हो जाती है मेरे लिए | मैं लोगों से प्रत्यक्ष दूरी बनाना शुरू कर दिया फिर भी लोग यहाँ तक पहुँच ही जाते हैं | मै नहीं चाहता कि लोग मुझे गुरु, विद्वान समझें, लेकिन फिर भी लोग अपनी ही जिद करते हैं | अभी एक सज्जन आये और उन्होंने मुझसे निवेदन किया कि एक विधवा है यदि आप उन्हें अपना लें तो… मेरे लिए विवाह बाधा नहीं है क्योंकि मैं विवाह को सम्पूर्णता मानता हूँ | न ही बाधा है हमारे सन्यास परम्परा में क्योंकि ठाकुर दयानंद देव जी ने स्वयं ही अपने हाथों से सन्यासियों का विवाह करवाया था और खुद भी विवाहित ही रहे | लेकिन बाधा है मेरा स्वाभाव | जब इतने वर्षों में मुझे समझने वाला कोई नहीं मिला तो फिर किसी लड़की को अपने जीवन में लाकर उसे दुखी देखना मेरे लिए मुश्किल हो जायेगा | फिर वह लड़की भी तो उसी समाज का हिस्सा है जो समाज मुझे आज तक स्वीकार नहीं पाया | वह भी दुखी होगी, जैसे मेरे पारिवारिक सदस्य दुखी होते थे मेरे स्वाभाव से और आज दुखी हैं आश्रम वासी क्योंकि मैं उनकी तरह नौटंकी में भाग नहीं लेता | तो अभी मैं असमंजस में हूँ | क्योंकि मैं स्वयं को तो जानता हूँ और स्वयं को स्वीकार चुका हूँ लेकिन कोई दूसरा भी मुझे स्वीकार ले इसकी सम्भावना नहीं दिखती | और फिर किसी दूसरे के अनुसार अब ढलना मेरे लिए मुश्किल है | फिर ये दोगलों का समाज मानता है कि स्त्री नरक का द्वार है | यह समाज मानता है कि विवाह अध्यात्मिक उत्थान में बाधक है…. कारण केवल इतना ही है कि न तो अध्यात्म की समझ इनको है और न ही अर्धनारीश्वर की | स्त्री और पुरुष दो शक्तियां हैं, लेकिन लोगों ने कभी इन शक्तियों को समझा ही नहीं | तंत्र ने अवश्य इसे समझा और जाना… लेकिन पाखंडियों ने नहीं समझ और न ही समझने दिया किसी को… खैर इस विषय पर चर्चा का यहाँ कोई महत्व नहीं है |

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एक आशा की किरण अवश्य भीतर ही चमकती है, कि एक न एक दिन ये दुनिया सनातन धर्म को समझ जाएगी | दुनिया समझ जायेगी कि ये सम्प्रदाय, हिन्दू-मुस्लिम, सिख इसाई नाम के धार्मिक दड़बे सभी केवल विभिन्न कर्मकांड और नियमों पर आधारित मत व मान्यताओं के समर्थाको का समूह मात्र है न कि धर्म | और जब तक ऐसा नहीं होता, तब तो मुझे इसी दुनिया में बार बार आना पड़ेगा और हर बार खुद को ही कष्ट पहुँचाकर भी दुनिया को वही प्राचीन बातें समझाना पड़ेगा, जो आज तक न जाने कितने आकर समझाकर चले गए, लेकिन दुनिया अपने ढर्रे पर चलती रही भैस की तरह | ~विशुद्ध चैतन्य

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