सन्यासियों की हैसियत एक लाचार विधवा से अधिक नहीं होती समाज की नजर में



लोग सन्यासियों को भिखारी समझते हैं, क्योंकि गेरुआ डाले बहुत से भिखारी सड़कों पर घूमते मिल जाते हैं या आश्रमों में पड़े हुए मिल जाते हैं | साधुओं का अपना साधू-समाज होता है और उनके कुछ नियम कायदे भी होते हैं | ठीक उसी प्रकार जैसे सामान्य समाज के नियम कायदे होते हैं | इस समाज की स्थापना शंकराचार्य ने की थी, वर्ना साधू पुर्णतः स्वतंत्र व्यक्तित्व होते हैं और शंकराचार्य के पहले ही शायद सन्यासी या साधुओं का महत्व रहा होगा क्योंकि वे वास्तव में स्वतंत्र व बंधन-मुक्त होते थे | पहले ऋषि आदि हुआ करते थे, लेकिन फिर धीरे धीरे वे वे भी लुप्त हो गये शायद लोग उपभोक्ता वाद को महत्व देने लगे थे और खोज या आविष्कारों में अपना जीवन व्यर्थ करना उनके लिए असंभव होने लगा था | अब केवल गीता या वेदों के पाठ करने भर से कोई साधू या सन्यासी हो जाता था | किसी भी अखाड़े में जाकर दाखिला लेकर कोई भी संत महंत की उपाधि ले सकता था | अब सब कुछ बना बनाया था, खोजने जानने की आवश्यकता समाप्त हो चुकी थी | अब सब कुछ ठहर चुका था और आध्यत्म अब जड़ता की ओर अग्रसर हो चुका था | इसलिए ऋषियों के बाद से आध्यत्मिक उंचाई ठहर गयी और लोग नीचे से नीचे उतरते चले गये | अब पुस्तक (वेद-पुराण गीता आदि) सत्य हो गये और खोजी और खोज असत्य हो गये |

सन्यास लेने के साथ ही समाज सन्यासियों की हर गतिविधियों पर नजर रखना शुरू कर देता है | सन्यासियों की हैसियत एक लाचार विधवा से अधिक नहीं होती समाज की नजर में | लोग आते है, पैर छूते हैं, सम्मान करते हैं, दान या भीख देते हैं लेकिन शर्तो के साथ | शर्त यह कि एक विधवा की तरह जीवन जीना है | न सन्यासियों को ये नाचता गाता देख सकते हैं, न किसी स्त्री के साथ देख सकते हैं | न सन्यासियों को ये गाड़ियों में देख सकते हैं और न ही हवाई जहाज में देख सकते हैं | क्योंकि सन्यासी अर्थात भूखा नंगा, कमजोर जर्जर शरीर वाला दूसरों के सामने रोटी के लिए हाथ फैलाए हुए लाचार व्यक्ति होता है | कभी गलती से किसी ने किसी के सहयोगार्थ किसी से कुछ धन मांग लिया तो समझो सन्यासी की इज्जत गयी |

जो समाज बना कर रहता हो, जो साधू-समाज में आ गया, जो दूसरों के बनाये नियमों पर जीता हो, जो गीता या वेदों में सिमट गया हो, जिसके पास कोई नवीन विचारधारा न हो, जिनमें अनंत ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने व अध्यात्म की गहराई में उतरने का साहस न हो…. वह काहे का सन्यासी और काहे का साधू-संत ? ऐसे साधू सन्यासियों में और धार्मिक ठेकेदारों, पण्डे-पुरोहितों में कोई कोई भेद नहीं हैं | जो ब्रह्म के नियमों व धर्म के विरुद्ध आचरण करता हो वह साधू या सन्यासी नहीं हो सकता, वह पंडित पुरोहित भी नहीं हो सकता क्योंकि पंडित पुरोहित कम से कम सामाजिक व प्रकृतिक धर्म का पालन तो करते ही हैं |

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वास्तव में सन्यासी वानप्रस्थ आश्रम वाला संयासी नहीं होता, और न ही साधू-समाज वाला साधू ही साधू होता है | ऐसे साधू-सन्यासी भी केवल एक संस्था से पासआउट कोई टीचर या प्रोफ़ेसर से अधिक कुछ नहीं होता | हाँ यह हो सकता है कि उनमें से किसी ने स्वयं को खोज लिया हो और रटंत विद्या से ऊपर उठकर खुद कुछ खोजा हो, समझा हो जाना हो, लेकिन शायद ऐसे साधू दुर्लभ ही होंगे | सन्यासी एक गृहस्थ में भी मिल जायेंगे, एक सन्यासी को भी किसी से प्रेम हो सकता है, वह विवाह भी कर सकता है जैसे कि पहले ऋषि मुनि किया करते थे, वे वास्तव में सही मायनों में सन्यासी थे, वे प्रकृति के विरुद्ध नहीं थे | वे सेक्स की प्राकृतिक आवश्यकताओं को भी सहजता से लेते थे और विवाह व गृहस्थ धर्म का पालन भी सहजता से कर लेते थे | हमारे आश्रम के संस्थापक ठाकुर दयानंद देव जी भी ऐसे ही संत थे, जिन्होंने स्वयं ही अपने हाथों से सन्यासियों का विवाह करवाया था | उन्होंने हमेशा प्रकृति का सम्मान किया और स्वयं भी विवाहित ही रहे |

वास्तव में सन्यासी वह होता है जो अपनी धुन का पक्का हो और अपनी ही धुन में रहता हो | वह समाज में जहर नहीं घोलता, बल्कि वह समाज को सही दिशा दिखाने का प्रयास करता है | लेकिन समाज को लगता है कि वह काम-चोर है इसलिए जिम्मेदारी से भागा हुआ है | यदि आप देखें तो आपको सारी भौतिक सुविधा प्राप्त हो गयी, टीवी, फ्रिज, कूलर, एसी, गाड़ी, बंगला, कोठी, लड़की सब मिल गयी….. लेकिन आप पाएंगे कि आप संतुष्ट नहीं है | अम्बानी अदानी तक आज संतुष्ट नहीं हैं, अमेरिका का राष्ट्रपति संतुष्ट नहीं है….. और आप हमें अपनी भेड़-चाल में घसीटना चाहते हैं | जो लोग सन्यासियों को सिखाते हैं कि कमा कर खाओ….. जरा मुझे वे ये बताएं कि वे खुद कितने सन्यासियों को पाल रहे हैं ? सन्यासियों को छोड़िये अपने परिवार को ही पाल लें आज तो बहुत है |

एक वकील के पास जायेंगे तो उसे मुहँ मांगी फीस देने के लिए आप तैयार हैं, डॉक्टर को फीस देने के लिए आप तैयार हैं…. लेकिन हम आपको मानसिक उलझनों से दूर करने का निःशुल्क निरंतर प्रयास करते रहते हैं, तो आप हमें भिखारी कहते हो | हम जैसे लोग जिस भी रंग का कपड़ा डालें, बहरूपिये उसी रंग के कपडे में मिल जायेंगे…

आज गेरुआ धारी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज क्या गेरुआ का सम्मान कर रहे हैं ? ये लोग सन्यासी, साधू या संत नहीं है, केवल राजनेता हैं और इनमें वैसे भी सन्यासियों वाला कोई गुण नहीं है क्योंकि जो राष्ट्र में अराजकता व द्वेष की भावना का प्रचार प्रसार करते हों वे सन्यासी या योगी हो ही नहीं सकते | जो मानवों को मानवों के विरुद्ध उकसाता हो केवल राजनैतिक लाभ के लिए वह गेरुआ धारण करने का अधिकारी भी नहीं हो सकता | लेकिन मेरे लिए गेरुआ कोई मानदंड नहीं है कि इसे पहनने वाला ऐसा ही होगा या होना चाहिए | यह तो धर्मों के ठेकेदारों द्वारा बनाया हुआ नियम है | राजनैतिक उद्देश्यों के लिए ज़हर उगलने वाले साधू-संत और योगी आदि तो गेरुआ भी केवल राजनैतिक उद्देश्यों के लिए जनता को मुर्ख बनाने के लिए डाले रहते हैं…..वर्ना मानवता व अध्यातम से तो दूर दूर तक इनका कोई रिश्ता नहीं होता | लेकिन ऐसे योगी साधुओं के विरुद्ध कहने की हिम्मत नहीं होगी किसीकी क्योंकि उनके समर्थक खतरनाक हैं, जान भी ले सकते हैं | वे गेरुआ डाल कर धर्म के नाम पर द्वेष फैला रहे हैं, लेकिन सभी उनकी जय जयकार कर रहे हैं | हम लोगों को आपस में जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं तो हमें पाखंडी और ढोंगी कह रहे हैं | कामचोर और हरामखोर कह रहे हैं |

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सन्यासियों को किसी एक व्यक्तित्व या साँचे में नहीं ढाला जा सकता है | दो सन्यासियों का स्वाभाव कभी एक जैसा नहीं हो सकता, जैसे परशुराम दुर्वासा अपने क्रोध और उग्रता के लिए जाने जाने जाते हैं तो गौतम बुद्ध और महावीर अपनी करुणा के लिए | ओशो अपने तर्क और वैभव के कारण जाने जाते हैं तो रामदेव योग के कारण, नानक और कबीर, रैदास, श्री श्री रविशंकर…आदि सभी भिन्न भिन्न हैं किसी की तुलना दूसरे से नहीं हो सकती लेकिन सभी अपनी अपनी जगह श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे दूसरों की कार्बन कॉपी नहीं थे | वे जो हैं और जैसे हैं, उससे स्वीकार लिया था, उन्होंने स्वयं को समझा और पहचाना था इसलिए वे महान हैं | संत तो वात्स्यायन भी थे उन्होंने भी अपनी अलग ही पहचान बनाई और उन्होंने भी समाज को श्रेष्ठ दिया |

सभी ने कुछ न कुछ समाज को नवीन दिया, श्रेष्ठ दिया यही सन्यासी, साधू, संत या ऋषि का धर्म है | जैसे आधुनिक युग में बाबा रामदेव, श्री-श्री रविशंकर, ओशो…. अदि | यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि इनका उदाहरण केवल यह समझाने के लिए दे रहा हूँ कि ये तीनों ही बिलकुल अलग अलग पथ पर होते हुए भी जनकल्याण का भाव लिए हुए ही हैं | ये सभी व्यक्तिगत रूप में क्या हैं या क्या करते हैं, वह उनकी व्यक्तिगत विषय है | यह आवश्यक नहीं कि सभी सन्यासी इन्हीं नक़ल करने लगें तो वे विशेष हो जायेंगे, जो भी स्वयं को खोजेगा और स्वयं की अंत प्रेरणा से समाज को नवीन दिशा दिखायेगा वही सन्यासी या संत है | वह व्यक्तिगत रूप से क्या है, शाकाहारी है, मांसाहारी है, शराबी है कबाबी है…. सब कुछ उसका व्यक्तिगत विषय है जब तक उसके व्यवहार से समाज को धन-संपत्ति की हानि नहीं होती |

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कोई ब्रह्मचारी हो गया इसलिए साधू है तो बात गले नहीं उतरती, कोई भीख मांग रहा है इसलिए साधू है, बात गले नहीं उतरती, कोई किसी लड़की से प्रेम करने लगा इसलिए साधू नहीं है, बात गले नहीं उतरती, कोई आलिशान महल और कोठी में रहता इसलिए साधू नहीं है, बात गले नहीं उतरती |

अभी कुछ समय मैंने कुछ सहयोग माँगा था कि गाँव में कुछ लड़कियां हैं जिनकी शादी करने में थोडा सहयोग मिल जाये तो ढाई हज़ार फेसबुक फ्रेंडस में से कुल पांच लोगों ने सहयोग राशि भेजी जिनमें एक सज्जन ने दो हज़ार, एक ने पांच सौ, एक ने दो सौ और बाकी ने सौ सौ रूपये भेजे | जिन्होंने भेजे वे कम से कम सहयोग के लिए आगे तो आये, और जिन्होंने नहीं भेजे वे सन्यासियों को भिखारी कह रहे हैं | जिन्होंने सहयोग राशि भेजी, वे धन मेरे पास सुरक्षित हैं, और जब चाहें वे वापस ले सकते हैं मैं Transition charges भी नहीं काटूँगा, जो रकम आपने दी वह लौटा दूंगा |

हम तो अपने पास जो भी थोड़ा बहुत होता है वह भी दे देते हैं, यदि किसी असहाय की सहायता हो पाए तो | हम तो आज भी कई कई दिन भूखे रहने का दम रखते हैं, बिना किसी को दोष दिए | हम तो आज भी सड़कों-फुटपाथों पर सोने का दम रखते हैं | क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे लिए जो श्रेष्ठ होगा प्रकृति हमें उपलब्ध करवा देगी |

जरा सोचिये, क्या किसी पशु-पक्षी को आपकी आवश्यकता है ? केवल वे ही पशु-पक्षी अपने आप को असहाय महसूस करते हैं जिनके वनों को आपने शाकाहार के नाम पर उजाड़ दिया | जो आपके कंक्रीट के जंगलों पर पड़े हुए हैं क्योंकि प्राकृतिक सारी व्यवस्था आप लोगों ने छीन लिए उनसे | आप खुद तो पूंजीपतियों के गुलाम बने ही, खुद की जिंदगी नरक की ही, पशु-पक्षियों के लिए भी अभिशाप बन गये | नदियों, तालाबों, समुद्र सभी को दूषित तो कर ही दिया, अन्तरिक्ष को भी नहीं बख्शा निजी स्वार्थ के लिए और हमें कर्मयोग समझा रहे हो | क्या इन सब को साफ़ करने हैसियत है आप सभ्य कर्मठ और कर्मयोगियों में ? आपका कर्मयोग क्या सृष्टि को समृद्ध व उन्नत करने में कोई योगदान दे रहा है या केवल दोहन ही हो रहा है ? ~विशुद्ध चैतन्य

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