क्या अभिशाप है गरीबी ?

सदियों से यह मान्यता या धारणा समाज ने बना रखी है कि गरीबी, बेबसी, लाचारी अभिशाप है | जो भी इनसे पीड़ित है, वह दया का पात्र है, वह करुणा का पात्र है | लोग दया दिखाते हैं, करुणा दिखाते हैं, कुछ भीख भी दे देते हैं किन्तु कम ही लोग हैं जो सहयोगी होने के लिए तत्पर होते हैं | अधिकांश इसे अभिशाप मानते हैं, भाग्य का दोष मानते हैं और ईश्वर या किसी और को दोषी मानते हैं अपनी दुर्दशा के लिए |

अधिकांश गरीब अपने भाग्य को दोष देते हैं, सरकार और समाज को कोसते हैं और रोते-कलपते जीवन गुजारते हैं या फिर किसी नेता-बाबा का दुमछल्ला बन जाते हैं या फिर अपराध जगत में कदम रख देते है | इसीलिए वे स्वयं की क्षमताओं व योग्यताओं को पहचानने से चूक जाते हैं और दूसरों के हाथों की कठपुतली या गुलाम बन जाते हैं | समाज भी भरपूर सहयोग करता है ऐसी धारणाओं को बनाये रखने में क्योंकि इससे समाज, धर्म व राजनीती के ठेकेदारों का अपना स्वार्थ पूरा होता है |

मेरी व्यक्तिगत मान्यता यह है कि गरीबी, समाज की उदासीनता और रिश्तेदारों का असहयोगी होना वरदान है व्यक्ति के लिए | आइये इसे समझाता हूँ लेकिन सबसे पहले समझते हैं कि साधना या तपस्या क्या है ?

तपस्या क्या है ?

तपस्या का अर्थ है किसी उद्देश्य के लिए एकनिष्ठ, एकाग्रचित हो जाना | अर्थात बाकी सभी विषयों, सुखों से ध्यान हटाकर केवल एक ही विषय या उद्देश्य के लिए दृढ़ता से स्थिर हो जाना |

तपस्या का अर्थ साधना या ध्यान भी होता है |

प्रत्येक प्राणी किसी न किसी रूप में कोई न कोई तपस्या करता ही है किसी न किसी उद्देश्य के लिए | एक व्यापारी केवल अपने व्यापार, लाभ हानि पर ध्यान केन्द्रित रखता है | एक छात्र अपनी पढ़ाई पर और एक पारिवारिक व्यक्ति अपने परिवार की सुख समृद्धि पर | एक राजनेता अपनी सत्ता और कुर्सी पर केन्द्रित रहता है और एक ठग अपने शिकार पर |

सभी अपने अपने रुचि के विषयों या उद्देश्यों में ध्यान केन्द्रित रखते हैं और बाकी सभी विषय उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं रह जाते | एक राजनेता को गरीबी, भुखमरी, शोषित व पीड़ित दिखाई नहीं देते | चाहे कोई लाख दिखाना चाहें, तब भी नहीं दिखता क्योंकि उसके दिमाग में केवल कुर्सी और सत्ता हावी रहता है | उसे यह सब तभी दीखता है, जब उसकी कुर्सी या सत्ता छिनने का भय हो | जब तक वह निश्चित है की उसकी कुर्सी को कोई आंच नहीं आने वाली, उसे कुछ नहीं दिखेगा | क्योंकि वह कुर्सी व सत्ता के सुखों में बिलकुल वैसे ही ध्यानमग्न रहता है, जैसे एक तपस्वी अपनी ध्यान के सुख में खोया रहता है |

तपस्वी और बाकि सभी में यही एक समानता है कि इन्हें केवल अपना सुख प्रिय होता है और उसी में खोये रहते हैं |

लेकिन यह सुख उनका अधिकार भी है क्योंकि इसके लिए उन्हें कई त्याग करने पड़े, कई कष्ट सहने पड़े |

प्रत्येक प्राणी व्यक्तिगत सुखों को ही महत्व देता है

यह एक भ्रान्ति है कि मानव या कोई भी प्राणी दूसरों को सुखी करने के उद्देश्य से जीता है | वस्तुतः सभी व्यक्तिगत सुखों के लिए ही जीते हैं | उनका श्रम, त्याग, परोपकार, दान, सेवा…सभी कुछ व्यक्तिगत सुखों, प्रशंसा, यश, समृद्धि के लिए ही होता है | यदि किसी भी कार्य में किसी को कोई प्रशंसा, यश, सुख की अनुभूति नहीं होती, तब उसके लिए वह कार्य उबाऊ हो जाता है | फिर वही कार्य जिसे वह उत्साह से कर रहा होता था, उसे वह अनमने ढंग से करेगा, समय काटने के उद्देश्य से करेगा, हाजिरी पूरी करने के उद्देश्य से करेगा |

तपस्या, त्याग, व्यक्तिगत सुख-समृद्धि और गरीबी का परस्पर क्या सम्बन्ध है ?

गरीबी वास्तव में कोई अभिशाप नहीं है, अपितु केवल अभाव है उन सुखों का, जिसे हम पाना चाहते हैं | कई लोग गरीब हैं, किन्तु वे सुखी हैं जैसे कि आदिवासी | क्योंकि उसकी कामनाएं बहुत कम हैं, उनकी अपेक्षाएं बहुत कम हैं |

चिड़ियों को देखिये, उनके पास न तो स्मार्टफोन हैं, न ही लेपटॉप है, न ही लक्ज़री कारें हैं, न ही बैंक बेलेंस हैं…लेकिन वे हम मानवों से कई गुना अधिक सुखी हैं | लेकिन यहाँ तो आप अदानी अम्बानी जैसे धन कुबेरों को भी दुखी देख सकते हैं | इन्हें दूसरों की भूमि हडपते हुए देख सकते हैं, अधिक से अधिक दौलत इकट्ठी करने की दौड़ में दौड़ते देख सकते हैं |

तो गरीब वे नहीं जिन्हें हम गरीब कहते हैं, गरीब वे हैं जिनके पास अपार धन दौलत होते हुए भी अधिक से अधिक कमाने की दौड़ में दौड़ रहे हैं | गरीब वे नेता लोग हैं जो सत्ता पाते ही जनता के दुखों को भूल जाते हैं और अधिक से अधिक लूटने के लिए नए नए टैक्स लगाते फिरते हैं, मिनिमम बेलेंस की पेनल्टी लगाकर भी करोड़ों रूपये लूट लेते हैं गरीबों से |

हम सभी सुखी व समृद्ध होना चाहते हैं, लेकिन सुखी व समृद्ध होने की परिभाषा सभी की अपनी अपनी है | किसी का सुख इसी पर है कि दो वक्त की रोटी, सर में छत और एकांत के क्षणों में साथ देने वाला कोई साथी हो | किसी का सुख इसी में कि कोई उसकी कविता सुनने वाला मिल जाए | किसी का सुख इसीमें कि राममंदिर बन जाए, फिर चाहे पूरे देश में आग लग जाए कोई फर्क नहीं पड़ता |

तो सुख की परिभाषा भी सभी की अपनी अपनी है लेकिन सुख का मूल अर्थ है आत्मिक, मानसिक रूप से संतुष्ट व प्रसन्नचित रहना, मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती होते रहना और सुरक्षित व भयमुक्त रहना |

गरीबी कोई अभिशाप नहीं है यह बिलकुल वैसी ही स्थिति है जैसे परीक्षा देते समय, आपके पास कोई सहयोगी नहीं होता, केवल अपनी योग्यता से परीक्षा पास करनी होती है | गरीबी है आपकी वह स्थिति जब आप केजी क्लास में दाखिला लेते हैं और पाते हैं कि बड़ी क्लास के बच्चे, फर्राटे से किताबें पढ़ते हैं, संगीत बजाते हैं, नृत्य करते हैं……और आप उनमें से कुछ भी नहीं कर पा रहे |

अब आप मेहनत करते हैं, मन को एकाग्रचित करते हैं और उनमें से जो आपको पसंद है उसे पाने के लिए अभ्यास करते हैं | यही तपस्या है | आप बाकि सभी खेल खिलौनों का त्याग कर देते हैं, केवल अभ्यास करने लगते हैं, फिर चाहे पढ़ाई हो, फिर चाहे गणित हो, फिर चाहे संगीत हो…..जो भी आपको ठीक लगता है उसमें आप समर्पित हो जाते हैं | यही साधना है, यही तपस्या है |

गरीबी को दुःख के साथ जोड़ना मूर्खता है | गरीबी तो वह अवसर है जो ईश्वर या परिस्थिति द्वारा प्राप्त है जिसे पाने के लिए कोई अपना घर परिवार छोड़कर जंगलों में भटकता है, या संन्यासी का जीवन जीता है |

गरीबी अभाव नहीं, अवसर है स्वयं की योग्यताओं को खोजने वा जानने का | गरीबी अवसर है अधिक से अधिक साधना करने का, अधिक से अधिक कौशलों को सीखने का | गरीबी अवसर है नए नए मार्ग खोजने का, नए नए प्रयोगों को करने का |

दुर्भाग्य से राजनेताओं ने गरीबी के नाम पर समाज का शोषण किया, गरीबों यह एहसास करवाया कि वे लाचार हैं, असहाय हैं और वे नेता ही उनका भला कर सकते हैं आरक्षण दिलाकर या फ्री का राशन या अन्य आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करवाकर | यह बिलकुल वैसी ही बात हो गयी, जैसे किसी परीक्षार्थी को कोई कहे कि वह लाचार और बेबस है, उसे परीक्षा हाल में कुंजी और फर्रे उपलब्ध करवाने वाला, नकल करवाने वाला या बिना परीक्षा दिए ही पास करवाने वाला ही उसका शुभचिंतक है |

मेरी सलाह है सभी गरीबों और अभावों से ग्रस्त मानव समुदायों को कि वे स्वयं की योग्यताओं को खोजें, स्वयं की कमियों को दूर करें, दूसरों पर निर्भरता कम से कम करें और बाबाओं, नेताओं व राजनैतिक पार्टियों पर तो बिलकुल भी निर्भर न रहें |

एक किसान सरकार पर निर्भर रहता है तो उसे उन्नीस हज़ार किलो आलू पर केवल 490/- रूपये का मुनाफा होता है | वहीँ यदि वह सरकार पर निर्भर न रहकर अन्य विकल्पों की खोज करता, तो शायद वह अपना माथा न पीट रहा होता | इसे आप नीचे दिए गये लिंक को पढ़कर समझ सकते हैं | कैसे कोई किसान करोड़ों कमा रहा है और कोई किसान अपनी किस्मत को रो रहा है |

किसान गरीब इसीलिए है क्योंकि क्योंकि परीक्षा काल में फर्रे और कुंजियों पर निर्भर रहे | अर्थात अपनी गरीबी के समय का सदुपयोग करने की बजाये, आरक्षण, नेता व सरकार पर निर्भर रहे | यदि किसान अपने अनाज इन्टरनेट के माध्यम से आम जनों तक पहुँचाते, यदि किसान अपने आसपास के शहरों के घरों को अनाज डिलीवर करते जैसे अमेज़न व अन्य व्यापारिक साइट्स कर रही हैं, तो न केवल वे आम जनों को लाभ पहुँचाते, बल्कि स्वयं भी सुखी व समृद्ध होते

बेबस व लाचार कौन ?

बेबस व लाचार हैं वे लोग जो फूटपाथो में पड़े हुए हैं, जो अनाथ हैं, जो अपाहिज हैं, जिन्हें समझाने वाला, समझने वाला, मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं | उनके लिए सहयोगी बनिए लेकिन आत्मनिर्भर बनाने के लिए, न कि दूसरों पर निर्भर बनाने के लिए |

यदि आप समर्थ हैं, समृद्ध हैं, सुखी हैं, तो इनके हितों के लिए आवश्यक व अनिवार्य कदम अवश्य उठायें | क्योंकि यही मानवों का श्रेष्ठ कर्त्तव्य व धर्म है |

 

सदैव स्मरण रखें:

हम दुःख, तिरस्कार भोगने नहीं, ऐश्वर्य व समृधि भोगने आये हैं | हम पृथ्वी में ईश्वर अर्थात ऐश्वर्य को खोजने और प्राप्त करने आये हैं | लेकिन ये सब किसी से छीनकर या ठग कर नहीं, अपने ही परिश्रम व तपस्या से प्राप्त करना ही श्रेष्ठता का प्रतीक है | छीना-झपटी, ठगी, बेईमानी सब निम्नकोटि के मानवों का गुणधर्म है |

~विशुद्ध चैतन्य

 

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