आप शाकाहारी हैं तो उन खेतों को बचाइये जहाँ शाक सब्जियां उगाई जातीं हैं

शाकाहारियों ने कितने हरी सब्जियों के खेत लगाए ? कितने वृक्ष लगाए ? कितने खेतों को बंजर होने से बचाए, कितने वनों को कटने से बचाए ?

आप लोग माँसाहारियों की निंदा करते हैं क्योंकि आप शाकाहारी हो गये तो भगवान हो गये और बाकी सभी शैतान हो गये | आपका शाकाहारी होना उसी तरह गर्व की बात है जैसे किसी का पंडित या ब्राह्मण होना | हाँ, आपने माँसाहारी परिवार में जन्म लिया और बाद में बिना किसी दबाव के छोड़ दिया तो अलग बात है…. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो गया कि आप दूसरों की निंदा करते फिरें | फिर तो आपका शाकाहारी होना व्यर्थ हो गया, फिर तो वह आपकी विवशता हो गयी और कुंठा के कारण ही आप दूसरों को कोस रहे हैं ऐसा ही माना जाएगा |

मेरा परिवार माँसाहारी था | बचपन अंडमान में गुजरा जहाँ मांस-मच्छी ही था खाने के लिए | जिस द्वीप में थे हम वहां कहीं कोई खेती नहीं होती थी, केवल शिकार ही होते वहाँ | कई बार कई कई महीने बिना राशन के रहना पड़ता था क्योंकि वहां महीने में एक ही बोट आती थी राशन लेकर और वह भी यदि तूफ़ान आ जाए तो केंसल हो जाती थी | तब हमें केवल मछली भुनकर ही खाना होता था या कभी कभी किसी हिरन का शिकार कर लिया आदिवासियों ने तो हमें भी थोड़ा बहुत माँस मिल जाता था |

समय बदला और सब दिल्ली चले आये… हमारी बहनों को माँस बिलकुल पसंद नहीं था बचपन से ही तो वे नहीं खाती थीं…. माँ भी भी कभी कभार ही खाती थीं | बाद में पिताजी ने भी छोड़ दिया और उसके बाद छोटे भाई ने भी | लेकिन यह छोड़ना स्वाभाविक था क्योंकि हम जो मांस मच्छी बचपन में खाते थे वे प्राकृतिक थे, वे रासायनिक प्रभावों से मुक्त थे, लेकिन शहर में जो मिलता है वे दुनिया भर के ज़हर से भरे हुए होते हैं, जिसके कारण हम लोग खा ही नहीं पाते थे | इस प्रकार हमारा पूरा परिवार माँसाहार से मुक्त हो गया |

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अब हमारी मुक्ति थोपी हुई मुक्ति नहीं है | हमसे किसी ने कहा नहीं कि यह मत खाओ और वह मत खाओ…. कई बार ऐसा भी हुआ कि केवल मेरे लिए मेरे पिताजी ने स्वयं क्रैब सूप बनाया, जब मैं बहुत ही बीमार हो गया था….हमारे आश्रम के संस्थापक ने स्वयं अपने हाथों से मछली बनाकर परोसी थी अपने उन भक्तों को जो माँसाहार करते थे | आज भी मेरे ऊपर कोई दबाव नहीं है और न ही कोई रोकटोक…. लेकिन यह मेरा व्यक्तिगत विषय है कि मैं माँसाहार करूँ या न करूं…. जीव हत्या का ताना देने वाले जरा अपने कारनामें भी देख लें शाकाहार के नाम पर उन्होंने कितने जंगल ही हजम कर लिए और कितने जीवों की हत्या कर दी | कितनी प्रजातियाँ ही लुप्त हो गयीं जीवों की क्योंकि उनके लिए जंगल ही नहीं छोड़े | फिर भी घमंड हैं शाकाहरी होने का |

ध्यान रखें यदि आप घमंड में हैं कि आप शाकाहारी हैं और कोई पुण्यात्मा हो गये हैं, तो आप फिर शाकाहरी नहीं हुए आप पंडित हो गए, आप ब्राह्मण हो गये, आप सवर्ण हो गये, शुक्ला हो गया, शर्मा होगये, वेदी हो गये, त्रिवेदी हो गये……और यह सब होने में आपका आपना कोई योगदान नहीं है | क्योंकि आपको जो कुछ मिला है वह मुफ्त में मिला है कोई कुर्बानी नहीं दी है आपने | जैसे एक डॉक्टर के बेटे को कोई डॉक्टर कह दे.. चाहे वह अंगूठा छाप हो…..

आप शाकाहारी हैं तो उन खेतों को बचाइये जहाँ शाक सब्जियां उगाई जातीं हैं | ये हरी सब्जियों आपके कारखानों में नहीं बनाई जाती | यदि आप कहते हैं कि हम किसी जीव की हत्या नहीं होने देना चाहते तो वनों को बचाइये जो आपके शौक पूरे करने में खत्म हुए जा रहे हैं | यदि आप इतने ही पुण्य आत्मा और अहिंसक हैं तो प्लास्टिक की थैलियाँ न फेंका करें सड़कों पर, च्विंगम न फेंका करें सड़कों पर….

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ये शाकाहारी श्रेष्ठ होते हैं और मांसाहरी राक्षस होते हैं वाली सिद्धांत से इस देश में आपस में नफरत मत फैलाइये…. आज मैं शाकाहारी हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं की मैं मांसाहारियों की निंदा करना शुरू कर दूं | ~विशुद्ध चैतन्य

नोट: मेरे विरोधी चाहें तो इस पोस्ट को कॉपी पेस्ट करके हर जगह शेयर कर सकते हैं और कह सकते हैं कि ये ढोंगी है, पाखंडी है, माँसाहारी है…… और जो पंडित नस्ल के लोग मुझे महान संत समझकर जुड़े हुए थे, वे भी अब अलग हो सकते हैं…. क्योंकि मैं आपके साधू-समाज नाम के कठपुतलियों वाल संयासी नहीं हूँ | मेरा अपन व्यक्तित्व है आपके झूठी बाह्वाही और मान सम्मान के लिए मैं स्वयं को नहीं खो सकता | ~विशुद्ध चैतन्य

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