….किताबों से थिअरीज याद करते हैं…. सिर्फ बाद में भूल जाने के लिए….

शिक्षा वास्तव में होती क्या है यह आधुनिक समाज भूल गया | हम दूसरों के अनुभव, विचारों को थोपते हैं, शिक्षा के नाम पर, जबकि शिक्षा का मूल उद्देश्य होता है, बच्चे को स्वयं की योग्यताओं से परिचित करवाना और उन्हें समाज में अपना योगदान देने के लिए प्रेरित करना | उन्हें यह एहसास करवाना कि वे समाज के लिए बहुत ही उपयोगी हैं | जबकि हो यह रहा है कि आधी उम्र उनकी शिक्षा के नाम पर दुनिया भर का कबाड़ इकठ्ठा करने में गुजर जाता है, माता-पिता की कमाई बर्बाद होती है सो अलग और फिर वह पढ़-लिख कर केवल एक भेड़ों का जीवन जीवने लगता है | इंजिनियर भी बन गया या डॉक्टर भी बन गया तो वही रटे रटाये ढर्रे पर चलता चला जाता है | समाज उसे समझाता है कि जीवन का अर्थ है नोट कमाने की मशीन बनना, किसी कम्पनी का नौकर बनना… और चाह कर भी वह उस चक्रव्यूह से नहीं निकल पाता है, जिसमें ये शिक्षा के सौदागर और समाज उसे धकेल देते हैं |

हो सकता है वह बच्चा बचपन में ही इतनी योग्यता रखता हो कि उसे कहीं नौकरी करने की आवश्यकता ही न हो और वह अपने हुनर से, अपनी जीविका बड़े आराम से चला सकता हो, लेकिन समाज ने नियम ही ऐसे बना रखे हैं कि डिग्री नहीं तो कोई सम्मान नहीं | समाज किसी की योग्यता उसकी डिग्री से तोलता है, जबकि डिग्री स्वयं में खोखली होती है | वह किसी व्यक्ति के भीतर छुपे गुणों को व्यक्त करने में असमर्थ होती है | कई लोग जीवन के अंतिम पड़ाव में आकर समझ पाते हैं कि जीवन व्यर्थ गया | जो करने आये थे, वह कर नहीं पाए, बस भेड़ चाल में पड़े रह गये |
बहुत ही कम लोग इतना साहस कर पाते हैं कि परम्पराओं को तोड़ कर अपने विवेकानुसार कदम उठायें | अधिकांश यदि परम्पराओं को तोड़ते भी हैं तो भटक जाते हैं और अनैतिक व असामाजिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं | कारण होता है समाज और परिवार जो उन्हें समझ नहीं पाता और फिर उसे विद्रोह करने और उपद्रव करने के सिवाय कुछ और नहीं सूझता | वह समझ नहीं पाता कि उसकी असफलता का एक कारण यह भी है कि वह गलत राह पर चल पड़ा है | उसे समझ में नहीं आता कि वह जो होने के लिए आया था, जो करने के लिए आया था, उसके विपरीत कामों में उलझ गया है | सफलता अवश्य मिलती है, यदि आप अपने विवेकानुसार कार्य करें, हर व्यक्ति भेड़-बकरी बनने के लिए नहीं आता और न ही हर व्यक्ति गुलामी ही कर सकता है | इसलिए जितनी जल्दी हो सके स्वयं से परिचित हो जाएँ |

मुझे प्रसन्नता होती है जब मैं अंगद जैसे बच्चों को देखता हूँ और एक आशा जगती है कि शायद किसी दिन एडिसन को भी इस देश में जन्म लेने पर गर्व का अनुभव होगा |

एनडीटीवी.कॉम ने फेसबुक पेज ह्यूमैन्स ऑफ बॉम्बे के हवाले से अंगद के बारे में जानकारी दी है। ह्यूमैन्स ऑफ बॉम्बे पर डाले गए पोस्ट में बताया गया है कि अंगद ने स्कूल जाना इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि उन्हें जीवन की पाठशाला से सीखने में ज्यादा मजा आता है। अंगद ने फेसबुक पोस्ट में लिखा;
“मैं जब 9वीं कक्षा में था, तो मैंने स्कूल छोड़ दिया, क्योंकि मैं बार-बार पुराने कॉन्सेप्ट्स को बिल्कुल सीखना नहीं चाहता था। स्कूली शिक्षा में बच्चे नए आइडियाज नहीं लाते और किताबों से थिअरीज याद करते हैं…. सिर्फ बाद में भूल जाने के लिए।”
अंगद ग्रेडिंग सिस्टम में बिल्कुल भरोसा नहीं रखते। इसकी जगह वह घर पर पढ़ाई करने को बेहतर मानते हैं और ऐसा संभव इसलिए हो पाया, क्योंकि उनके पैरंट्स उन्हें समझ सके। फेसबुक पोस्ट में अंगद ने कहा,

 “जब मैं 10 साल का था, तो मैं अपने पिता के पास गया और कहा कि मैं हॉवर क्राफ्ट बनाना चाहता हूं और मेरे आइडिया का मजाक उड़ाने की जगह पिता जी ने मुझे आगे बढ़ने को कहा।” 

अंगद जब बहुत छोटे थे, तभी से उनके पास नई चीजें बनाने की प्रतिभा है। तभी टीवी शोज, मेक मैग्जिन के ट्यूटोरिअल्स या अपने पिता के ऑफिस के इंजिनियरों से सीखकर वह कुछ ना कुछ नया बना लिया करते। अब 16 साल की उम्र में अंगद दो कंपनियां चला रहे हैं, जो उत्सुकता और नवाचार (क्यूरिअसिटी ऐंड इनोवेशन) को बढ़ावा देने वाले प्रॉडक्ट तैयार करती हैं। एमआईटी के प्रफेसर डॉ. रमेश रस्कर के साथ काम करते हुए अंगद और उनकी टीम ने वर्चुअल ब्रैलर भी बनाया, जो किसी भी पीडीएफ डॉक्युमेंट को ब्रैल में कन्वर्ट कर देता है।

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आप अगर यह जानना चाहते हैं कि अंगद ने दुबारा स्कूल का रुख क्यों किया और देश के लिए उनका क्या सपना है, तो आपको उनकी पूरी कहानी पढ़नी होगी। ह्यूमैन्स ऑफ बॉम्बे पर अक्सर ऐसी ही प्रेरक कहानियां शेयर की जाती हैं।

यह तो हुई अंगद की बात, ऐसे ही और न जाने कितने उदाहरण हैं जिन्हें कभी ठुकरा दिया गया किसी जगह पर तो वे किसी और क्षेत्र में विश्व विख्यात हुए, जैसे अमिताभ को आकाशवाणी ने ठुकरा दिया था उनकी आवाज के कारण और आज पूरी दुनिया में वे अपनी आवाज का जादू बिखेरते हैं अपनी अभिनय कौशल के साथ | लता मंगेशकर को ठुकरा दिया गया था उनकी आवाज के कारण कोरस ग्रुप से, लेकिन उनके जैसी गायिका दूसरी कोई और नहीं आई अभी तक | एडिसन को स्कूल से निकाल दिया गया, लेकिन आज उनकी दी हुई रौशनी से दुनिया जगमगा रही है | ~विशुद्ध चैतन्य

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