…यानी भाग्य न हुआ आपका नौकर हो गया


आप भाग्य को नहीं मानते क्योंकि कर्मवादी हैं | आपका तर्क होता है कि, क्या भाग्य के भरोसे रहेंगे तो ट्रेन चल जाएगी ? क्या नौकरी मिल जाएगी ? क्या छोकरी पट जायेगी ? क्या बैंक बैलेंस बढ़ जाएगा……?” यानी भाग्य न हुआ आपका नौकर हो गया | आपको जो कुछ चाहिए वह सब भौतिक है, वहां आध्यात्मिक या भाग्य या ईश्वर कहाँ से आ गये ?

कर्मवाद शुद्ध भौतिक है, पढ़े-लिखों की भाषा में वैज्ञानिक पद्धति है | और भाग्यवाद आध्यात्मिक पद्धति है | भाग्यवाद का अर्थ निकम्मा निठल्ला होना नहीं होता, बल्कि जो प्राप्त हुआ उसका मैं अधिकारी था और जो नहीं मिला उसके योग्य नहीं था इस सिद्धांत पर चलना ही भाग्यवाद है | मुझे उसे पाने का प्रयत्न नहीं करना है जो मुझे नहीं मिला, बल्कि मुझे वह पाना है जो मेरे व मेरे परिवार के लिए आवश्यक है, जैसे कि जीविकोपार्जन के लिए प्रयास करना | यहाँ भाग्य का कोई लेना-देना नहीं है | आप मेहनत करेंगे परिणाम मिलेंगे यहाँ भाग्यवाद लागू नहीं होता | भाग्य उसे माना जाएगा जब आप इंटरव्यू के लिए जाएँ और गाड़ियों की हड़ताल हो जाए उस दिन और आपके लिए ऑफिस पहुँचाना असंभव दिखे, तभी अचानक कोई अजनबी आपके सामने गाड़ी रोके और आपको अपनी मंजिल तक सही सलामत पहुँचा दे | आप कर्मवादी होने के कारण दौड़ लगाकर भी ऑफिस पहुँच सकते हैं… लेकिन मेरे जैसे कामचोरों के लिए यह असंभव हो जाएगा 🙁

भाग्यवादी बलात्कारी, लुटेरे या चोर उचक्के नहीं होंगे | क्योंकि वे यह मानते हैं जो उनके योग्य होगा उन्हें अवश्य मिलेगा, बस हमें अपनी ओर से उस अवसर के लिए तैयारी रखनी है | हमें अपनी योग्यताओं को स्वयं ही परखना है और उसे उन्नत करना है | जबकि कर्मवादी लोगों के पास धैर्य नहीं होता और वे बलात्कार जैसी जघन्य अपराध को करने से भी नहीं चूकते, वे धन संपत्ति के लिए अपने माँ बाप की हत्या करने से भी नहीं चूकते | अभी कल ही पढ़ा कि गुजरात में एक साठ वर्षीय वृद्धा से उसके बेटे ने ही बलात्कार किया | तो यह सब हमारी आध्यात्मिक सनातन संस्कृति व धर्म के संस्कार तो कभी रहे ही नहीं | लेकिन आज हमने अत्याधुनिक और कर्मवादी होने के नाम पर यह सब भी करना शुरू कर दिया |

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हम हर जन्म में कुछ न कुछ नया सीखते हैं और न जाने कितने जन्मों से सीखते ही चले आ रहे हैं | लेकिन कम लोग ही हैं जो अपने अनुभवों से लाभ उठाते हैं या ऊपर उठ पाते हैं | जैसे किसी स्कूल में सभी विद्यार्थी सभी विषयों में पारंगत नहीं हो पाते कुछ ही हो पाते हैं, वैसे ही जीवन की पाठशाला में भी होता है | बचपन के आपके अनुभव भविष्य तय करते हैं |

अपने बचपन को याद कीजिये आपने पाया होगा कि आप ने कोई चित्रकारी की या कोई भी छोटा से छोटा काम किया या माँ-बाप के किसी काम में हाथ बटाया तो आपको प्रशंसा मिली आपका उत्साह वर्धन किया गया | यही अनुभव आपके सब्कांशियास में भी फीड हो गया कि किसी का सहयोग करो तो सुख मिलता है प्रसन्नता मिलती है दूसरों को और उनको सुखी देखकर अपना मन प्रसन्न होता है | आप सहयोगी मानसिकता के साथ बड़े होते हैं | जाने अनजाने में आप इसे कर्मवाद से जोड़ देते हैं, जबकि यह सहयोगवाद है | प्रकृति का प्रथम व निश्चित नियम व धर्म है सहयोगिता व विनिमयता | सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपस में विनिमय करते हैं शक्ति का, पदार्थो का | पृथ्वी में जीवन भी बाहरी किसी ग्रह या धूमकेतु से आये तत्वों के मिलन या विनिमयता के कारण ही संभव हुआ तो यह विनिमयता हमारे लिए शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप में स्वाभाविक हो गया | इसके बिना हम अपना जीवन ही व्यर्थ समझने लगते हैं | कोई हमसे न मिले, बात न करे तो स्वयं को महत्वहीन समझने लगते हैं | फेसबुक में ही कई लोगों को लाइक या कमेन्ट न मिलने पर फेसबुक छोड़ने की धमकी देने लगते हैं या फिर जिनको लाइक्स अधिक मिलते हैं उनके पोस्ट पर जाकर उल्टियाँ करने लगते हैं |

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यह सब इसलिए बिगड़ जाता है क्योंकि हम अपने केंद्र से हट जाते हैं और दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं | कर्मवाद का सिद्धांत यहाँ खतरे में पड़ने लगता है कि मैं इतना मेहनत से लिखता हूँ और केवल चार ही लाइक्स मिले या पचास मिले, जबकि कोई केवल इतना लिख देता है, “मैं कैसी लग रही हूँ ?” तो हजारों लाइक्स और कॉमेंट्स मिल जाते हैं | अरे आप खुद सोचिये, उन लोगों का मानसिक स्तर क्या होगा जो ऐसे पोस्ट्स पर लाइक्स या कॉमेंट्स करते फिरते हैं ! क्या आप ऐसे लोगों से अपेक्षा करते हैं की वे लिखे या कॉमेंट्स करें ? वे कर भी दें तो क्या लाभ, समझ में तो उनकी कुछ आना नहीं होता | कुछ लोग मुझे कहते हैं कि आप इतने लम्बे लेख क्यों लिखते हो, थोड़े शब्दों में ही कहने की आदत डालो | मेरा उनसे हमेशा यही कहना होता है कि डॉक्टर ने कहा है कि आप मेरे लेख पढो ? आप टू लाइनर्स या चार लाइना वालों के पोस्ट पढ़िए | समय भी बचेगा और आनन्द भी मिलेगा | मुझे कम शब्दों में कुछ भी कहना मुश्किल होता है तो मैं ऐसे ही लिखूंगा | चाहे दो लाइक्स मिले या न मिले |

लेकिन यहाँ भाग्य का कोई लेना देना नहीं है | भाग्य भौतिक वस्तुओं, नौकरियों आदि पर भी लागू नहीं होता और न ही ईश्वर का कहीं कोई रोल होता है | ईश्वर को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि आपको लाइक्स या कॉमेंट्स क्यों नहीं मिले या नौकरी क्यों नहीं लग रही | जिस काम में ईश्वर का कोई रोल नहीं, उस काम में भाग्य भी कुछ नहीं करता | ईश्वर ने नौकरी करने के लिए नहीं भेजा था इस दुनिया में | ईश्वर ने आपको भेजा था वह सारी शक्तियां देकर जो इस सृष्टि को समृद्ध व उन्नत कर सके, लेकिन हम तो सृष्टि का ही सत्यानाश कर बैठे | सृष्टि का छोड़िये, फेसबुक तक तक का बेड़ा-गर्क करने में लगे हुए हैं नेताभक्ति और चापलूसी में |

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भाग्य काम करता है तब जब आप सहयोगी हो जाते हैं सृष्टि के लिए | जैसे मनपसंद जीवन साथी को पाना भाग्य की बात है | लेकिन यहाँ भी हम व्यापारी बन जाते हैं, मोल-भाव करते हैं, दहेज़, धन और प्रतिष्ठा आदि में उलझ जाते हैं | तो खूबसूरत जीवन साथी खरीद कर भी जीवन नरक बन जाता है | दहेज़ में दिया गया पैसा, शादी में खर्च किया पैसा, सारे आडम्बरों में खर्च हुआ धन सब व्यर्थ हो जाता है | स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कई बार कि किसी को अपना भौतिक शरीर ही खो देना पड़ता है या क्षतिग्रस्त कर देता है आपका ही अपना खरीदा हुआ जीवन साथी |

यह सब भाग्य का खेल है, क्योंकि कर्म तो आपने किये लेकिन कर्म भौतिक पदार्थों यानि शरीर और दहेज़ पर लागू हुआ | आपको सुन्दर शरीर मिला, धन मिला, कुछ दिन भोगा और मन भर गया | कर्मवाद से आप जो भी हासिल करते हैं वह क्षणिक आनंद ही देता है | वहीँ भाग्यवाद आपको यह विश्वास दिलाता है कि जो आपके योग्य होगा वह आपको मिलेगा | आपको कर्मवाद के नाम पर किसी से छीनने की आवश्यकता नहीं है | कोई भी पशु पक्षी कर्मवाद के नाम पर स्विसबैंक में अकाउंट नहीं खुलवाता | वह जानता है कि सुबह जब वह भोजन की खोज में निकलेगा तो उसे कुछ न कुछ मिल ही जाएगा क्योंकि वह समर्पित है सनातन धर्म के प्रति | न भी मिला तो वह उस दिन बिना खाए भी रह लेगा, मरेगा नहीं | प्रकृति ने व्यवस्था ही ऐसी रखी है कि कुछ दिन यदि भोजन न भी मिले तो जीवित रह लेगा कोई भी |

क्योंकि अब भाग्य पर विश्व नहीं रहा, अब विश्वास नहीं रहा कि जो नैसर्गिक स्वाभाविक शारीरिक आवश्यकताएं हैं उनकी पूर्ति के लिए ईश्वर ने कोई व्यवस्था अवश्य की होगी और नहीं भी की है तो भी कोई महत्वपूर्ण कारण ही होगा | ~विशुद्ध चैतन्य

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