जिन्हें धर्म की ही समझ नहीं वे भला सनातन धर्म को क्या समझेंगे ?

किसी ने मुझे एक पोस्ट पर मेंशन किया था, जिसमें यह समझाया जा रहा था कि जैन धर्म ही सबसे प्राचीन यानी प्राकृतिक धर्म के बाद पहला धर्म है और उसी को सनातन धर्म के नाम से जाना जाता है ।

थाईलैंड के बौद्ध मानते हैं कि बुद्ध ने कोई अलग पंथ की नींव नहीं रखी थी, बल्कि सनातन धर्म ही समझा रहे थे । इसीलिए उनके मंदिरों में सभी हिन्दू देवी देवता, यहां तक कि रावण की प्रतिमाएँ रखी जाती हैं और सभी पूजनीय हैं ।

जल्दी ही बाकी सभी किताबी धार्मिक और पंथी भी साबित करने लगेंगे की उन्हीं का धर्म सनातन है । हो सकता है, पायलट बाबा, लेपटॉप बाबा, आईफोन बाबा से लेकर रामपाल, आसाराम, रामरहीम…. सभी अपने अपने दड़बे को सनातन धर्म सिद्ध करने लगें ।

जिन्हें धर्म की ही समझ नहीं वे भला सनातन धर्म को क्या समझेंगे ?

जिसने अपने गाँव के बाहर कदम न रखा हो, उसे क्या पता कि दुनिया कितनी रंगबिरंगी है ?

मैं सनातनी हूँ इसलिए साम्प्रदयिक संकीर्णताओं से मुक्त हूँ । मैं जिस विराट रूप में विश्व को देख व समझ पाता हूँ, उस रूप में कोई किताबी धार्मिक या दड़बों में कैद धार्मिक नहीं देख पाता । उनकी दुनिया तो उनके अपने दड़बे में ही सिमट कर रह जाती है ।

फेसबुक एक जीवंत उदाहरण है सनातन धर्म का । बनाने वाले ने कोई भेदभाव नहीं किया, सभी को निःशुल्क उपलब्ध करवाया । अब इसी फेसबुक में अनगिनत दड़बे बन गए । मुफ्त के फेसबुक में हर कोई अपने दड़बे को महान बताता फिर रहा है ।

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जिस दिन जुकरबर्ग का दिमाग फिर गया, न दड़बा रह जाएगा न महानता । पहले ऑरकुट चलता था, अब वह नहीं है । उसमें भी कुछ ऐसा ही था ।

फिर यहां आप स्वयं देख लो, हर किसी की अपनी समस्या है । स्त्रियों की अपनी समस्या है और पुरुषों की अपनी । हिंदुओं की अपनी समस्या है और मुस्लिमों की अपनी । कांग्रसियों की अपनी समस्या है और भाजपाइयों की अपनी । न गाँव, खेत, वनों, नदियों की चिंता किसी को, न देश और समाज की, न भूख से मरते लोगों की ।

मैं दिन भर यही तो देखता रहता हूँ । यहां लोग इतनी संकीर्णता में जी रहे हैं, कि इन्हें तो अपने गाँव, शहर के शोषित पीड़ित ही नहीं दिखते, देश की समस्याएँ भला कहाँ दिखेंगी इन्हें ?

और जिन्हें अपने गाँव, शहर की ही समझ नहीं वे भला भारत जैसे विराट देश और उसकी विविध संस्कृतियों को कैसे समझ पाएंगे ?

और जो भारत जैसे विराट देश को नहीं समझ सकते, वे सम्पूर्ण पृथ्वी को भला कैसे समझ सकते हैं ?

और जो मात्र एक पृथ्वी को नही समझ सकते, वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को कैसे समझ सकते हैं ?

और जो ब्रह्माण्ड को ही नहीं समझ सकते, वे भला सनातन धर्म को कैसे समझ सकते हैं ?

~विशुद्ध चैतन्य

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