पढ़े-लिखे डिग्रीधारियों और किताबी धार्मिकों में कोई अंतर नहीं होता

मुझे बचपन से ही साइंस और इन्वेंशन से सम्बंधित पुस्तकें पढने का शौक रहा | इसीलिए पिताजी जब भी शहर से आते थे, मेरे लिए कोई न कोई साइंस से सम्बंधित पत्रिकाएं अवश्य लाते थे | समाचार पत्रों में भी बच्चों के लिए अलग कॉलम हुआ करता था, जिसमें कई मनोरंजक जानकारियाँ होतीं थी, और हमसे छोटी छोटी कहानियाँ लिखकर भेजने के लिए कहा जाता था | हम भेजते भी थे और कुछ छपते भी थे |

मुझे ध्यान नहीं कि किस समाचार पत्र या पत्रिका से, मेरे पास एक मनीऑर्डर आया ढाई सौ रूपये का और एक बार मेरे भाई या बहन के नाम आया | मनीऑर्डर के साथ सन्देश था कि हमारा लेख छपा है उसी के एवज में प्रोत्साहन राशि भेजी गयी है | मेरे लेख पर जीवन की पहली कमाई थी वह और उस समय मेरी उम्र शायद ग्यारह बारह बरस की रही होगी |

उन राशियों ने ऐसा जोश भर दिया हम भाई बहनों में कि सभी लिखने बैठ गये और हर कोई अपने आपको चेखोव, तोलोस्तोय, पुश्किन से कम नहीं समझ रहा था | रशियन नाम इसलिए लिखा कि उस समय हम इन्हीं लेखकों से अधिक परिचित थे क्योकि रशियन कहानियों की किताबें हमारे पास अधिक ही आती थीं |

बाद में कई कहानी और लेख भेजने के बाद भी जब कोई जवाबी उत्तर तक नहीं आया किसी पत्रिका से तो सारा जोश ठंडा पड़ गया और भूल गये लिखना | उसके बाद केवल पढ़ना ही हमारा शौक रहा | उसके बाद हम भाई बहनों में से किसी ने भी किसी भी पत्रिका को कोई लेख या कहानी भेजी ही नहीं |

मेरा लिखना शुरू हुआ दोबारा जब मैं फेसबुक से जुड़ा | शुरू में मुझे समझ में ही नहीं आता था कि क्या लिखना होता है फेसबुक पर | अधिकांश लोग अपनी पारिवारिक तस्वीरें पोस्ट करते थे या फिर देवी देवताओं की तस्वीरें, या फिर चुटुकुले आदि | मैं भी एक दो लाइन लिख दिया करता था | धीरे धीरे शब्दों का भण्डार बढ़ता गया और लेख बड़े होते गये |

खैर….तो मैंने बचपन में किसी पत्रिका में पढ़ा था कि पशुओं को रंगों की पहचान नहीं होती | वे जो कुछ भी देखते हैं ब्लैक एंड व्हाईट देखते हैं | उसके बाद भी कई पत्रिकाओं में यही सब पढ़ा और यही मानकर चलता था कि पशुओं को रंगों की पहचान नहीं होती | फिर एक रिसर्च आया, उसमें लिखा था कि बहुत से पशुओं को रंगों की पहचान होती है | धीरे धीरे पुरानी मान्यता मिटती चली गयी और नई मान्यताएं हमने धारण कर लीं कि पशुओं को भी रंगों की पहचान होती है |

TV Addicts

We want our MTV 📺

Posted by Try Not to Laugh on Monday, October 22, 2018

 

तो विज्ञान भी फिक्स नहीं है….वह भी समय के साथ बदलता रहता है…जैसे पहले माना जाता था कि चाय से कैंसर होता है | अब माना जाता है कि दिन में चार कप बिना दूध की चाय पीने से ब्रेस्ट केंसर नहीं होता | क्योंकि चाय में केंसर को नष्ट करने के तत्व पाए जाते हैं |

केवल धार्मिक ग्रन्थ और उनसे सम्बंधित मत-मान्यताएँ ही ऐसे हैं जो नहीं बदलते | जो लिख दिया गया हज़ारों वर्षों पहले वही सत्य है | क्योंकि उसपर रिसर्च कोई नहीं करता | क्योंकि उसपर प्रश्नोत्तर कोई नहीं करता | बस ईश्वरीय वाणी है इसीलिए उससे सम्बंधित कोई भी आलोचना बर्दाश्त नहीं | और फिर यदि कभी कभार उनपर चर्चा भी होती है, तो ऐसे ऐसे कुतर्क सामने आते हैं विद्वानों के कि दिमाग का दही हो जाता है | और भलाई इसी में होती है कि चुपचाप अपनी हार मानकर अपनी जान बचाओ |

इसीलिए धार्मिक ग्रंथों का विकास नहीं हो पाया, उनसे जुड़े विद्वानों का मानसिक विकास नहीं हो पाया और इसीलिए वे पढ़े-लिखे डिग्रीधारियों की तरह अशिक्षित रह गये | पुस्तकें ज्ञान का सागर हैं इसमें कोई संदेह नहीं, यदि उससे ज्ञान प्राप्त किया जाये | लेकिन यदि उन्हें ढोया जाए केवल यह मानकर कि ईश्वर ने लिखी है, आसमान से उतरी है, तो स्वाभाविक है कि ज्ञान तो उससे कुछ मिलने वाला नहीं | बस जिंदगी भर रोज सुबह साहब डॉक्टर की दी खुराक की तरह दो पन्ने सुबह दो पन्ने शाम को पढ़ते रहो और मत्था टेक कर उठ जाओ |

मैं साक्षरता के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही विरुद्ध हूँ धार्मिकता के | साक्षर होना चाहिए हर इंसान को और धार्मिक भी | लेकिन न तो किताबी विद्वान बने रहना लाभदायक है और ना ही किताबी धार्मिक बने रहने से कोई भला होने वाला है | दोनों ही ज्ञान जब तक व्यावहारिक धरातल पर न परखें जाएँ, न अपनाएँ जाएँ, व्यर्थ है | इसे इस प्रकार समझ लीजिये कि तैराकी या घुड़सवारी से सम्बंधित आपने सैंकड़ों पुस्तकें पढ़ रखीं हों, और हर बारीकी का ज्ञान हो, फिर भी पानी में उतरने से भय लगता हो, घोड़े में चढ़ने से ही भय लगता हो, तो व्यर्थ है आपका ज्ञान और विद्वता |

इसी प्रकार यदि आप आस्तिक हैं, ईश्वर पर विश्वास करते हैं, फिर भी गुंडे-मवालियों, भूमाफियाओं से भयभीत हैं, मौत का भय लगता है तो व्यर्थ है आपकी आस्तिकता और ईश्वर पर विश्वास | यदि आप पढ़े-लिखे डिग्रीधारी हैं और आपके पास इतना भी विवेक नहीं कि नेता आपको उल्लू बना रहा है, चूना लगा रहा है, जुमले सुना रहा है या सत्य कह रहा है वह समझ पायें तो व्यर्थ है आपका पढ़ा-लिखा डिग्रीधारी होना | आप अशिक्षित के अशिक्षित ही रह गये |

मैंने बहुत पुस्तकें पढ़ीं और उन्हीं के कारण आज कूपमंडूकता और धार्मिक व जातिगत भेदभाव से मुक्त हूँ | उन पुस्तकों के कारण ही आज संन्यासी होते हुए भी किसी के अधीन नहीं हूँ, किसी का गुलाम नहीं हूँ, किसी का चाटुकार नहीं हूँ और न ही भयभीत होता हूँ किसी भी धूर्त-मक्कार बेईमान अधिकारी, नेता, माफिया या मृत्यु से |

हम जैसे जैसे शिक्षित होते जाते हैं हमारा मानसिक विकास भी होता जाता है और काल्पनिक भय भी मिटता जाता है | और जब तक हम अशिक्षित रहते हैं, हमारा मानसिक विकास भी नहीं हो पाता और धर्म, जाति, पार्टी के नाम पर कुत्ते बिल्लियों की तरह लड़ते रहते हैं | जो शिक्षित नहीं हो पाता, जो धार्मिक कूपमंडूकता से मुक्त नहीं हो पाता, वह भयभीत रहता है | वह भयभीत रहता है पड़ोसियों से, वह भयभीत रहता है दूसरे प्रान्तों, भाषाओँ, मत-मान्यताओं के लोगों या समाज से | इसी का लाभ उठाते हैं दिमाग से पैदल, कूपमंडूक, कुंदबुद्धि नेता और धर्म व जाति के ठेकेदार | वे आपको भय दिखाते हैं दूसरे सम्प्रदायों से, जातियों से और इसके लिए वे दुनिया भर के तरकीब लगाते हैं |

जो पढ़े-लिखे डिग्रीधारी अशिक्षित होते हैं, वे देश के विकास, किसानों आदिवासियों से सम्बंधित समस्याएँ सुलझाने की बजाये उन मूर्ख, कुंदबुद्धि नेताओं के पीछे जयकारा लगाते घूमते हैं जिनकी दुनिया मंदिर-मस्जिद में ही सिमट कर रह गयी, जिनकी दुनिया राजनैतिक पार्टियों और बिकाऊ नेताओं पर ही सिमत कर रह गयी | युवाओं को रोजगार भले न मिले, भुखमरी और गरीबी की समस्या भले न सुलझे…..मंदिर वहीँ बनायेंगे, इस्लाम मुक्त भारत बनायेंगे…..क्योंकि अक्ल ही घास चरने गयी थी, जब स्कूल में बैठे किताबें लेकर पढ़ने | पढ़े-लिखे डिग्रियां भी बटोर लीं, लेकिन अक्ल और शिक्षा दोनों बेच खायी !

~विशुद्ध चैतन्य

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