भीड़ केवल भीड़ होती है

19 ऑक्टोबर 2018, अमृतसर के रेलवे लाइन का पास मनाया जा रहा दशहरा उत्सव रावण दहन के साथ ही चीख-पुकार और शोक में परिवर्तित हो गया | एक ट्रेन गुजरी वहां से और हँसते खेलते कई परिवारों के घरों में अँधेरा बिखेर गयी | रेल की पटरी में लाशें बिखर गयीं और बिखर गये लोगों के जूते चप्पल और सामान | इस दुर्घटना में रावण भी वीरगति को प्राप्त हुआ आठ लोगों के जीवन को बचाते हुए !
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जो भी हुआ वह दुखद था, पीड़ादायक था |

लेकिन समाज नहीं सुधरा हजारों वर्षों से हर वर्ष रावण का दहन करने के बाद भी | वह अपने ही भीतर के रावण को न तो आज तक मार पाया, न ही जला पाया, बस बाहर भीड़ इकट्ठी करके एक पुतले को जलाकर मूर्ख बना देता है कि रावण मारा गया, अब कोई अधर्मी नहीं बचा, अब कोई अत्याचारी नहीं बचा, अब कोई अपराधी नहीं बचा | यदि ध्यान दें तो रावण अजर अमर है वह कभी नहीं मरता | केवल भ्रम पाले बैठे हैं कि रावण कभी मारा गया |
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दशहरा दुर्घटना और समाज की प्रतिक्रिया

अमृतसर दुर्घटना पर कल दिन भर लोगों की प्रतिक्रियाएँ देखता रहा | क्योंकि जो मैं लिखने जा रहा था अपने ब्लॉग में, उससे पहले समाज की प्रतिक्रिया उस घटना के प्रति जान लेना आवश्यक था | सभी की प्रतिक्रिया देखने के बाद एक बात समझ में आयी कि दुर्घटना के लिए सभी लोग रेलवे, आयोजकों व प्रशासन को दोषी मान रहे हैं | बहुत ही कम लोग हैं जो दर्शकों को दोषी मान रहे थे | रेलवे अपने आप को पूरी तरह से निर्दोष घोषित कर दिया क्योंकि न तो रेल विभाग से उस आयोजन के लिए कोई अनुमति ली गयी थी और न ही वह भूमि रेलवे के अधीन थी | ड्राईवर को दुर्घटना का पता भी ढाई घंटे बाद चला जब वह एक स्टेशन पहुँचा और अधिकारीयों ने उसे उतार कर पूछताछ शुरू की | जब उसे दुर्घटना का पता चला तब वह आश्चर्य चकित रह गया | वह बार बार यही कहता रहा कि उसकी गाड़ी से कोई दुर्घटना हुई ही नहीं, उसे रास्ते में केवल एक जगह बहुत ही अधिक धुआँ दिखा जिससे पटरी पर उसे कुछ दिखाई नहीं दिया |

मीडिया रेलवे पर दोष थोपने में व्यस्त है यह कहकर कि ट्रेन की हेडलाइट बंद थी इसीलिए ड्राईवर को कुछ नहीं दिखा | जानकारों का कहना है कि जब धुंध अधिक हो, तब कई बार ड्राईवर हेडलाइट बंद कर देता है, ताकि सिग्नल स्पष्ट दिखाई पड़े | राजनैतिक बुद्धि के लोगों का विरोध सिद्धू और उसकी पत्नी पर उतरा…उनका कहना था कि कांग्रेस ने आयोजन करवाया है इसीलिए यह दुर्घटना घटी, यदि भाजपा आयोजन करवाती तो ऐसी दुर्घटना नहीं घटती | हिंदुत्व के ठेकेदारों का दुःख अलग है, उनका कहना है कि ट्रेन हमेशा हिन्दुओं पर ही क्यों चढ़ती है, मुसलमानों पर क्यों नहीं चढ़ती ! आंबेडकरवादियों का कहना है कि हिन्दू अपने अंधविश्वासों के कारण मारे गये, न वे दशहरा मनाते, न मारे जाते | यह और बात है कि वे स्वयं आंबेडकरवादी अंधविश्वासों के दलदल में बुरी तरह धँस चुके हैं |

आप सभी की राय पढ़ी, आप सबने भी दूसरों की राय पढ़ी होगी और अधिकांश इस बात पर सहमत हैं कि दोषी प्रशासन, आयोजक, व रेलवे ही है | आइये अब मैं अपनी राय बताता हूँ |

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दुर्घटना का वास्तविक दोषी कौन ?

सामान्य रूप से दोषी प्रशासन भी है, आयोजक भी है, रेलवे भी है और ड्राईवर भी | क्योंकि बरसों बाद भी इनको इतनी सी समझ नहीं आयी कि भीड़ के पास विवेक नहीं होता, समझ नहीं होती | इस भीड़ में अधिकांश वे लोग होंगे जो गाय और भैंस का दूध पीकर बड़े हुए, अपनी माँ का दूध कम ही पीने को मिला होगा | तो बचपन में बच्चों को जैसा दूध मिलता है, वैसी ही उसकी मानसिकता हो जाती है |

आप ने सड़कों पर गाय और भैंसों को देखा होगा, उन्हें आती जाती गाड़ियों की परवाह नहीं होती, वे अपनी ही धुन में चलती हैं | जबकि कोई कुत्ता, या बिल्ली सड़क पार करने से पहले दायें बाएं अवश्य देखते हैं | क्योंकि उनमें विवेक होता है, समझ होता है | तो जैसे गाय और भैंस परवाह नहीं करती आने जाने वाली गाड़ियों की, वैसे ही उनका दूध पीने वाले भी परवाह नहीं करते | और जब ऐसे लोगों की भीड़ इकट्ठी हो जाये, तो स्थिति कुछ वैसी ही हो जाती है, जैसे सड़कों पर गाय और भैंसों का बड़ा समूह चल पड़े |

मेरी नजर में इंसानों की भीड़ केवल भीड़ होती है और उसकी बुद्धि उतनी ही होती है, जितने गाय-भैंसों के झुण्ड के पास होती है | लेकिन समाज स्वयं एक भीड़ मात्र है, इसलिए कभी भी भीड़ को दोषी नहीं मानता | जबकि सारा दोष होता ही भीड़ का है | कोई व्यक्ति कहीं कोई आयोजन करता है, तब वह यह सोचकर करता है कि उसने इंसानों को आमंत्रित किया है, लेकिन दुर्भाग्य से इंसान बहुत ही कम पहुँचते हैं ऐसे आयोजनों में, भीड़ पहले पहुँच जाती है | इस भीड़ को पता नहीं रहता कि कहाँ ट्रेन की पटरी है और कहाँ नहीं | इस भीड़ को पता नहीं होता कि ट्रेन जब आयगी तो आवश्यक नहीं कि वह भीड़ को देखकर रुक ही जाए या उसे भीड़ दिखाई दे | उन्हें यह भी नहीं पता होता कि ट्रेन की पटरी से दूर ही खड़े होकर मोबाइल से विडियो बनाना चाहिए | क्योंकि हमारे समाज में भीड़ को शिक्षित करने की परम्परा कभी रही ही नहीं | हमारे समाज में भीड़ को कभी भी नहीं सिखाया जाता कि कहाँ कैसा व्यवहार करना चाहिए | भीड़ कहीं भी जायेगी, कूड़ा और कचरा ही करेगी | लेकिन यही भीड़ कभी साफ़ सफाई करती नहीं नजर नहीं आएगी क्योंकि यह काम सफाई कर्मियों का है भीड़ का नहीं | भीड़ का काम है कूड़ा कचरा बिखेरना, विरोध के नाम पर सार्वजनिक संपत्तियों को क्षति पहुँचाना, धर्म के नाम पर गुंडा-गर्दी करना, दंगा करना, कमजोर, असहायों की मोबलिंचिंग करना | और भीड़ का काम है धूर्त मक्कार नेताओं की रेलियों में जाकर उनकी बकवास सुनना, जयकारा लगाना | क्योंकि भीड़ को भीड़ में रहना ही पसंद है, फिर चाहे वहाँ उनके मतलब का कुछ न हो, लेकिन भीड़ के  साथ हैं इसीलिए जहाँ भी हैं, वह सही ही होगा यह माने बैठे हैं | फिर चाहे ट्रेन के नीचे ही क्यों न आ जाएँ |

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हर धार्मिक उत्सवों में, तीर्थों में हम पाते हैं कि कोई न कोई दुर्घटना अवश्य घटती है | क्यों घटती है कभी इस पर विचार नहीं करते |

भीड़ में हर व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित समझने की मूर्खता करता है, लेकिन यह नहीं जानता कि इस भीड़ में कोई अपना नहीं होता, सभी बेगाने ही होते हैं | आप जिसका हाथ पकड़ कर चल्र रहे हैं, वह भीड़ में कब छूट जाए कोई नहीं जानता, कब भीड़ उसे रोंदकर निकल जाए कोई नहीं जानता | फिर भी लोग भीड़ को महत्व देते हैं, फिर भी इस बात पर खुश होते हैं कि हम बहुत बड़ी भीड़ के साथ खड़े हैं और इसीलिए हम सुरक्षित हैं | भीड़ ने आज तक कभी भी कोई समाजिक महत्व का कार्य नहीं किया, भीड़ ने कभी भी किसी का भला नहीं किया, भीड़ ने केवल विनाश ही किया है, किसी का घर ही उजाड़ा है, किसी के जीवन में अंधेरा ही किया है |

तो मैं न ही प्रशासन को दोषी मानता हूँ, न रेलवे को, न आयोजकों को, सारा दोष भीड़ का ही मानता हूँ | यदि भीड़ की बजाय, विवेकवानों का समूह होता वहां, समझदार इंसानों का कोई समूह होता, तो यह दुर्घटना नहीं घटती, लेकिन वहां इंसानों की भीड़ थी, समझदारों का समूह नहीं | इंसानों के भीड़ और समूह में अंतर होता है | इंसानों के समूह में विवेकवान व समझदार लोग होते हैं, जबकि भीड़ विवेकहीन होती है और दूसरों पर निर्भर भेड़ों, गाय, भैंसों के झुण्ड की तरह होती है |

ये हाल है पब्लिक का ,फिर कहते है ड्राईवर की गलती है 🤔🤔🤗🤗

Posted by Narwana HR-32 on Tuesday, October 23, 2018

वास्तव में भीड़ केवल भीड़ होती है विवेकहीन, बुद्धिहीन | हमारे समाज ने, हमारे धर्म व जाति के ठेकेदारों ने भीड़ की इसी मंदबुद्धिता का लाभ उठाया, अपने अपने धर्मों के बाजारों को खड़ा करने में, अपने अपने राजनैतिक स्वार्थों को पूरा करने में और भीड़ को कुछ नहीं मिला सिवाय भुखमरी, बेरोजगारी और शोषण व अत्याचार के | फिर भी भीड़ नहीं सुधरी, सुधर भी नहीं सकती क्योंकि विवक नहीं है, बुद्धि नहीं है और न समाज चाहता है कि भीड़ विवेकवान हो जाए और न ही धर्म, जाति व राजनीती के ठेकेदार चाहते हैं कि भीड़ बुद्धिमान हो जाए | यदि भीड़ बुद्धिमान हो जाये, तो देश का ही कायापलट हो जाए | देश समृद्ध व शक्तिशाली ही नहीं, एक सुखी संपन्न नागरिकों का वैभवशाली राष्ट्र बन जाएगा | फिर देश में घोटालेबाज सत्ता में नहीं, कारागार में पड़े मिलेंगे | फिर बैंकों के लुटेरे विदेशों में ऐश करने की बजाय, राष्ट्रद्रोह के आरोप में मृत्यु को प्राप्त होते | इसीलिए हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी रची गयी कि भीड़ बड़ी से बड़ी होती जाये, और समझदारों, विवेकवानों, देशभक्तों की जनसँख्या दिन प्रतिदिन घटती चली जाए | यदि कोई विवेकवान समाज को जगाने का प्रयास करे, भीड़ को बुद्धिमान बनाने का प्रयास करे, तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है |

यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार किया जाए और भीड़ को शिक्षित, सभ्य व शालीन बनाने के उपाय किये जाएँ, तो निश्चित ही दुर्घटनाओं में कमी आएगी, निश्चित ही भीड़ के साथ चलने में लोग सुरक्षित अनुभव ही नहीं करेंगे, अपितु सुरक्षित रहेंगे भी | लेकिन ऐसा होना लगभग असंभव है क्योंकि समाज स्वयं शिक्षित नहीं है | वह स्वयं ही मात्र भीड़ है और कुछ नहीं |

~विशुद्ध चैतन्य

दिल्ली के #शिक्षामंत्री का यह भाषण नही सुनातो कुछ नही सुना आपने✌️🏼✌️🏼✌️🏼

Posted by UnLimited Links on Friday, September 28, 2018

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